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Amar sandesh देहरादूनसितंबर। उत्तराखंड की प्रमुख लोकभाषाओं गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर सरकार स्तर पर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। यह बात भाषा मंत्री खजानदास ने उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान कही।
उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के तत्वावधान में मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी तथा युवा कवि एवं भाषाविद आशीष सुंदरियाल ने भाषा मंत्री को उनके रेसकोर्स स्थित आवास पर ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए उत्तराखंड विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजने की मांग की गई।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाओं का समृद्ध इतिहास रहा है और इनमें साहित्य की विभिन्न विधाओं में लगातार सृजन हो रहा है। राज्य गठन के बाद भी इन प्रमुख आंचलिक भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और संस्थागत विकास के लिए अपेक्षित स्तर पर कार्य नहीं हुआ है।
ज्ञापन में गढ़वाली और कुमाऊंनी के लिए अकादमी के गठन, संविधान के अनुच्छेद 345 के अनुरूप राज्य स्तर पर मान्यता देने तथा विद्यालयी पाठ्यक्रम में इन भाषाओं को शामिल करने की दिशा में पहल करने की मांग भी की गई।
मंच की ओर से बताया गया कि गढ़वाली और कुमाऊंनी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर के साथ उत्तराखंड में भी भाषा शिक्षण की कक्षाएं आयोजित की जा रही हैं।
भाषा मंत्री खजानदास ने कहा कि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक रूप से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी अकादमी के गठन पर भी शीघ्र निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं में अपार संभावनाएं हैं और साहित्यकारों एवं भाषा के लिए कार्य कर रहे लोगों के प्रयासों से इन भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का प्रकाशन हो रहा है। सरकार भविष्य में लोकभाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए आगे बढ़कर कार्य करेगी।
इस अवसर पर आशीष सुंदरियाल ने अपनी वार्षिक पत्रिका चिट्ठी-पत्री तथा दिनेश ध्यानी ने अपना नवीन गढ़वाली कथा संग्रह बगत भाषा मंत्री को भेंट किया।
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