शिक्षक दिवस पर कुमाउनी-गढ़वाली शिक्षक सम्मान 2019 सम्पन्न

सी एम पपनैं
नई दिल्ली। 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर उत्तराखंड लोकभाषा व साहित्य मंच द्वारा आयोजित भव्य कुमाउनी-गढ़वाली शिक्षक सम्मान 2019 स्पीकर हाल, कंस्टीट्यूशन क्लब मे मुख्य अतिथि गढ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, विशिष्ट अतिथि लोकगायक हीरा सिंह राणा, राजनीतिज्ञ महेंद्र पांडे, सर्वोच्च न्यायालय अधिवक्ता सतीश टम्टा, डीपीएमआई निर्देशक डॉ विनोद बछेती व हिंदी व संस्कृत अकादमी दिल्ली सचिव डॉ जीतराम भट्ट के सानिध्य मे सम्पन्न हुआ।
मंचासीन अतिथियो के हाथों दीप प्रज्वलन की रस्म व वाई के इंस्टिट्यूट की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत वंदना-
संगीत की शिक्षा दो हे स्वर की देवी, माँ वाणी मे मधुरता दे…शक्ति ना भक्ति है, सेवा का ज्ञान नही…गीतों के खजाने से एक गीत मुझे दो..वाणी मे मधुरता दो, संगीत सुनाती हूं, संगीत की शिक्षा दो…।
की प्रस्तुति के बाद आयोजको द्वारा मंचासीन अतिथियो का अंगवस्त्र व पेड़ भेट कर अभिनन्दन किया गया।
मुख्य आयोजक डीपीएमआई के निर्देशक  डॉ विनोद बछेती ने स्वागत संबोधन मे मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियो, सम्मानित होने जा रहे सभी शिक्षकों, समाज सेवियों व अन्य गणमान्य जनो का अभिनन्दन कर समारोह मे आकर शोभा बढाने पर आभार व्यक्त किया। अवगत कराया दिल्ली एनसीआर के 125 शिक्षकों व समाज सेवियों को वर्ष 2019 का सम्मान प्रदान किया जा रहा है।
वर्ष 2016 से कुमाउनी गढ़वाली बोली-भाषा की कक्षाओं की शरूआत की गई। इस वर्ष एनसीआर के 35 से ज्यादा स्थानों के साथ-साथ गढ़वाल श्रीनगर मे कक्षाऐं आयोजित की गई। 135 शिक्षकों ने बोली भाषा सिखाने मे योगदान दिया। वर्ष 2019 मे करीब तीन दर्जन स्थानों पर 12 मई से 4 अगस्त 2019 तक पड़े 12 इतवारो को बोली-भाषा की कक्षाए आयोजित की गई जिसमे करीब बारह सौ बच्चों ने प्रतिभाग किया।
डॉ बछेती ने व्यक्त किया पलायन के साथ ही बोली का लुप्त होना चिंता जनक है। आह्वान किया, हम कही भी रहे अपनी बोली को प्राथमिकता दे, तभी बोली व हमारी पहचान जिंदा रहेगी। अवगत कराया पौड़ी जिला मजिस्ट्रेट के सहयोग से  कक्षा एक से पांच तक गढ़वाली बोली की शिक्षा आरम्भ हो चुकी है।
कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी बोली-भाषा को आठवी अनुसूचि मे स्थान दिलवाने व दिल्ली मे अन्य बोली-भाषा की अकादमियो की तरह कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी बोली-भाषा की अकादमी की स्थापना जल्द करवाए जाने की मांग को डॉ बछेती ने बल पूर्वक उठाया।कहा, दिल्ली प्रवास मे सौ से अधिक संस्थाऐ बोली-भाषा पर कार्य कर रही हैं, उनकी यह मांग अनेक दशकों से लंबित है।
दिल्ली एनसीआर के शिक्षकों व समाज सेवियों मे फरीदाबाद के पांच, बुराड़ी चार, सुशांत विहार इब्राहिमपुर चार, नरेला आठ, नजफगढ़ एक, संगम विहार चार, द्वारका सेक्टर 15 से तीन, पालम राजनगर एक, खोड़ा गाजियाबाद पांच, इंदिरापुरम तीन, नोएडा सैक्टर 22 तीन, लोनी छः, महरौली गढवाल कलोनी छः, रोहणी पांच, सागरपुर तीन, कालका जी छः, पश्चिमी विनोद नगर दस, मयूर विहार फेस तीन से पांच, पांडव नगर तीन, लोदी रोड तीन, मंडावली पूर्वी सात, लक्ष्मी नगर चार, त्रिलोकपुरी पांच, आया नगर एक, पूर्वी दिल्ली से आठ को सम्मानित होने का गौरव हासिल हुआ।
सभी सम्मानितो को अंगवस्त्र व स्मृति चिन्ह मंचासीन अतिथियो के साथ-साथ डीसीपी सतीश शर्मा, महिपाल जी, मदन मोहन ढुकलान, पूनम बछेती, विक्रम सिंह रावत, श्याम लाल, संजय दलमोडा, बुडाकोटी, खुशाल सिंह बिष्ट के हाथों भेट किए गए।
कुमाउनी-गढ़वाली बोली-भाषा को समृद्ध करने तथा कक्षाओं के आयोजन मे विशेष योगदान देने हेतु शिक्षक पूरन चन्द्र कांडपाल, दिनेश ध्यानी, डॉ सतीश कालेश्वरी, दर्शन सिंह रावत, मंजू रतूड़ी तथा चन्दन प्रेमी को विशेष सम्मान से मुख्य अतिथि के हाथों नवाजा गया।
सम्मान समारोह के मध्य राजस्थान मूल निवासी ज्ञान चंद्र जैन ने गढ़वाली मे वक्तव्य दे जहा सबको चौकाया वही सात वर्षीय पीयूष तिवारी ने धारा प्रवाह कुमाउनी बोली मे व्यंग प्रस्तुत कर तालियां बटोरी।
आरती यादव ने गुरु को समर्पित कविता प्रस्तुत कर श्रोताओं को गदगद किया-
ये सांसे उस खुदा की देन है, ये जिंदगी माता पिता की देन है…मेरी पहली गुरु माँ जिसने बोलने की तहजीब सिखाई, चलना पापा ने सिखाया, बोलना कहां है यह मेरे गुरु ने बताया…नमन करते हैं उन गुरुओं को जिन्होंने इंसान की परख करना सिखाया…।
प्रगति लखेड़ा व कुमारी रिया ने जहां कुमाउनी-गढ़वाली बोली मे प्रस्तुति दी वही सौरव कपटवाल ने मुख्य अतिथि नरेंद्र सिंह नेगी का चर्चित गीत मधुर कंठ से गाकर प्रभावित किया।
गीत के बोल थे-
सम दोला का द्वि दिन..।
विशिष्ट अतिथि महेंद्र पांडे, सतीश टम्टा, हीरा सिंह राणा तथा डॉ जीतराम भट्ट ने अपने संबोधन मे व्यक्त किया, शिक्षक दिवस पर छात्रो द्वारा कर्तव्य निर्वाह कर शिक्षकों को याद करना ही शिक्षक दिवस है। वर्तमान मे शिक्षा स्कूल, कालेज व विश्वविद्यालय से अब आंन लाइन शिक्षा की ओर बढ़ गई है। शिक्षा मे आमूलचूल परिवर्तन हो गया है। मूलभूत शिक्षा शिक्षक के द्वारा ही मिलती है। संस्कृति के प्रति चेतना शिक्षक को ही बतानी होगी।
वक्ताओं ने व्यक्त किया उत्तराखंड की शिक्षा, संस्कृति  का संरक्षण व संवर्धन बोली-भाषा को अपना कर ही किया जा सकता है। हम सबने पलायन खुश होकर नही किया है, उसके कारणों मे आर्थिक स्थिति मुख्य रही है। हम प्रवास मे जहा कही भी रहे, अपनी पहचान बना, अमिट छाप छोड़े।
वक्ताओं ने कहा अभाओ का जीवन जीते हुए भी उत्तराखंड के लोग दुब की तरह रहे, फले फूले।
वक्ताओं ने कहा, दिल्ली प्रवास मे गर्मियों मे बोली-भाषा की कक्षाऐं आयोजित करना कष्टदाई है। हम प्रवास मे जो भी हैं गांव के शिक्षक की बदौलत हैं। देश के सभी नगरों व कस्बो मे मिनी उत्तराखंड है। महानगर मे शिक्षा ले गांव को लौटना मुख्य शिक्षा कहलाई जाएगी। दिल्ली प्रवास मे बोलीभाषा की कक्षाओं के आयोजन का मुख्य मकसद उत्तराखंड के गांवो की राह दिखाना है। उत्तराखंड की बोलीभाषा एक मंच से प्रोत्साहित हो।
दिल्ली हिंदी अकादमी सचिव डॉ जीतराम भट्ट ने अवगत कराया, दिल्ली प्रवास मे कुमाउनी, गढ़वाली व जौनसारी अकादमी की घोषणा विधान सभा के इस सत्र मे होने की आशंका है। कागजी खानापूर्ति पूर्ण हो चुकी है।
श्रोताओं की चाहत व हर्ष ध्वनि के बीच लोकगायक हीरा सिंह राणा ने दो गीत सुनाए-
1- जतिन म्यार गोठी स्कुल गोय, वील गोरु चराण छोड़ि दी।
मैल कोय पाटी पड़, वील मड़ू जौस गोड़ दी।।
2- बरषो बे यो देखने रोय मै…तुम गया मै कथा जो…द्वी गों का, द्वी वी गों का..।
मुख्य अतिथि व वक्ता गढरत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने संबोधन मे व्यक्त किया लोकभाषा के लिए संघर्ष निरंतर जारी रखना होगा। कुछ लोग लोकभाषाओ के लिए संघर्ष रत हैं, कुछ बचाने हेतु प्रयासरत हैं। सरकार भी लोकभाषा के लिए ध्यान दे रही है। दुर्भाग्य हम लोगो ने खुद ही अपनी बोलीभाषा की उपेक्षा की है। लोकसंगीत उपेक्षित रहा है। साहित्य अकादमी ने प्रतिष्ठित दो-दो व भारत सरकार ने पदम सम्मान हमारी बोली-भाषा पर दिए हैं। उत्तराखंड के लोकसंगीत व बोली-भाषा पर सरकार का ध्यान आकर्षित हुआ है।
इस उपलब्धि से उत्तराखंड के युवाओं को प्रोत्साहन मिलेगा।
गढरत्न ने कहा, साहित्य मे उत्तराखंड के लेखको का योगदान सराहनीय रहा है। कुमाउनी व गढ़वाली मे पुस्तके बहुत प्रकाशित हो रही हैं। पत्रिका भी निकल रही है। लिखा ज्यादा पर पढ़ा कम जा रहा है। कहा, अपनी बोली-भाषा को प्राथमिकता दै। पुस्तके खरीदे। हमे खुद को अपनी बोली-भाषा व संस्कृति के उत्थान के लिए जागरूक हो कार्य करना होगा।
उन्होंने कहा, संस्थाए बहुत हैं, परन्तु जड़ पर काम करने वाले कम हैं।सरकार जानने लगी हैं, लोग जागरूक हो चुके हैं। दिल्ली प्रवास मे   प्रवासियो के मध्य शिक्षक व विद्यार्थियो की बोलीभाषा मे रुचि लेना शुभ संकेत हैं। भविष्य की पीढ़ी इस सोच से जरूर लाभान्वित होगी, कामना करता हूं।
श्रोताओं व आयोजकों की चाहत पर वर्ष 2018 संगीत नाटक अकादमी अवार्ड विजेता लोकगायक नरेंद्र नेगी ने गजल गाई-
दगडू तोड़ी…जाड़ी छई बोल क्या बात छ। अदबटा छोड़ि जाण वो, हंसि खेली वो जांदी…बोल क्या बात छ…माया कि खाली ऊकाली कट जाणी..क्ये बात छ..।
साढ़े तीन घन्टे की अवधि तक चले सम्मान समारोह का मंच संचालन दिनेश ध्यानी व गणेश कुकसाल ‘गणी’ ने बड़ी सिद्धत्त व विद्तापूर्वक किया।
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