तुलनात्मक विश्व साहित्य पर विशेष व्याख्यानमाला विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
डॉ.के सी पांडे
हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल द्वारा आयोजित तुलनात्मक विश्व साहित्य विषयक अनलाइन व्याख्यानमाला विश्वविद्यालय की वैश्विक साहित्यिक प्रतिबद्धता, अकादमिक उत्कृष्टता तथा सांस्कृतिक समावेशिता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक उपक्रम है। यह व्याख्यानमाला कुलपति एवं इस शृंखला की अध्यक्षा प्रोफेसर नंदिनी साहू के दूरदर्शी एवं प्रेरणादायी नेतृत्व में प्रारंभ की गई। अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. साहू ने कहा कि विश्वविद्यालय में उनके कार्यभार ग्रहण करने के प्रथम मास में ही इस व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया गया, जो वैश्विक साहित्यिक संवाद के प्रति विश्वविद्यालय की गहन निष्ठा एवं प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण है।
प्रोफेसर नंदिनी साहू
कुलपति, हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
उन्होंने इस तथ्य पर विशेष बल दिया कि हिंदी विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल पारंपरिक शिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक साहित्यिक विमर्शों को प्रोत्साहित करना तथा देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों, चिंतकों एवं साहित्यकारों को एक साझा बौद्धिक मंच प्रदान करना भी है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विश्वविद्यालय के समर्पित प्राध्यापकगण तथा जिज्ञासु छात्र-समुदाय इस प्रकार की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करते हुए एक प्रेरणादायी, समावेशी एवं सृजनात्मक वातावरण का निर्माण कर रहे हैं, जो साहित्यिक चिंतन के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध हो रहा है।
यह विशेष व्याख्यानमाला अब तक 34 से अधिक वेबिनारों के माध्यम से संपन्न हो चुकी है, जिनमें भारत एवं विश्व के विभिन्न देशों से 50 से अधिक प्रतिष्ठित विद्वानों, साहित्यकारों, अनुवादकों एवं आलोचकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। इस व्याख्यानमाला में प्रो. गौरहरि बेहरा, प्रो. सविता सिंह, प्रो. आर. राज राव, प्रो. शबीना निशात ओमर, प्रो. कुहू चानना, प्रो. स्वाति पाल, प्रो. रवीन्द्रनाथ शर्मा, प्रो. धुर्जती शर्मा, डॉ. चित्तरंजन मिश्रा, अभिषेक रथ, दिनेश कुमार माली, डस्टिन पिकरिंग तथा अनेक अन्य विद्वानों की विद्वतापूर्ण उपस्थिति ने इसे एक वैश्विक साहित्यिक विमर्श का महत्त्वपूर्ण मंच बना दिया है। इस व्याख्यानमाला ने तुलनात्मक साहित्य के विविध आयामों को उद्घाटित करते हुए साहित्य को बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक एवं अंतःविषयक दृष्टिकोण से समझने की नई संभावनाओं को साकार किया है।
इस व्याख्यानमाला का उद्घाटन प्रख्यात साहित्यचिंतक प्रो. अनीसुर रहमान द्वारा किया गया, जिनका उद्घाटन व्याख्यान तुलनात्मक साहित्य के सैद्धांतिक एवं दार्शनिक आधारों का अत्यंत गहन एवं प्रभावपूर्ण विवेचन प्रस्तुत करता है। अपने व्याख्यान में उन्होंने सैमुअल टेलर कॉलरिज के काव्यचिंतन के संदर्भ में रूपक, प्रतीक एवं मिथक की सर्जनात्मक भूमिका का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि ये साहित्यिक उपकरण केवल अलंकरण के साधन नहीं हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के व्यापक एवं सार्वभौमिक अनुभवों के संवाहक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मिथक एवं प्रतीक मानव चेतना के गहनतम स्तरों को अभिव्यक्त करते हैं तथा विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के मध्य संवाद स्थापित करने में सहायक होते हैं। इस प्रकार तुलनात्मक साहित्य मानवता की समग्र छवि को समझने का एक प्रभावी माध्यम बन जाता है।प्रो. रहमान ने तुलनात्मक साहित्य के ऐतिहासिक विकास का भी विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया कि प्रारंभ में यह अनुशासन यूरोपीय साहित्य तक सीमित था, किंतु समय के साथ इसका स्वरूप व्यापक एवं समावेशी हो गया है। उन्होंने भारतीय भाषाओं की बहुलता तथा उनकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए अनुवाद की भूमिका को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया। उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया कि अनुवाद के माध्यम से ही भारतीय साहित्य को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि अनुवाद केवल भाषांतरण की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक संवाद, वैचारिक आदान-प्रदान तथा सामाजिक चेतना के विस्तार का सशक्त माध्यम है। उनके अनुसार तुलनात्मक साहित्य में सिद्धांत-निर्माण (Theorisation) की प्रक्रिया अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि सिद्धांत ही साहित्यिक अंतर्संबंधों की गहन व्याख्या का आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने ‘सार्वभौमिक साहित्यिक कैनन’ की अवधारणा को चुनौती देते हुए यह प्रतिपादित किया कि विश्व साहित्य को विविध सांस्कृतिक स्वरों के अंतर्संवाद के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी एक केंद्रीकृत संरचना के रूप में।
प्रो. रवीन्द्रनाथ शर्मा ने अपने व्याख्यान में पूर्वोत्तर भारत के भौगोलिक, भाषिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने इस क्षेत्र की साहित्यिक परंपराओं की प्राचीनता एवं सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हुए रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में पूर्वोत्तर भारत की उपस्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि पूर्वोत्तर भारत का साहित्य भारतीय साहित्यिक परंपरा का अभिन्न अंग है तथा इसे वैश्विक साहित्यिक विमर्श में समुचित स्थान प्रदान किया जाना चाहिए।प्रो. धुर्जती शर्मा ने अपने व्याख्यान में पूर्वोत्तर भारत के साहित्य को विश्व साहित्य के संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय साहित्य वैश्विक साहित्यिक संवाद को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अम्बिका आनंद ने भक्ति साहित्य के अनुवाद से संबंधित चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि भक्ति साहित्य का अनुवाद केवल भाषिक रूपांतरण नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्सृजन की प्रक्रिया है, जिसमें मूल भाव, आध्यात्मिक चेतना एवं सांस्कृतिक संदर्भों का संरक्षण आवश्यक है।प्रो. लक्ष्मीश्री बनर्जी ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्य का सूफी एवं अतीन्द्रियवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए उनके साहित्य की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक गहराई को उद्घाटित किया। प्रो. आर. राज राव एवं प्रो. कुहू चानना ने अपने व्याख्यान में अनुवाद, सांस्कृतिक संकरता तथा हाशिए के स्वरों की वैश्विक उपस्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि तुलनात्मक साहित्य के माध्यम से विभिन्न सांस्कृतिक अनुभवों को वैश्विक स्तर पर अभिव्यक्ति प्राप्त होती है तथा यह साहित्यिक समावेशिता को प्रोत्साहित करता है।प्रो. राधा चक्रवर्ती ने पाठ-मानचित्रण (Textual Cartography) एवं अनुवाद की भूमिका का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया कि अनुवाद साहित्यिक परंपराओं के मध्य सेतु का कार्य करता है। डॉ. मीनाक्षी मोहन ने दक्षिण एशियाई बाल साहित्य के वैश्विक संदर्भों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया कि बाल साहित्य सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं प्रसार का महत्त्वपूर्ण माध्यम है।प्रो. राज कुमार ने दलित साहित्य को वैश्विक साहित्यिक विमर्श के संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया कि दलित साहित्य सामाजिक असमानता एवं अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है। उन्होंने दलित साहित्य की तुलना अफ्रीकी-अमेरिकी एवं अन्य हाशियाकृत साहित्यिक परंपराओं से करते हुए इसकी वैश्विक प्रासंगिकता को स्पष्ट किया। डॉ. निशि पुलुगुरथा ने साहित्य में अस्मिता, स्थान एवं हाशियाकरण के प्रश्नों का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि साहित्य सामाजिक यथार्थ का सजीव प्रतिबिंब है तथा यह उपेक्षित वर्गों की आवाज को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
प्रो. टी. एस. सत्यनाथ ने लोक साहित्य को सांस्कृतिक स्मृति, सामूहिक चेतना एवं अस्मिता का महत्त्वपूर्ण स्रोत बताते हुए इसकी वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि लोक साहित्य केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह वर्तमान एवं भविष्य की सांस्कृतिक चेतना का आधार है। प्रो. जी. जे. वी. प्रसाद का व्याख्यान विशेष रूप से प्रभावशाली रहा, जिसमें उन्होंने भाषिक न्याय, सांस्कृतिक समावेशिता एवं साहित्यिक विविधता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि साहित्य मानव अनुभवों की बहुविध अभिव्यक्ति का माध्यम है तथा इसे समावेशी एवं व्यापक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।
समग्रतः, यह विशेष व्याख्यानमाला हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की वैश्विक साहित्यिक दृष्टि, अकादमिक उत्कृष्टता एवं सांस्कृतिक समावेशिता का सशक्त उदाहरण है। इस व्याख्यानमाला ने छात्रों, शोधार्थियों एवं प्राध्यापकों को विश्व साहित्य के बहुआयामी स्वरूप से परिचित कराया तथा साहित्य को एक जीवंत, गतिशील एवं सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में समझने की प्रेरणा प्रदान की। माननीया कुलपति प्रो. नंदिनी साहू के दूरदर्शी नेतृत्व में यह व्याख्यानमाला विश्वविद्यालय को वैश्विक साहित्यिक विमर्श के एक महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी पहल सिद्ध हुई है। यह व्याख्यानमाला न केवल साहित्यिक ज्ञान का विस्तार करती है, अपितु वैश्विक बौद्धिक समुदाय के निर्माण की दिशा में भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है।

