ख्याति प्राप्त पर्वतीय कला केंद्र का स्वर्ण जयंती समारोह सम्पन्न

सी एम पपनै
नई दिल्ली,।पर्वतीय कला केंद्र, दिल्ली की स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर दिल्ली के एलटीजी सभागार में 29, 30 व 31 जनवरी को भव्य ऐतिहासिक स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन सम्पन्न हुआ। 29 जनवरी की सायं केंद्र ने दिल्ली स्थित उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध प्रवासी सांस्कृतिक व सामाजिक संस्थाओ मे सुमार उत्तराखंड कला संगम, उत्तराखंड फिल्म एवं नाट्य संस्थान, रुद्रवीणा ग्रुप, पर्वतीय लोक कला मंच, दि हाई हिलर्स ग्रुप, गढ़वाल हितैषिणी सभा, रमेश एवं पार्टी, लोक झलक सांस्कृतिक कला समिति के साथ-साथ उत्तराखंड में मध्य हिमालय की लोक संस्कृति के संरक्षण व सवर्धन मे कार्यरत ध्वजवाहक संस्था पहाड़ तथा युगमंच नैनीताल के जहूर आलम, सुप्रसिद्ध कवि व लोकगायक हीरा सिंह राणा व लोकगायिका आशा नेगी तथा साहित्यकार डॉ हरिसुमन बिष्ट व अल्मोड़ा के धनंजय शाह को सम्मानित किया। पर्वतीय कला केंद्र ने अपने संस्थापक सदस्य दयाकृष्ण पंत व भैरव तिवारी के साथ-साथ केन्द्र से निरंतर जुडे पदाधिकारियों व कलाकारों का भी भव्य सम्मान मुख्य अतिथि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निर्देशक डॉ देवेन्द्र राज अंकुर के हाथों स्मृति चिन्ह भेट कर किया। सम्मान समारोह के बाद केंद्र ने स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह रचित व स्व. मोहन उप्रेती द्वारा संगीत बद्ध गीत नाट्य रसिक रमोल का सफल मंचन अमित सक्सेना के निर्देशन व डॉ पुष्पा तिवारी बग्गा के संगीत संकलन मे मंचित किया।
30 व 31 जनवरी की सायं सम्मानित संस्थाओं उत्तराखंड फिल्म एवं नाट्य संस्थान ने कृपाल सिंह रावत के संगीत निर्देशन मे उत्तराखंड के लोकगीत, रुद्रवीणा ग्रुप ने लोकगायक शिवदत्त पंत के निर्देशन मे नन्दाजात, पर्वतीय लोककला मंच ने हेम पंत व गंगादत्त भट्ट के निर्देशन मे ऋतुरैण तथा लोक झलक सांस्कृतिक कला समिति के भुवन रावत ने लोकगीत के कार्यक्रम मंचित किए तथा लोकगायिका आशानेगी ने देवी भजन, न्योली व लोकगीत गाकर केंद्र के स्वर्ण जयंती समारोह को सफल व यादगार बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीनों दिन उत्तराखंड की सशक्त लोकगाथा रसिक रमोल गीत नाट्य का प्रभावशाली मंचन खचाखच भरे सभागार मे मंचित हुआ। अमित सक्सेना के निर्देशन डॉ पुष्पा तिवारी बग्गा के संगीत संकलन व दिक्षा उप्रेती की कोरियोग्राफी की भूरी- भूरी प्रशंसा की गई। गीत नाट्य की नायिका बीजामती की भूमिका मे रिधिमा बग्गा व सिदुवा व विदुवा नायक की भूमिका मे क्रमशः सुधीर रिखारी व ध्रुव कुमार तथा आंचरी चांचरी, की भूमिका मे क्रमशः बबीता पांडे व दिक्षा उप्रेती तथा कफुआ पक्षी की भूमिका में श्रेष्ठा व भवरों की भूमिका मे सोनाली व यासिका सिंह के अतिरिक्त कालूवजीर महेंद्र लटवाल, सिद्धिनाथ धर्मेंद्र आर्या, मलुआ खिलानंद भट्ट,  ने अपने प्रभावशाली मधुर लय बद्ध गायन, नृत्य व भूमिका से प्रशंसा बटोरी व गीत नाट्य व केंद्र को सफलता की सीढ़ी प्रदान की। मंचित रसिक रमोल गीत नाट्य लोकगाथा उत्तराखंड के रमौली कोट के संगीत व प्रकृति रसिक वीरो की गाथा पर आधारित गीत नाट्य है, जिसमें गीत व संगीत की प्रधानता है। सिदुवा व विदुवा रमोल भाइयो के ऊंचे हिम शिखरों मे अपने पसंदीदा वाद्य मुरली व डगर की धुनों को बजा कर शांत हिमशिखरों के शैलसागर मे आंचरी चांचरी व परियों की टोली को प्रभावित कर मदमस्त होना उनकी जीवन की कला है। प्रकृति के आनंद मे मदमस्त इन दो भाइयो के रमोली गढ़ मे तराई के कालू वजीर नामक राजा के जासूसों की कुदृष्टि सिदुवा की पत्नी बीजामती पर पड़ती है, राजा को बीजामती की सुंदरता का हवाला गुप्तचरों सा जान स्वयं भेष बदल रमोली गढ़ पहुच सोने चाँदी व अच्छे जीवन जीने का लोभ बीजामती को देता है, जिसे बीजामती ठोकर मार ठुकरा देती है। कालूवजीर अपमान न सह रमोली कोट पर आक्रमण कर रमोलो के पिता गांगु रमोल को धोखे से मार देता हैं। सिदुवा का बेटा सिद्व नाथ कालूवजीर के सेनापति मलुआ को मार स्वयं युद्ध मे घायल हो वीरगति को प्राप्त हो जाता है। इस अनहोनी की खबर कफुआ पक्षी के द्वारा रमोलो को पता चलती है वे कालूवजीर का वध कर रमोलीकोट लौट बीजामती को पुत्र की मृत्यु पर दुःख प्रकट कर स्वयं परेशान हो जाते हैं। बीजामती उनके तंत्र मंत्र की विद्यया के ज्ञान को कोशती व ललकारती है व पुत्र के प्राणों की वापसी की मांग करती है। सिदुवा रमोल अपनी तंत्र विदया के बल दो भवरो के हाथों मे संदेश लिख शैलसागर भेज परियों को संदेश भेज आग्रह करता है कि बीजामती के दुख को हरने मे मदद करो, सिद्व नाथ की आत्मा को रमोली कोट लाकर। आंचरी चांचरी व परिया सिद्धनाथ को रमोली कोट लाकर खड़ा कर देते हैं। जिसे देख सभी को अचरज होता है। सिद्धनाथ अपनी ईजा बीजामती व पिता तथा चाचा से अपनी वीरगति की बात कह व उसके बिछुड़ने का दुःख त्याग सदा पिता की जुड़वा मुरली व चाचा की डगर की धुनों मे सदा वास करने की बात कर दुःख व उसका मोह त्यागने की बात कहता है। परिया, आंचरी व चांचरी सिदुवा व विदुवा तथा रमोली कोट के वाशिंदों को अपना मस्ती भरा गीत संगीत व प्रकृतिप्रेम का जीवन पुनः जीने का संदेश देते हैं। इसी सन्देश की खुशी मे झूम रमोली कोट के वाशिंदे अपना मस्ती भरे जीवन के उल्लास मे मस्त हो जाते हैं। स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह लिखित गीत नाट्य व स्व. मोहन उप्रेती के रचे यादगार संगीत की धुनों की समाप्ति के साथ गीतनाट्य की समाप्ति होती है।पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली सोसाइटी एक्ट के अधीन सन 1968 मे स्थापित उत्तराखंड के प्रबुद्ध प्रवासियों द्वारा स्थापित मान्यता प्राप्त संस्था है। उत्तराखंड के पारंपरिक लोकगीत, संगीत, नृत्य व लोकगाथाओ को उनके मूल रूप को यथावत रख उन्हे आधुनिक रंगमंच पर मंचित कर मध्य हिमालय की लोकसंस्कृति का संरक्षण व सवर्धन कर उसका व्यापक प्रचार-प्रसार करना संस्था का मुख्य उद्देश्य रहा है। सन 1968 से 1980 तक केंद्र ने उत्तराखण्ड के पारम्परिक लोकनृत्य, गीत व संगीत आधारित कार्यक्रमो को बड़े आधुनिक रंगमंच पर मंचित कर मध्य हिमालय उत्तराखंड की सशक्त पारम्परिक लोकसंस्कृति व लोकविधा को व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने व  स्मृद्ध करने की पहल की। सन 1980 मे केंद्र ने उत्तराखंड की प्रेमगाथा ‘राजुला मालूशाही’ का स्थानीय बोली गीत नाट्य शैली मे मंचित कर एक नई पहल की। दिल्ली सहित देश के अनेको शहरो व महानगरों मे इस गीतनाट्य के अनेकों शो मंचित हुए। रंगमंच के विशेषज्ञयों का ध्यान केंद्र की इस नायाब प्रस्तुति पर आकर्षित हुआ। केन्द्र ने उत्तराखंड की एक और सशक्त वीरगाथा ‘अजुवा बफौल’ गीत नाट्य व उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध पारम्परिक गायन शैली की ‘रामलीला’ का मंचन कर अपना कदम और आगे बढ़ाया। सफल प्रस्तुतियों के मंचन स्वरूप सन 1983 मे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने केंद्र को ‘रंगमंडल’ का दर्जा प्रदान किया। इसी वर्ष पांच यूरोपीय देशों का तीन माह का दौरा 18 कलाकारों के साथ व 1988 मे 24 कलाकारों के साथ उत्तरी कोरिया, चीन व थाईलैंड का 18 दिवसीय दौरा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के सौजन्य से केंद्र ने बड़ी ही सिद्धत से कर, अंतरराष्ट्रीय आयोजनों मे भारत का प्रतिनिधित्व करने का गौरव हासिल किया। 1971 मे केंद्र ने सिक्कम का दौरा कर विदेशी धरती पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की अलख जगाने की शुरुआत कर डाली थी।सन 1986 मे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव ‘अपना उत्सव’ मे केंद्र ने दिल्ली व उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधत्व किया व साथ ही देश में आयोजित अन्य अनेको राष्ट्रीय आयोजनों व उत्सवो मे प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रीय गौरव हासिल किया। सन 2018 भारत में आयोजित अंतर राष्ट्रीय ‘थिएटर ओलंपिक’ के आठवे संस्करण में पर्वतीय कला केंद्र को विश्व के तीस देशों के साथ प्रतिनिधित्व करने का गौरव हासिल हुआ। केंद्र ने उत्तराखंड की स्थानीय  बोली मे गीत नाट्य ‘राजुला मालूशाही’ प्रेमगाथा का मंचन कर विश्वपटल पर उत्तराखंड की स्मृद्ध लोकसंस्कृति के मंचन का गौरव हासिल कर सफलता प्राप्त की। पर्वतीय कला केंद्र ने इन पचास वर्षों की अवधि में उत्तराखंड की अन्य मंचित चर्चित लोकगाथाओ मे महाभारत (गढ़वाल की पांडव जागर पर आधारित लोकगाथा), रसिक रमोल, जीतू बगड़वाल, हिलजात्रा, भाना गंगनाथ, रामी, गोरिया, नंदादेवी, गोरीधना, हरूहित के साथ-साथ अन्य चर्चित लोकनाट्य व गाथाओ मे इंदर सभा, अमीर खुसरो, मेघदूत, आजादी की 40वी वर्षगांठ पर ‘वंदेमातरम’, कुली बेगार, कगार की आग, धरमदास, वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, पहाड़ नै की काथ, अष्टवक्र इत्यादि का मंचन किया। केन्द्र की अनेकों लोकगाथाओं व अन्य कार्यक्रमो का राष्ट्रीय प्रसारण  दूरदर्शन व आकाशवाणी से भी प्रसारित होता रहा हैं। देश के अनेकों महानगरों, शहरों व कस्बो मे केंद्र ने अन्य अनेकों सांस्कृतिक व लोकगाथाओं के कार्यक्रम मंचित किए हैं। पर्वतीय कला केंद्र देश की रंगमंच से जुडी एक मात्र सांस्कृतिक संस्था है जो गीतनाट्य के क्षेत्र मे निरंतर पचास वर्षों (1968-2018) की अवधि तक मध्य हिमालय उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के संवर्धन व संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध संस्था रही है।
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