उत्तराखंड जौनसार के अमर शहीद केशरी चंद का जन्म शताब्दी वर्ष सम्पन्न

सी एम पपनैं
नई दिल्ली। देश के स्वाधीनता आंदोलन की लड़ाई मे उत्तराखंड जौनसार बाबर के वीर सपूत केशरी चंद का जन्म शताब्दी वर्ष 1 नवम्बर की सांय उत्तराखंड के प्रबुद्ध साहित्यकारो, पत्रकारो, समाज सेवियों विभिन्न संस्थाओं व संगठनों से जुड़े लोगो, उच्च अधिकारियों व जौनसार बाबर से आए प्रबुद्ध लोगों की उपस्थिति मे पूर्वी दिल्ली न्यू अशोकनगर स्थित डीपीएमआई सभागार मे भव्य आयोजन आयोजित कर सम्पन्न हुआ।
आयोजको, सहयोगी संस्थाओं व मुख्य वक्ताओ द्वारा दीप प्रज्वलन तथा अमर शहीद के चित्र पर पुष्प माला अर्पित कर श्रद्धा सुमन अर्पित करने की रश्म के साथ ही अमर शहीद के 100वे ‘जन्मोत्सव कार्यक्रम’ का शुभारंभ किया गया।
आयोजक संस्था जौनसार बाबर ट्राइवल वेलफेयर सोसाइटी के सचिव राजेश्वर सिंह द्वारा संस्था की ओर से खचाखच भरे सभागार मे बैठै प्रबुद्व जनो का अमर शहीद केशरी चंद की शताब्दी वर्ष की बेला पर आने हेतु अभिनन्दन किया गया। आयोजित आयोजन मे सहयोग देने हेतु उत्तराखंड लोकभाषा साहित्य मंच, उत्तराखंड एकता मंच तथा प्रायोजक डीपीएमआई  का आभार व्यक्त किया। अमर शहीद केशरी चंद के देश प्रेम व छोटी सी उम्र मे दिए बलिदान पर सारगर्भित वक्तव्य मे कहा, अमर शहीद केशरी चंद के जेहन मे बाल्यकाल से ही पनपे देश भक्ति के जज्बे व मात्र चौबीस वर्ष की उम्र मे देश की आजादी के लिए फांसी पर झूल जाने वाले इस वीर जाबांज जौनसारी बलिदानी ने लोगो के दिलो मे देशप्रेम का जज्बा जगाया। युवाओ को प्रेरित किया। भविष्य की पीढ़ी के प्रेरणा श्रोत बने।
अमर शहीद केशरी चंद के शताब्दी वर्ष पर वक्तव्य देने वाले प्रबुद्ध वक्ताओ मे एम आर शर्मा, शिव सिंह रावत, डॉ एस डी बिजल्वाण, दिनेश ध्यानी, टी आर शर्मा, रमेश कांडपाल, चंद्रमोहन पपनैं, कुमुद भटनागर जोशी, जयपाल सिंह रावत, डॉ विनोद बछेती, जगदीश उप्रेती व दयाल सिंह नेगी ने अमर शहीद के देश प्रेम के जज्बे व देश की स्वाधीनता के लिए दिए गए बलिदान पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।
वक्ताओ ने अवगत कराया, जौनसार बाबर के ग्राम क्यावा मे 1 नवम्बर 1920 को प.शिवदत्त के घर जन्मे केशरी चंद बचपन से ही अति साहसी, नेतृत्व गुण सम्पन्न और देशभक्ति की भावना से कूट-कूट कर भरे हुए थे। स्वाधीनता आंदोलन मे भाग लेने व सहयोग देने हेतु आयोजित बैठकों मे वे बाल्यकाल से ही भाग लेने लगे थे। वक्ताओ ने कहा देश भक्ति का ही जूनून था 1941 मे वे 21 वर्ष की उम्र मे बारहवी पास कर रॉयल इन्डियन आर्मी सर्विस कोर मे सूबेदार के पद पर भर्ती हो गए थे। इसी वर्ष अपने बुद्धि कौशल के बल उन्होंने वायसराय कमीशन आफिसर का कोर्स भी पूर्ण कर लिया था। दूसरे विश्व युद्ध मे उन्हे मलाया भेजा गया। 15 फरवरी 1942 को जापानी सेना ने उन्हे गिरफ्तार कर बंदी बना लिया था।
वक्ताओ ने कहा, सुभाष चंद्र बोस के नारे ‘तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूंगा’ से  प्रभावित होकर ही केशरी चंद सुभाष चंद्र बोस के संपर्क मे आए और आजाद हिंद फौज मे शामिल हो गए। इम्फाल मे अंग्रेजो के सामान को रोकने के लिए पुल उड़ाने की जिम्मेवारी निभाने मे पकड़े गए। जेल भेज, दिल्ली मे मुकदमा चला। कोर्ट परिसर मे ‘जय हिंद’ के नारे लगाए। 3 फरवरी 1945 को कोर्ट ने अपने फैसले मे केशरी चंद को 3 मई 1945 के दिन दिल्ली के लाल किले मे फांसी की सजा देने का फरमान जारी किया।
फांसी से चंद घन्टे पहले पिता से हुई मुलाकात मे केशरी चंद ने पिता का साहस बढ़ाने हेतु कहा था ‘आपका बेटा देश की आजादी के लिए काम आ रहा है, मुझे हंस कर विदा कीजिए’। अपनी अंतिम इच्छा मे इस बलिदानी ने कहा ‘भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद देखना चाहता हूं। मेरे मृत शरीर पर कोई विदेशी कपड़ा न रखा जाए। शरीर खादी मे लपेटा जाय’।
प्रबुद्ध वक्ताओ ने कहा जौनसार बाबर मे इस अमर शहीद की अमर गाथा को जौनसारी बोली के गीतों मे गाकर याद किया जाना सकुन देता है। देहरादून चकराता रामताल गार्डन मे प्रतिवर्ष 3 मई के दिन इस जाबांज अमर शहीद के शहादत दिवस पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जो इस देश प्रेमी के कर्तव्यो की याद दिलाता है। हमारी रैजीमेंटो के सैनिक इस अमर शहीद की बीरता व बलिदान से प्रेरणा ले, दिन-रात देश की सीमाओं की रक्षा मे तत्पर रह  कर्तव्य निर्वाह कर जीवन मे त्याग करते हैं। वक्ताओ ने कहा, आज की युवा पीढ़ी को इस अमर शहीद के बलिदान से प्रेरणा लेकर देश की उन्नति में सहयोग देना चाहिए। इस कार्य मे आज उत्तराखंड के युवाओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
वक्ताओ ने बेबाक होकर देश की भेद-भाव की राजनीति को भी कोसा। व्यक्त किया, जब देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले अनेकों बलिदानियों को प्रतिवर्ष सम्मान स्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं, उनके नाम पर बड़े-बड़े पार्कों, बस टर्मिनलों, सड़कों, स्कूलो इत्यादि का नाम रखा जाता है, उनकी मूर्तियां खड़ी की जाता हैं, तो देश की आजादी के लिए शहीद हुए इस 24वर्षीय अमर शहीद केशरी चंद को क्यों भुला व नकार दिया जाता है?
वक्ताओ ने मांग रखी इस अमर शहीद के नाम पर भी उक्त जगहों का नाम होना चाहिए। उत्तराखंड की स्थानीय बोली-भाषा की पाठ्य पुस्तकों मे उत्तराखंड के देश के लिए बलिदान हुए शहीदो के कृतित्व व व्यक्तित्व पर विषय होना चाहिए। पाठ्य पुस्तके होनी चाहिए। बलिदानियों द्वारा उपयोग मे लाई गई वस्तुओं व दस्तावेजो को संग्रहित कर निर्मित संग्रहालयो मे सजो कर रखा जाना चाहिए, जिससे आने वाली भविष्य की पीढ़ी ऐसे महान बलिदानियों से प्रेरणा लेकर देश प्रेम का जज्बा कायम रख सके, देश को तरक्की के पथ पर अग्रसर कर सके। वक्ताओ ने कहा, बलिदानियों के उक्त भाव दूर तक जाने पर ही राज्य व देश स्मृद्ध होगा।
अनेकों वक्ताओ ने दिल्ली प्रवास मे निवासरत तीस लाख उत्तराखंडियों की समस्याओं पर भी प्रकाश डाल कर व्यक्त किया, उत्तराखंड के लोगो की जनसरोकार सम्बंधित समस्याओं व मांगो को नकारा जाता रहा है। श्रोताओं का आह्वान कर वक्ताओ ने व्यक्त किया, वक्त की मांग है, समस्त प्रवासी उत्तराखंडियों को एक राय बना कर अपने समाज की उन्नति के लिए प्रत्येक क्षेत्र मे तत्पर व जागरूक होकर मिल-जुल व एकजुट होकर काम करना होगा। समस्याओं के निदान से तभी पार पाया जा सकेगा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फर नगर कांड के दोषियों को 25वर्ष गुजर जाने पर भी सजा न मिलने पर स्थापित सरकारो की वक्ताओ द्वारा निंदा की गई। मांग की गई, दोषियों को जल्द सजा मिले।
दिल्ली सरकार द्वारा गठित उत्तराखंड की बोली-भाषा की अकादमी गठन का भी वक्ताओ द्वारा स्वागत किया गया। उत्तराखंड की बोली-भाषा के किसी भी साहित्यकार को गठित अकादमी मे स्थान न दिए जाने पर वक्ताओ द्वारा रोष व्यक्त किया गया।
बीर बलिदानी के जीवन की गाथा पर रची कविताओ के द्वारा भी अमर शहीद केशरी चंद को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।
आयोजित शताब्दी वर्ष का समापन जौनसार बाबर ट्राईवल वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष मातवर सिंह नेगी द्वारा सभी वक्ताओ व श्रोताओं का आभार व्यक्त करने के साथ हुआ। मंच संचालन चमन सिंह रावत द्वारा किया गया।
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