उत्तराखण्डदिल्ली

उत्तराखंड आंचलिक बोली-भाषा की फिल्मों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलवाने वाले संजय जोशी के सम्मान में आयोजित हुई परिचर्चा

सी एम पपनै

नई दिल्ली। चाणक्यपुरी स्थित उत्तराखंड सदन में 24 अक्टूबर को उत्तराखंड की लोकभाषा, संस्कृति, सामाजिक पहचान और पहाड़ के ज्वलंत मुद्दों को आंचलिक फिल्म निर्माण के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलवाने व उनका व्यापक प्रचार प्रसार करने में प्रेरणादाई योगदान देने वाले तथा एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी, प्रभावी सामाजिक दृष्टिकोण, मृदुभाषी, अग्रणी उद्यमी व समाजसेवी संजय जोशी के जीवन पर यादगार व प्रेरणादाई परिचर्चा का प्रभावशाली आयोजन एयर वाइस मार्शल, वयोवृद्ध वी एस एम राजेश भंडारी मुख्य अतिथि के सानिध्य में तथा उत्तराखंड के अनेको प्रेरणाश्रोत व प्रबुद्ध जनों व पत्रकारों में प्रमुख, सुशीला रावत, आर एस रावल (आईआरएस सेवानिवृत्त प्रधान आयकर आयुक्त), हंसा दत्त लोहनी (विंग कमांडर एवं पायलट), मदन मोहन सती (मीडिया समन्वयक मुख्यमंत्री उत्तराखंड), ओ पी मिश्रा (आईएएस सेवानिवृत्त मुख्य सचिव), प्रेम सिंह रावत (अध्यक्ष डीयूयूएस), संजीव सरीन (लेखक एवं संपादक), आकाश जोशी, सुनील नेगी व राजू बोरा (वरिष्ठ पत्रकार), गोपाल उप्रेती (गिनीज बुक रिकॉर्ड धारक), नरेंद्र लडवाल (सु-प्रसिद्ध समाजसेवी व अध्यक्ष स्वत्थान), संजय दरमोड़ा व समीर शर्मा (अधिवक्ता) के साथ-साथ अन्य जनों में प्रमुख लक्ष्मी रावत, त्रिलोक पी जोशी, भुवन रावत, हेम पंत, डॉ शरद जोशी, सुधीर धर, मुकुंद धर, आर्ची शर्मा, सुधीर पंत, जगदीश नेगी, राहुल बडोला, कुलदीप असवाल, देवेंद्र वर्मा, नीता जोशी, जीवन चंद सपत्नीक तथा नीरज बवारी की प्रभावी उपस्थिति में आयोजित की गई।

उत्तराखंड की विभूति संजय जोशी के सम्मान में आयोजित परिचर्चा में आयोजक संस्था द्वारा सभी वक्ताओं को सम्मान स्वरूप पारंपरिक पटका पहनाकर सम्मानित किया गया। परिचर्चा में मुख्य अतिथि एयर वाइस मार्शल, वयोवृद्ध वी एस एम राजेश भंडारी द्वारा कहा गया, संजय जोशी एक ऐसे दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी हैं जिन्होंने पहाड़ के प्रति अपने प्रेम को ठोस सिनेमाई कर्म में बदला है।

अन्य वक्ताओं द्वारा मुक्त कंठ से व्यक्त किया गया, फिल्म निर्माण के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन तथा उसका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रचार-प्रसार कर प्रेरणादाई योगदान दे रहे संजय जोशी केवल एक फिल्म निर्माता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे विभिन्न सम्मानित मंचों से उत्तराखंड की बोली-भाषा, लोक संस्कृति और समाज से जुड़े विषयों पर प्रतिबद्ध होकर विचार रखने वाले प्रबुद्ध व्यक्ति के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं।

वक्ताओं द्वारा कहा गया, मृदुभाषी, मिलनसार और सहज स्वभाव के संजय जोशी उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के सदा पक्षधर रहे हैं। पहाड़ से हो रहे पलायन, स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी और अपनी जड़ों से दूर होती युवा पीढ़ी जैसे विषयों को लेकर उनकी चिंता उनके सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती नजर आती है। कहा गया, संजय जोशी का सदा मानना रहा है, उत्तराखंड की पहचान उसकी भाषा, लोकगीतों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है। इन धरोहरों को जीवित रखने के लिए साहित्य, संगीत, सिनेमा और सामाजिक संवाद को निरंतर प्रोत्साहन मिलना आवश्यक है।

वक्ताओं द्वारा कहा गया, ‘चक्रव्यूह’और ‘घंगतौल’ जैसी उत्तराखंड की सुपरहिट आंचलिक फिल्म बनाने वाले तथा देश की आंचलिक फिल्मों में उत्तराखंड की फिल्मों को वृहद फलक पर पहचान देने का प्रयास और इनके निर्माण से संजय जोशी और उनकी टीम न सिर्फ़ उत्तराखंड के क्षेत्रीय सिनेमा बल्कि देश के अन्य आंचलिक सिने जगत में भी एक चर्चित नाम बन चुके हैं।

वक्ताओं द्वारा परिचर्चा में व्यक्त किया गया, संजय जोशी द्वारा जोधा फिल्म्स के बैनर तले निर्मित आंचलिक फिल्म ‘चक्रव्यूह’और ‘घंगतौल’ ने न केवल एक नई सोच को जन्म दिया बल्कि उक्त फिल्में दो-दो यूका अवॉर्ड्स से भी सम्मानित हुई। ‘घंगतौल’ फ़िल्म बॉक्स ऑफिस की सफलता के बाद इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित की गई। उक्त फिल्म को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड भी मिला। संजय जोशी का यह प्रयास इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि क्षेत्रीय फिल्मों को न केवल मनोरंजन का माध्यम मानकर प्रस्तुत किया गया, उत्तराखंड की आंचलिक बोली-भाषा और समाज की कहानी कहने का मंच भी बनाया। स्थानीय कलाकारों, लेखकों, संगीतकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को अवसर मिलने से उत्तराखंड के फिल्म जगत को आगे बढ़ने में प्रभावी मदद और प्रेरणा भी मिली।

वक्ताओं द्वारा कहा गया, सामाजिक सरोकारों से जुड़े संजय जोशी की विशेषता उनके सहज व्यवहार और सामाजिक विषयों के प्रति संवेदनशीलता को माना जा सकता है। उत्तराखंड के लोगों की समस्याओं, उनकी सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण को लेकर वे संवाद और सहभागिता के महत्व पर सदा जोर देते नजर आते हैं।

प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा कहा गया, दिल्ली-एनसीआर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बसे प्रवासी लोगों के लिए अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखना एक महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे में उत्तराखंडी फिल्मों, सांस्कृतिक आयोजनों और सामाजिक परिचर्चाओं के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है। पहाड़ों में पलायन की समस्या का समाधान रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से जुड़ा है। सिनेमा इन मुद्दों पर जनचेतना विकसित करने तथा लोगों को अपनी जन्मभूमि के प्रति संवेदनशील बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती है, उक्त विषयों व मुद्दों पर संजय जोशी सदा सचेत रहे हैं, उन्हें विभिन्न आयोजनों व कार्यक्रमों में सहभागिता कर उठाते भी रहते हैं। कहा गया, संजय जोशी जैसे फिल्म निर्माताओं के निष्ठा पूर्वक किए गए प्रयासों का महत्व व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

वक्ताओं द्वारा कहा गया, संजय जोशी जैसे व्यक्तित्वों पर होने वाली परिचर्चाएं उत्तराखंड की लोकभाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय सिनेमा और सामाजिक सरोकारों को व्यापक पहचान दिलाने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी पहल समाज में सकारात्मक संदेश देने के साथ-साथ जनहित के मुद्दों पर संवाद और सहभागिता की परंपरा को भी मजबूत करती है।

परिचर्चा में वक्ताओं द्वारा संजय जोशी को एक मिलनसार प्रकृति, असाधारण प्रतिभा, बुद्धिमत्ता और सबसे बढ़कर पहाड़ के प्रति उनके अटूट समर्पण को सराहा गया, उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। साथ ही फिल्म निर्माण में उच्च मानदंड स्थापित करने, नैनीताल जिले स्थित जोलीकोट में बसावट और जन के लिए आजीविका के अवसर सृजित कर रिवर्स पलायन सुनिश्चित करने जैसी स्वस्थ पहल का भी जिक्र वक्ताओं द्वारा किया गया। कहा गया, आज के समय में जब पलायन पहाड़ों को खोखला कर रहा है, संजय जोशी की उक्त सोच प्रशंसनीय, दूरदर्शी व अनुकरणीय है।

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