मुंबई राजभवन में उतराखण्ड की प्रतिनिधि भाषा का होगा सम्मेलन

मुंबई: उतराखण्डी भाषा प्रसार समिति द्वारा मुंबई राजभवन में दिनांक 4 जून, 2022 को प्रातः 11 बजे से उत्तराखंड की प्रतिनिधि भाषा पर परिचर्चा के लिए सम्मेलन आयोजित किया है। इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि महाराष्ट्र के राज्यपाल महामहिम श्री भगत सिंह कोश्यारी जी हैं। इस सम्मेलन में उत्तराखंड की प्रतिनिधि भाषा पर चर्चा हेतु उत्तराखंड से विद्वान साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया है जिसमें कुमाऊं मंडल से श्री गणेश पाठक, श्री नीलांबर पाण्डेय, गढ़वाल मंडल से डॉ आशा रावत और डॉ बिहारीलाल जलन्धरी उपस्थित हो रहे हैं।
इस कार्यक्रम का संयोजन मुंबई से श्री चामू सिंह राणा कर रहे हैं। उत्तराखंड की प्रतिनिधि भाषा के लिए भविष्य में एक पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाएगा जिसका संपादन मुंबई से डॉ राजेश्वर उनियाल के साथ एक संपादन मंडल करेगा। भाषा विद्वान व साहित्यकार डॉ बिहारीलाल जलन्धरी उत्तराखंड की मुख्य गढ़वाली कुमाऊनी बोलियों के एकीकरण के लिए 1996 से इस विषय पर काम कर रहे हैं। उन्होंने सबसे पहले इसके प्रचार प्रसार के लिए एक पाक्षिक समाचार पत्र “देवभूमि की पुकार” का प्रकाशन 1996 से आरंभ किया। इसके साथ साथ 2005 से एक वार्षिक पत्रिका “उतराखण्ड की भाषा हेतु संकल्प” का प्रकाशन लगातार 2015 तक किया। वे उतराखण्ड की गढ़वाली कुमाऊनी जौनसारी बोलियों के साहित्यकारों को अपनी रचनाओं में सहोदर भाषाओं के शब्दों को पिरोने के लिए उत्साहित करते रहे और उनकी रचनाएं देवभूमि व संकल्प में प्रकाशित कर समाज को जागरूक करते रहे। उनका एक ही मत है कि उत्तराखंड में सरकारें भाषा परिषद या भाषा अकादमी गठन करने से इसीलिए डर रही हैं कि यहां की कोई प्रतिनिधि भाषा स्थापित करने के लिए पिछले बाईस वर्षों से काम नहीं हुआ, जिस पर अब बड़ी सिद्दत से काम आरंभ करने की आवश्यकता है। उत्तराखंड की प्रतिनिधि भाषा को उत्तराखंड के वरिष्ठ व कद्दावर नेता श्री भगत सिंह कोश्यारी का बरदहस्त मिला है हो सकता है कि निकट भविष्य में उत्तराखंडी भाषा के लिए एक सुखद प्रयास आरंभ होगा।
डॉ जलन्धरी के मार्गदर्शन में उक्त समिति ने “मौळ्यार” नाम से एक पाठ्यक्रम प्रकाशित किया है जो कुमाऊनी गढ़वाली के समान शब्दों को समेकीकृत कर एक प्रारूप की तरह तैयार किया है। जो कक्षा एक से दसवीं तक एक पाठ्य पुस्तक है जो एक से पांचवीं और छठी से दसवीं तक दो भागों में है भविष्य में इसके दो अलग अलग भाग प्रकाशित करने की योजना है।
ज्ञातव्य हो कि उतराखण्डी भाषा के प्रारूप प्रथम पाठ्यक्रम मौल्यार हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल, उतराखण्ड का जौनसार क्षेत्र, राजस्थान और महाराष्ट्र की सामाजिक संस्थाओं तक पहुंच चुका है फलस्वरूप इसके आधार पर अध्ययन अध्यापन का काम आरंभ भी हो चुका है। बोलियों के इस समेकीकृत अध्ययन से हमारे समाज में “मैं गढ़वाली तू कुमाऊनी वह जौनसारी” की भावना समाप्त होकर हम उतराखण्डी की भावना उभरेगी। एक माइने में जिस तरह कई बोलियों के शब्दों से हिंदी खड़ी बोली का उद्भव हुआ उसी मध्य पहाड़ी बोलियों के शब्दों से उत्तराखंडी भाषा का उद्भव का बीजारोपण हो चुका है। जिसे अव उतराखण्ड सरकार द्वारा गति दी जानी है।
इस सम्मेलन के संयोजक श्री चामू सिंह राणा ने कहा कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य स्थापित होने के बाद आज सन 2022 तक उत्तराखंड में बोली जाने वाली भाषाओं पर कार्य करने व उनका विकास करने के लिए किसी तरह का काम नहीं हो पाया । जिसका मुख्य कारण यहाँ बोली जाने वाली मुख्य गढ़वाली , कुमाऊँनी व जौनसारी इत्यादि बोलियों में समानता होने के बावजूद भी साहित्यकारों द्वारा एक दूसरे से लगातार दूरी बनाते हुए अपनी अपनी बोलियों की अकादमी की माँग करना है ।
उत्तराखंड में इसके अलावा भी दस से ज़्यादा अन्य बोलियाँ बिलुप्ति के कगार पर हैं जिनके शब्दों का संरक्षण होना आवश्यक है । यदि सरकार इस समस्या पर ध्यान नहीं देंगी तो आने वाले भविष्य में इनमें से कई बोलियाँ विलुप्त हो जाएँगी।
हमारा उद्देश्य है कि हम इस तरह के भाषा सम्मेलन कर सरकार का ध्यान इस समस्या के समाधान हेतु आकर्षित करेंगे। उन्होंने कहा कि डॉ जलंधरी इस विषय पर पूरे देश में भ्रमण कर उतराखण्ड के प्रवासियों को अपनी बोली भाषा को संस्थाओं के माध्यम से बोलने पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित कर समर्थन भी प्राप्त कर रहे हैं। हम लोग निकट भविष्य में उत्तराखंड समाज की प्रवासी संस्थाओं का देहरादून में एक बड़ा सम्मेलन करेंगे। जो उतराखण्ड की प्रतिनिधि भाषा उतराखण्डी का भविष्य निर्धारित करेगा। इस संबंध में हमें उतराखण्ड सरकार वहां का जनमानस समाजसेवी और साहित्यकारों के सहयोग की अपेक्षा है।

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