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कोटद्वार-दुगड्डा मार्ग से अमर संदेश की विशेष रिपोर्ट
कोटद्वार। पहाड़ों में इस बार बारिश ने जहां जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है, वहीं प्रकृति की अनमोल धरोहरें भी इसके कहर से अछूती नहीं रह सकीं। कोटद्वार-दुगड्डा मार्ग पर स्थित चूनाधारा भी आज बारिश और भूस्खलन की मार झेल रही है। यही वह स्थान है, जहां कभी राहगीर अपने वाहनों को रोककर प्राकृतिक रूप से निकलने वाले शीतल और निर्मल जल से अपनी प्यास बुझाते थे।
गर्मियों के दिनों में चूनाधारा का पानी राहगीरों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जाता था। कोटद्वार से दुगड्डा की ओर जाने वाले हों या दुगड्डा से कोटद्वार आने वाले, वाहन चालक और यात्री यहां कुछ पल जरूर ठहरते थे। कई स्थानीय लोग तो इस प्राकृतिक जलस्रोत का पानी बोतलों और बर्तनों में भरकर अपने घर भी ले जाते थे। पहाड़ की ठंडी हवाओं के बीच प्राकृतिक स्रोत का यह शीतल जल लोगों को अलग ही तृप्ति का एहसास कराता था।
लेकिन कुदरत के बदलते तेवर ने चूनाधारा की तस्वीर बदल दी है। लगातार बारिश और पहाड़ी मलबे के कारण यह स्थान भी क्षतिग्रस्त हो गया है। कभी जहां राहगीरों के लिए ठहराव और शीतल जल का आकर्षण हुआ करता था, वहां अब बारिश से हुए नुकसान की चिंता दिखाई देती है।
इसी के साथ कोटद्वार-दुगड्डा राष्ट्रीय राजमार्ग-534 पर भी इस मानसून में जगह-जगह भूस्खलन और मलबा आने से यातायात प्रभावित हुआ है। हाल ही में चूनाधारा समेत चार स्थानों पर मलबा आने के कारण मार्ग करीब चार घंटे तक बाधित रहा, जिससे यात्रियों और वाहन चालकों को परेशानी उठानी पड़ी। कई बार सामान्य सफर घंटों में बदल गया और लोगों को मार्ग खुलने का इंतजार करना पड़ा।
बारिश की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कोटद्वार-दुगड्डा मार्ग पर 11 भूस्खलन प्रभावित स्थानों के उपचार के लिए करीब 69.23 करोड़ रुपये के कार्य प्रस्तावित हैं। यह आंकड़ा बताता है कि यह मार्ग बरसात के मौसम में किस तरह की चुनौती से गुजरता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहाड़ों में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि गांवों और शहरों को जोड़ने वाली जीवनरेखा है। जब सड़क बाधित होती है तो इसका सीधा असर नौकरी, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि भूस्खलन प्रभावित स्थानों का स्थायी उपचार कराया जाए और प्राकृतिक जलस्रोतों को भी संरक्षण दिया जाए।
चूनाधारा की पहचान केवल एक सड़क किनारे बहती जलधारा की नहीं है। यह उन राहगीरों की यादों से जुड़ी है, जिन्होंने तपती गर्मियों में यहां रुककर पहाड़ के प्राकृतिक और शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई है। लोगों को उम्मीद है कि बारिश का दौर थमने के बाद इस स्थान को भी व्यवस्थित और सुरक्षित किया जाएगा, ताकि चूनाधारा फिर से अपनी पुरानी रौनक और पहचान हासिल कर सके।
प्रकृति ने पहाड़ को जल दिया है, जरूरत अब उस जल और उससे जुड़ी विरासत को संभालने की है।
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