Post Views: 0
डॉ केसी पांडेय,कोलकाता/हावड़ा।हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के परिसर में विगत दिनों एक गरिमापूर्ण साहित्यिक आयोजन संपन्न हुआ। अवसर था विश्वविद्यालय की कुलपति और प्रख्यात विदुषी प्रो. नंदिनी साहू की चर्चित कृति ‘मेडूसा’ पर केंद्रित पुस्तक चर्चा कार्यक्रम का। इस आयोजन ने न केवल अकादमिक जगत में हलचल पैदा की, बल्कि मिथकों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखने की एक नई दृष्टि भी प्रदान की।
प्रशासनिक और शैक्षणिक गरिमा का संगम यहां देखने को मिला। कार्यक्रम की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों—कुलसचिव श्री सुमन भट्टाचार्य, ओएसडी देवब्रत भांजा और वित्त अधिकारी सिद्धार्थ घटक ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। इन अधिकारियों की मौजूदगी ने आयोजन की प्रशासनिक गंभीरता और शैक्षणिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का कुशल संयोजन डॉ. इन्द्रजीत यादव एवं डॉ. पारोमिता दास द्वारा किया गया। अपने प्रारंभिक वक्तव्य में संयोजकों ने ‘मेडूसा’ की वैचारिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे यह कृति पारंपरिक मिथकों को तोड़कर स्त्री-विमर्श की प्रासंगिकता को नए आयाम देती है।
चर्चा में विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्वानों और वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए, जिनमें प्रमुख हैं:
डॉ. प्रियंका गुहा राय, बिस्वजीत प्रसाद हाजाम, डॉ. मधुमिता ओझा, डॉ. अजीत कुमार दास, डॉ. कृष्ण नंद भारती, दिव्या प्रसाद, सुशील कुमार पांडेय, डॉ. विजयता दुबे, डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, संगीता बारी, मधुबंती गांगुली, डॉ. गुड्डी कुमारी और डॉ. सौमिता मित्रा।
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि प्रो. नंदिनी साहू की यह कृति मात्र एक प्राचीन मिथक का दोहराव नहीं है, बल्कि यह समकालीन स्त्री की अस्मिता, उसके संघर्ष और समाज के प्रति उसके प्रतिरोध की एक सशक्त गूँज है। वक्ताओं ने ‘मेडूसा’ के माध्यम से पितृसत्तात्मक ढांचे पर किए गए प्रहारों और आत्मस्वर की खोज पर विस्तार से चर्चा की।
“यह कृति साहित्य और समाज के बीच एक ऐसा सेतु बनाती है जहाँ प्राचीन कथाएँ वर्तमान की विसंगतियों पर प्रश्न खड़ा करती हैं।”विचार गोष्ठी का निष्कर्ष
इस आयोजन ने विश्वविद्यालय के अकादमिक वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार किया है और साहित्यिक संवाद की परंपरा को और अधिक सुदृढ़ बनाया है।
Like this:
Like Loading...
Related