उत्तराखण्डस्वास्थ्य

संगठन की लंबी पारी से राज्यसभा तक: दिनेश आर्य के नाम ने उत्तराखंड की सियासत में बढ़ाई हलचल

दिनेश आर्य का विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ सफर भाजपा संगठन के विभिन्न दायित्वों से होता हुआ राष्ट्रीय राजनीति के नए पड़ाव तक पहुंचा

 

अमर चंद्र

नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा की एक सीट के लिए नैनीताल के वरिष्ठ नेता दिनेश आर्य को अपना प्रत्याशी घोषित कर राजनीतिक हलकों में चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया है। करीब चार दशक से संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे आर्य का नाम सामने आने के बाद उनके राजनीतिक सफर, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठन में निभाई गई जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने रविवार को उनके नाम की घोषणा की। राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 16 अक्टूबर को होना है।

अमर संदेश को दिनेश आर्य की उम्मीदवारी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर रावत ने दी। रावत ने आर्य के लंबे संगठनात्मक सफर और विभिन्न जिम्मेदारियों की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया कि उनका राजनीतिक जीवन किसी एक पद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्यार्थी परिषद से लेकर भाजपा के जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के संगठनात्मक दायित्वों तक फैला रहा है।

विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

दिनेश आर्य ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 1985 में वह विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता बने और वर्ष 1986 में उन्हें नैनीताल जिला संयोजक की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद उनका संगठनात्मक सफर भाजपा में आगे बढ़ा।

भाजपा में उन्होंने युवा मोर्चा और अनुसूचित मोर्चा समेत कई जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 1988 से 1991 तक वह युवा मोर्चा के नैनीताल जिला मंत्री रहे। इसके बाद अनुसूचित मोर्चा के जिलाध्यक्ष, युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष और अनुसूचित मोर्चा के प्रदेश महामंत्री जैसे दायित्व भी संभाले। वर्ष 2002 से वह भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी से जुड़े रहे और 2007 से 2010 तक भाजपा नैनीताल के जिलाध्यक्ष रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़ी पृष्ठभूमि

दिनेश आर्य की राजनीतिक यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख मिलता है। संघ के संगठनात्मक प्रशिक्षण और विद्यार्थी परिषद से शुरू हुए उनके सार्वजनिक जीवन ने उन्हें आगे भाजपा संगठन की विभिन्न जिम्मेदारियों तक पहुंचाया।

यही कारण है कि आर्य की राजनीतिक पहचान को केवल चुनावी राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उनका लंबा सफर संगठन के विभिन्न स्तरों पर काम करने और कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहने से जुड़ा रहा है।

अनुसूचित जाति मोर्चे में राष्ट्रीय जिम्मेदारी

भाजपा संगठन में दिनेश आर्य को राज्य से बाहर भी काम करने का अवसर मिला। वर्ष 2017 से 2021 तक वह भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव और पंजाब प्रभारी रहे। इस जिम्मेदारी के दौरान उनका संगठनात्मक अनुभव उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर भी विस्तारित हुआ।

राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में उनके चयन के बाद उनका अनुसूचित जाति मोर्चे से जुड़ा लंबा संगठनात्मक अनुभव भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बना है। हालांकि भाजपा ने उम्मीदवार घोषित करते समय चयन के पीछे कोई विस्तृत सामाजिक या राजनीतिक कारण आधिकारिक रूप से नहीं बताया है।

मुख्यमंत्री धामी के साथ भी निभाई जिम्मेदारी वर्ष 2023 से वह उत्तराखंड सरकार की राज्यस्तरीय पेयजल अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में दायित्व निभा रहे हैं। उन्हें राज्य मंत्री स्तर का दर्जा प्राप्त है।

इस तरह उनके राजनीतिक अनुभव में संगठन के साथ-साथ सरकार और जनसंपर्क से जुड़ी जिम्मेदारियां भी शामिल रही हैं।

नैनीताल से राज्यसभा तक पहुंचा सफर

दिनेश आर्य का राजनीतिक आधार नैनीताल और कुमाऊं क्षेत्र से जुड़ा रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले वह नैनीताल विधानसभा सीट से भाजपा टिकट के दावेदारों में शामिल थे। पार्टी ने उस चुनाव में सरिता आर्य को प्रत्याशी बनाया था। इसके बावजूद आर्य संगठन के साथ सक्रिय बने रहे।

अब भाजपा ने उन्हें राज्यसभा के लिए प्रत्याशी बनाकर राष्ट्रीय राजनीति के उच्च सदन की ओर बढ़ने का अवसर दिया है। उनके नाम की घोषणा के साथ कुमाऊं क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी चर्चा शुरू हुई है।

2027 से पहले राजनीतिक चर्चा का नया पहलू

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। ऐसे समय में लंबे संगठनात्मक अनुभव वाले नेता को राज्यसभा के लिए आगे किए जाने से भाजपा की संगठनात्मक राजनीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है।

दिनेश आर्य की उम्मीदवारी को लेकर यह भी चर्चा है कि उनके संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता है। हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव पर इसका क्या राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा, इस पर अभी किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पर नजर

राज्यसभा की उत्तराखंड सीट के लिए नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है। नामांकन पत्रों की जांच 7 अक्टूबर को और नाम वापसी 9 अक्टूबर तक होगी। मतदान और मतगणना 16 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। मौजूदा राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है, जिसके कारण यह चुनाव हो रहा है।

दिनेश आर्य के नाम की घोषणा के साथ अब उत्तराखंड की राजनीति में चर्चा का केंद्र उम्मीदवार के राजनीतिक सफर से आगे बढ़कर राज्यसभा में उनकी संभावित भूमिका पर भी है। संगठन से शुरू हुई उनकी लंबी यात्रा अब उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के उस मंच तक ले जाने की दिशा में है, जहां उत्तराखंड से जुड़े विषयों को संसद में उठाने का अवसर मिलेगा।

अमर संदेश के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर रावत से प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिनेश आर्य का सबसे प्रमुख पक्ष उनका लंबा संगठनात्मक अनुभव हैविद्यार्थी परिषद से शुरुआत, भाजपा के जिला एवं प्रदेश संगठन में जिम्मेदारियां, अनुसूचित जाति मोर्चे में राष्ट्रीय दायित्व, वर्तमान में राज्य मंत्री स्तर का दायित्व। यही पृष्ठभूमि उनकी राज्यसभा उम्मीदवारी को उत्तराखंड की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना रही है।

Share This Post:-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *