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जीडीपी वृद्धि आंकड़े को लेकर विवाद – क्या कहती है सरकार

लेखक (महाबीर सिंह – वरिष्ठ पत्रकार) –

चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकडे जब से जारी हुये हैं तभी से लगातार चर्चा का विषय बने हुये हैं।

भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने 31 अगस्त को चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े जारी किये। ये आंकड़े आधार वर्ष 2022-23 की नई श्रृंखला के तहत जारी किये गये। इनके अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में स्थिर मूल्यों पर जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही जबकि वर्तमान बाजार मूल्यों पर इसमें 10.3 प्रतिशत वृद्धि हुई। इसी प्रकार सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में स्थिर मूल्यों पर 8.2 प्रतिशत और बाजार मूल्य पर जिसे नाॅमिनल वृद्धि भी कहते हैं, 11.5 प्रतिशत रही।

देश दुनिया के वर्तमान हालातों के बीच 7.8 प्रतिशत वृद्धि को अच्छी वृद्धि माना जा रहा है। ऐसे समय जब कच्चे तेल के दाम लगातार मजबूत बने हुये हैं, आयात महंगा और निर्यात करना मुश्किल होता जा रहा है, डालर के मुकाबले रूपये की घटबढ़ को थामने रिजर्व बैंक को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है, तब दुनिया में सबसे तेज वृद्धि हासिल करना किसी को भी चैंका सकता है। यही वजह है कि सरकार के आलोचकों और आर्थिक जगत के कुछ जानकारों को इन आंकड़ों में कुछ झोल दिखाई देता है।

आंकड़ों को लेकर सबसे पहला सवाल यह उठा है कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बाजार मूल्य पर कुल जीडीपी 86 लाख करोड़ रूपये थी, जिसे नई श्रंृखला में घटाकर 80 लाख करोड़ रूपये दिखाया गया है। आलोचकों को लगता है कि इस साल के आंकड़े बेहतर दिखाने के लिये ऐसा किया गया। यदि पिछले साल की पहली तिमाही के आंकड़ों को कम नहीं किया जाता तो मौजूदा मूल्य पर जीडीपी वृद्धि मात्र 2.6 प्रतिशत ही रहती। वहीं वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत के स्थान पर शून्य अथवा नकारात्मक होती।

दरअसल, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में पुराने आधार वर्ष 2011-12 के तहत जीडीपी मूल्य का शुरूआती अनुमान 86.05 लाख करोड़ रूपये था। फरवरी 2026 में जब 2022-23 आधार वर्ष के साथ नई श्रृंखला जारी हुई तो यह आंकड़ा संशोधित होकर 80.32 लाख करोड़ रूपये रह गया। जून 2026 में नये संकेतक और आंकड़े उपलब्ध होने पर यह मामूली सुधरकर 80.44 लाख करोड़ रूपये हो गया और अगस्त 2026 में नये औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) श्रृंखला गणना में शामिल होने के बाद यह आंकड़ा घटकर 80 लाख करोड़ रूपये रह गया। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी मूल्य 88.27 लाख करोड़ रूपये से जब इसकी तुलना की गई तो 10.3 प्रतिशत नाॅमिनल वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी तरफ आंकड़ों में झोल देखने वालों का कहना है कि पुरानी श्रंृखला के मूल्य को जानबूझकर कम किया गया है, यदि 86.05 लाख करोड़ रूपये से ताजा आंकड़ों की तुलना की जाये तो पहली तिमाही में नाॅमिनल जीडीपी वृद्धि मात्र 2.6 प्रतिशत होती। वहीं वास्तविक यानी रियल जीडीपी वृद्धि शून्य अथवा नकारात्मक होती।

सरकार का कहना है कि नये आंकड़ों को जीडीपी श्रृंखला में बदलाव को ध्यान में रखते हुये समझा जाना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि नवीनतम और समान आधार श्रृंखला के आंकड़ों की तुलना करने के बजाय 2011-12 की पुरानी श्रृंखला की 2022-23 की नई श्रृंखला आंकड़ों से सीधी तुलना कैसे की जा सकती है। पिछले आंकड़ों में बदलाव इसलिये नहीं किया गया कि इस साल की वृद्धि उंची दिखे बल्कि यह जीडीपी श्रृंखला में बदलती कार्यप्रणाली और आंकड़ों के संशोधन को परिलक्षित करता है। तिमाही श्रृंखला में मात्रा अथवा मूल्य से जुड़े सैकड़ों संकेतकों का उपयोग किया जाता है। इसमें — फसल उत्पादन में वृद्धि, सीमेंट उत्पादन वृद्धि सूचकांक, स्टील खपत वृद्धि, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में वृद्धि जैसे मात्रा संबंधी कई संकेतक शामिल होते हैं। इसमें अर्थव्यवस्था में पिछले एक दशक में ई-कामर्स, डिजिटल पेमेंट, गिग वर्क और हरित उुर्जा जैसे संरचनात्मक बदलावों को शामिल किया गया है।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने चीजों को और स्पष्ट करते हुये कहा है कि नई श्रृंखला में अद्यतन प्रशासनिक आंकड़ों के साथ ही नया आउटपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक और बैंकिंग सर्विसिज मूल्य सूचकांक भी शामिल किया गया है। नई श्रृंखला में दो बदलाव महत्वपूर्ण हैं – पहला आधार वर्ष में बदलाव और दूसरा विनिर्माण क्षेत्र के लिये दोहरी अपस्फिीति पद्धति अपनाना। राष्ट्रीय लेखा साख्यिकी (एनएएस) में वास्तविक विकास दर गणना के लिये आधार वर्ष संदर्भ मूल्यों को उपयोग में लाया जाता है। समय समय पर इनमें बदलाव भी किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संबंधित मूल्य मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों का सही प्रतिनिधित्व करते हों।

जीडीपी की नई श्रृंखला बेहतर और अधिक मजबूत कार्यप्रणाली को परिलक्षित करती है। इसमें विनिर्माण क्षेत्र में विभिन्न उद्योगों में दोहरी अपस्फीति प्रणाली अपनाई गई है। इसके तहत स्थिर मूल्य पर सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) हासिल करने के लिये कारखानों के अंतिम उत्पाद और उसमें इस्तेमाल होने वाले तमाम कच्चे माल और सेवाओं की खपत को अलग अपस्फीति समायोजन के साथ मापा जाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी दोहरी अपस्फीति को पसंदीदा तरीका बताया है। अपस्फीति से तात्पर्य महंगाई से उलट स्थिति है। कई बार जब कच्चे माल के मूल्यों में अंतिम उत्पाद मूल्य की तुलना में ज्यादा तेजी से वृद्धि होती है तो नाॅमिनल जीवीए रियल जीवीए के मुकाबले धीमी चाल से बढ़ सकती है।

मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र जीवीए़ तैयार करते समय इसी दोहरी अपस्फीति प्रणाली को अपनाया गया है और यही वजह है कि इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र की नाॅमिनल जीवीए वृद्धि 7.7 प्रतिशत जबकि रियल जीवीए वृद्धि 9.2 प्रतिशत रही। परिणामस्वरूप बाजार मूल्य और वास्तविक जीवीए वृद्धि के बीच के अंतर से 1.5 प्रतिशत नकारात्मक अंतर्निहित जीवीए अपस्फीति पैदा हुई। यानी इस क्षेत्र में मूल्य स्तर में कमी दर्ज की गई। मंत्रालय के अनुसार ऐसे क्षेत्र जहां इनपुट मूल्य वृद्धि उनके आउटपुट मूल्यों की तुलना में अधिक रही उनमें कपड़ा विनिर्माण और कपास की छंटाई, बेसिक धातु विनिर्माण, रबड़ और प्लास्टिक उत्पादों का विनिर्माण आदि शामिल है।

मंत्रलाय ने नई श्रृंखला में जारी आंकड़ों को सही ठहराते हुये इसी प्रकार सिलसिलेवार हर क्षेत्र के बारे में बताया है।

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