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जीआईसी बड़ासी में सजा उत्तराखंड की संस्कृति का रंग, ‘गढ़ भोज’ ने बांधी विरासत की डोर

पारंपरिक परिधानों में सजे छात्र-छात्राओं ने लगाए पहाड़ी व्यंजनों के स्टॉल, मंडुवा–झंगोरा के स्वास्थ्य लाभों से कराया परिचित

 

अमर संदेश रायपुर, देहरादून, 7 अक्टूबर। राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज बड़ासी, रायपुर में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक खान-पान और स्थानीय कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘गढ़ भोज’ का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान विद्यालय परिसर उत्तराखंड की लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। पारंपरिक परिधानों, पहाड़ी व्यंजनों और विद्यार्थियों की आकर्षक प्रस्तुतियों ने आयोजन को विशेष बना दिया।

 कार्यक्रम में छात्र-छात्राएं घाघरा-पिचौड़ा सहित पारंपरिक पहाड़ी परिधानों में सजे नजर आए। विद्यार्थियों ने अपने हाथों से तैयार किए गए विभिन्न पहाड़ी व्यंजनों के आकर्षक स्टॉल लगाए। स्टॉलों पर मंडुवे की रोटी, गहत की दाल, झंगोरे की खीर और पहाड़ी रायता सहित अनेक पारंपरिक व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहे।

अतिथियों एवं शिक्षकों ने विभिन्न स्टॉलों का निरीक्षण किया और विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की। बच्चों ने जिस उत्साह और आत्मविश्वास के साथ अपने व्यंजनों तथा उनकी विशेषताओं की जानकारी दी, वह कार्यक्रम की खास उपलब्धि रही।

‘श्री अन्न’ के माध्यम से स्वास्थ्य और स्थानीय खेती का संदेश

कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने मंडुवा और झंगोरा जैसे पारंपरिक मोटे अनाजों को लेकर जागरूकता प्रदर्शनी भी लगाई। चार्ट एवं अन्य माध्यमों से बच्चों ने इन स्थानीय अनाजों के पोषण संबंधी महत्व को समझाया।

विद्यार्थियों ने आगंतुकों को बताया कि उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज हमारी खाद्य संस्कृति के साथ-साथ स्थानीय कृषि व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बच्चों ने फास्ट फूड को कम करने और पारंपरिक पहाड़ी मिलेट्स को अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने अंग्रेजी संवाद के माध्यम से पहाड़ी खेती, स्थानीय उत्पादों और किसानों को प्रोत्साहित करने की अपील भी की।

गिरीश चंद्र घिल्डियाल के मार्गदर्शन में बच्चों ने दिखाई प्रतिभा

कार्यक्रम के सफल आयोजन एवं विद्यार्थियों के कुशल मार्गदर्शन में वरिष्ठ प्रवक्ता गिरीश चंद्र घिल्डियाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके मार्गदर्शन में छात्र-छात्राओं ने न केवल पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, स्थानीय अनाज और पारंपरिक खान-पान के महत्व को भी प्रभावी ढंग से सामने रखा।

उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने पूरे आत्मविश्वास के साथ अतिथियों के समक्ष अपनी प्रस्तुतियां दीं और अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जुड़ाव का परिचय दिया।

अतिथियों ने की बच्चों के प्रयासों की सराहना

कार्यक्रम में विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य राकेश मोहन रावत, पूर्व प्रधानाचार्य परमानंद सकलानी, जीआईसी भगवानपुर धारकोट के प्रधानाचार्य अतुल श्रीवास्तव तथा सिला के प्रधानाध्यापक प्रदीप नैथानी, सहित अन्य अतिथियों की उपस्थिति रही। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा तैयार किए गए व्यंजनों, प्रदर्शनी और प्रस्तुतियों का अवलोकन किया तथा बच्चों की प्रतिभा, मेहनत और अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता की सराहना की।

‘हमारे अपने स्वाद, हमारी अपनी पहचान’ का संदेश

कार्यक्रम के बैनर पर अंकित संदेश

“हमारे अपने स्वाद, हमारी अपनी पहचान आइए, गढ़वाली व्यंजनों के साथ मिलकर सहेजें अपनी समृद्ध संस्कृति”पूरे आयोजन की भावना को सार्थक करता नजर आया।

‘गढ़ भोज’ ने विद्यार्थियों को अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और पारंपरिक खान-पान से जोड़ने के साथ यह संदेश भी दिया कि स्थानीय भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, कृषि, परंपरा और पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

विद्यालय परिसर में आयोजित इस आयोजन ने नई पीढ़ी को उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने और पारंपरिक खान-पान को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सार्थक पहल का रूप लिया।

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