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उत्तराखंड जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर के पकवानों को पहली बार मिली सरकारी प्राथमिकता


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सी एम पपनैं

नई दिल्ली। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा जौनसार बाबर के खानपान में स्वादिष्ट व सुप्रसिद्ध रहे व्यंजनों में सिडकु, मशयाड़ा भात, चिल्लडे़ और शशाणी की विविधता को देखते हुए उत्तराखण्ड सदन दिल्ली में परोसी जाने वाली व्यंजनों की थाली में स्थान देकर जौनसार बाबर की सुप्रसिद्ध प्रवासी सामाजिक संस्था ‘जौनसार बावर जनजाति कल्याण समिति’ दिल्ली से जुड़े हजारों प्रवासी जनजातीय बंधुओ की चाहत को पूरा कर उक्त सामाजिक समूह के साथ-साथ अंचल के समस्त जौनसार बावर के लोगों में खुशी की लहर व्याप्त करवाई है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान को नया स्वरूप देने का काम किया है ।

जौनसार बाबर के उक्त व्यंजनों को उत्तराखंड सदन चाणक्यपुरी में परोसे जाने से पूर्व 30 दिसंबर को ‘जौनसार बाबर जनजातीय कल्याण समिति’ दिल्ली द्वारा संस्था चेयरमैन रतन सिंह रावत (आईआरएस), संस्था अध्यक्ष विद्यादत्त जोशी, महासचिव सुल्तान सिंह चौहान, उपाध्यक्ष अतर सिंह राणा, चमन सिंह रावत, संस्था पूर्व चेयरमैन कुलानंद जोशी (आईएएस), उर्मिला सिंह तोमर, संगीता सेमवाल इत्यादि इत्यादि के सानिध्य व राजेंद्र सिंह तोमर सेवानिवरत डीजीपी कोस्ट गार्ड एवं सदस्य नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट भारत सरकार की अध्यक्षता में उत्तराखण्ड सदन बैठक कक्ष में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आभार व्यक्त करने हेतु एक संगोष्ठी का आयोजन उत्तराखंड सदन अधिकारियों, कुमांऊ, गढ़वाल व जौनसार के प्रतिष्ठित जनों की उपस्थित में आयोजित की गई।

आयोजित संगोष्ठी में उपस्थित प्रबुद्ध प्रतिष्ठित जनों में प्रमुख पी सी नैलवाल पूर्व प्रवासी मंत्री उत्तराखंड सरकार, मदन मोहन सती मीडिया सलाहकार मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड, सदन संपत्ति अधिकारी रंजन मिश्रा, गोपाल उप्रेती बागवान एवं व्यवसायी, के सी पांडे प्रमुख समाजसेवी, प्रोफेसर हरेंद्र असवाल जाकिर हुसैन कालेज दिल्ली, रोशन गौड़ तथा सी एम पपनैं वरिष्ठ पत्रकार, गोपाल उनियाल व्यवसायी, जी आर नौटियाल उद्यमी, मनोज सेमवाल इंजीनियर इन चीफ नॉर्दर्न रेलवे, राजीव नैथानी जीएमआर ग्रुप, महेशचन्द्रा सेवानिवरत लोक सेवक भारत सरकार, पवन कुमार मैठाणी वरिष्ठ लाइब्रेरियन एवं प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय, करन देवरानी, कैलास पांडे, इत्यादि इत्यादि द्वारा अपना-अपना परिचय देकर व्यक्त किया गया, उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद से उत्तराखण्ड सदन दिल्ली में कुमांउ व गढ़वाल के ही पारंपरिक व्यंजन हर रविवार को परोसे जा रहे थे। जौनसार बावर के स्वादिष्ट व्यंजनों को उत्तराखण्ड सदन में मेहमानों व अगुंतकों को परोसे जाने की स्वीकृति देकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का निर्णय स्वागत योग्य व प्रशंसा योग्य है। उत्तराखंड सदन की भोजन थाली में वर्ष 2024 से प्रत्येक रविवार को जौनसार-बावर के व्यंजनों को स्थान मिलने से भोजन थाली अब पूर्ण हुई है।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, जौनसार बावर में वर्षभर त्यौहार मनाएे जाते हैं, पारंपरिक पकवान हर घर में बनाए जाते हैं। लोग आज भी तीज-त्योहारों में पारंपरिक वेषभूषा पहनते हैं। पारंपरिक लोकगीत-संगीत को गा-बजाकर खुशियां मनाते हैं। जौनसार बावर के लोगों द्वारा किया जाने वाला आतिथ्य संस्कार समृद्ध परंपरा रही है, जो कायम है, भुलाई नहीं जा सकती है। अंचल के गोलू देवता की अर्चना की भाति जौनसार में महासू देवता की पूजा होती है। सांस्कृतिक धरोहर का कैसे संरक्षण व संवर्धन किया जाए यह खूबी जौनसार के लोगों से सीखनी चाहिए जो उन्हें विरासत में मिली है। कहा गया, आज जब लोक संस्कृति का हास हो रहा है जौनसार बावर की लोक संस्कृति पर आंच तक नहीं आई है। परंपरागत रूप से पीढी दर पीढी चलायमान है।

कहा गया, सृजनात्मक कार्यो को देख लग रहा है कुछ हो रहा है। जौनसार बावर का पारंपरिक खानपान भी प्रचलन में आया है। उत्तराखंड की संस्कृति, खानपान, गीत-संगीत सबका संवर्धन होना चाहिए। वक्ताओं द्वारा कहा गया, हमारा ध्येय बने समाज को कुछ दें। सामूहिक रूप से भोजन कर, सामूहिक आचार-विचारों से कुछ सकारात्मक ही निकलेगा। लोगों को पता चलना चाहिए सदन में जौनसार का भोजन भी मिलता है। कहा गया, सब चीज का डाक्युमैंसन भी होना चाहिए जो अगली पीढी के काम आयेगा।

आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं द्वारा कहा गया, लोक व्यंजनों को अपनी नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ ही उसे देश और दुनियां में ले जाने का उपक्रम करना चाहिए। हमारे पारंपरिक व्यंजनों की एक खासियत यह है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी तो हैं ही, हमारी मिट्टी पानी की खुशबू भी निर्मित पकवानों में महकती देखी जा सकती है। अंचल के सांस्कृतिक तीज-त्योहार हमारे लोकजीवन में हमारी परंपराओं को हर समय हमें याद दिलाते रहते हैं। साथ ही हमारी सामूहिक कार्यशैली और परस्पर सहयोग की भावना को भी उकेरती हैं। हम अपनी प्रकृति, अपनी परंपरा और अपनी धरोहर के रूप में अपने व्यजंनो को यदि अपने जीवन से जोड़ेंगे तो हमारी सांस्कृतिक, सामाजिक और पुस्तैनी संस्कृति को एक निरन्तरता मिलेगी, जीवन स्वस्थ रहेगा, हमारा स्वाद तन्तु हमारी संस्कृति को जीवन्त रखने में सहायक भी होगा।

आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे राजेंद्र सिंह तोमर सदस्य नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट भारत सरकार द्वारा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के प्रति आभार व्यक्त कर उनके मीडिया सलाहकार मदन मोहन सती, सदन संपत्ति अधिकारी रंजन मिश्रा, पी सी नैनवाल इत्यादि इत्यादि के प्रति जौनसार बावर के पकवानों को स्थाई रूप से सदन के भोज में शामिल करवाने हेतु आभार व्यक्त किया गया। उपस्थित सभी प्रतिष्ठित जनों की प्रभावी उपस्थिति पर भी आभार व्यक्त कर अवगत कराया, 2014 के बाद न सिर्फ प्रदेश बल्कि समस्त देश में विभिन्न क्षेत्रों में जन उत्थान हेतु जो कार्य प्रतिपादित किए जा रहे हैं उसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को जाता है। आशा है जन उत्थान व विकास का यह क्रम सबके सहयोग से निरंतर जारी रहेगा। उक्त सम्बोधन के साथ ही आयोजित संगोष्ठी का समापन हुआ। सभी उपस्थित प्रतिष्ठित जनों को दिन के भोज में जौनसार बावर के पारंपरिक जैविक पकवानों का स्वाद चखाया गया।

जौनसार बावर की महिलाओं गीता सिंह रावत ग्राम बुल्हाड खत भरम चकराता, जया राणा ग्राम भूट बाबर, लक्ष्मी चौहान ग्राम इच्छला, जौनसार, बिरमा शर्मा ग्राम भटाड़ (ढकाड़ा) बावर, निर्मला रावत ग्राम भुनाड़ बाबर इत्यादि इत्यादि द्वारा निर्मित स्वादिष्ट पकवानों का उत्तराखंड के प्रतिष्ठित जनों द्वारा स्वाद लेकर भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। पकवानों को बनाने की विधि का अवलोकन कर ज्ञानवर्धन किया।

‘जौनसार बावर जनजाति कल्याण समिति’ चेयरमैंन रतन सिंह रावत द्वारा सरकार द्वारा चयनित पकवानों के बावत अवगत कराया गया, सिड़कु, चावल के आटे, अखरोट की पिसी हुई गिरी, पोस्त दाने और भंगजीरे को भरकर स्टीम द्वारा पकाये जाते हैं, ये दो तरह के होते हैं एक गुड़ के साथ मीठे और दूसरे दाल के साथ नमकीन बनते हैं। दूसरे तरह की सिड़कु जिसे टरकाणी कहते हैं ये गेहूं के आटे से बनते हैं। ये भी दो तरह के होते हैं वहीं अखरोट, पोस्त दाना, भंगजीरा वाले और दूसरे उड़द की दाल से भरे हुए हैं। ये सभी पकवान जौनसार बावर के पारंपरिक तीज-त्योहारों में बनाए जाते हैं और महासू देवता के देव पर्वो पर विशेष रूप से बनाए जाते हैं। मश्याड़ा भात मायके में आई हुई बेटी के लिए विशेष रूप से बनाया जाता है। जब वह ससुराल लौटती है उक्त पारंपरिक पकवान परंपरानुसार बनाए जाते हैं।

अवगत कराया गया, जौनसार बावर के सारे लोकपर्व अंचल की माताओं, बहनों के जीवन के विशेष प्रसंगों से जुड़े हुए होते हैं। मश्याणा भात लाल पहाड़ी चावल, उड़द दाल को हल्का सा भुनकर चावल के साथ खिचड़ी के रूप में बनाया जाता है। इसको घी और दही के साथ खाया जाता है। पकवान के ऊपर से अखरोट की पिसी हुई गिरी, पोस्त दाना, तिल, भंगजीरा इत्यादि डालकर खाया जाता है। चिल्लड़े चावल के आटे को ही डोरे की तरह फैलाकर बनाया जाता है। शश्याड़ी एक तरह की कड़ी ही है, इसे सर्दियों में भात के साथ विशेष रूप से बनाया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के मसाले डाले जाते हैं जो एक गर्म तासीर बनाए रखती है।

निष्कर्ष स्वरूप जौनसार बावर की लोक संस्कृति व धार्मिक अनुष्ठानो में अहम स्थान रखने वाले पकवानों को उत्तराखंड की भोजन थाली में स्थान मिलना मुख्यमंत्री धामी की पहल सराहनीय कही जा सकती है, समग्र उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में आंक कर।
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