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उत्तराखण्डी सिनेमा के जरिए लोकभाषा, संस्कृति और पहाड़ के सरोकारों को आगे बढ़ा रहे संजय जोशी

मृदुभाषी, मिलनसार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्तित्व संजय जोशी के जीवन पर 24 अक्टूबर को उत्तराखंड सदन, दिल्ली में होगी परिचर्चा

अमर चंद्र |

नई दिल्ली। उत्तराखंड की लोकभाषा, संस्कृति, सामाजिक पहचान और पहाड़ के ज्वलंत मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाने में क्षेत्रीय सिनेमा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी दिशा में फिल्म निर्माण के माध्यम से योगदान दे रहे संजय जोशी का व्यक्तित्व केवल एक फिल्म निर्माता तक सीमित नहीं है, बल्कि वे उत्तराखंड की बोली-भाषा, लोकसंस्कृति और समाज से जुड़े विषयों पर भी अपनी बात रखने वाले जागरूक व्यक्ति के रूप में पहचाने जाते हैं।

मृदुभाषी, मिलनसार और सहज स्वभाव के संजय जोशी उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के पक्षधर हैं। पहाड़ से हो रहे पलायन, स्थानीय स्तर पर रोजगार की कमी और अपनी जड़ों से दूर होती युवा पीढ़ी जैसे विषयों को लेकर उनकी चिंता उनके सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। उनका मानना है कि उत्तराखंड की पहचान उसकी भाषा, लोकगीतों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है। इन धरोहरों को जीवित रखने के लिए साहित्य, संगीत, सिनेमा और सामाजिक संवाद को निरंतर प्रोत्साहन मिलना आवश्यक है।चक्रव्यूह और घंगतौल ’ से उत्तराखंडी सिनेमा को नई पहचान देने का प्रयासऔर इनके के निर्माण से संजय जोशी उत्तराखंड के क्षेत्रीय सिनेमा में चर्चा में आए हैं। फिल्म का निर्माण जोधा फिल्म्स के बैनर तले संजय जोशी और सुधीर धर ने संयुक्त रूप से किया है, जबकि इसका निर्देशन सुशीला रावत ने किया है।

गढ़वाली सिनेमा में ऐसी प्रस्तुतियां स्थानीय बोली, पहाड़ी जीवन, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक विरासत को पर्दे पर लाने का अवसर देती हैं। फिल्म घंगतौल को लेकर उत्तराखंड के दर्शकों और प्रवासी समाज के बीच रुचि देखने को मिली है। फिल्म से जुड़े प्रचार और साक्षात्कारों में पहाड़ से पलायन तथा गांवों की ओर वापसी जैसे विषय चर्चा में रहे हैं।

फ़िल्म चक्रव्यूह (२०२३)ने जहाँ न केवल एक नई सोच को जन्म दिया बल्कि दो दो यूका अवॉर्ड्स से भी समानित हुई 

वहीं घंगतौल फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस की सफलता के अलावा इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल मे भी दिखाई गई और बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड से भी सुशोभित हुई 

संजय जोशी का यह प्रयास इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि क्षेत्रीय फिल्मों को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर अपनी भाषा और समाज की कहानी कहने का मंच बनाया जाए। स्थानीय कलाकारों, लेखकों, संगीतकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को अवसर मिलने से उत्तराखंड के फिल्म जगत को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।

सामाजिक सरोकारों से जुड़ा व्यक्तित्व

संजय जोशी की विशेषता उनके सहज व्यवहार और सामाजिक विषयों के प्रति संवेदनशीलता को माना जाता है। उत्तराखंड के लोगों की समस्याओं, उनकी सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण को लेकर वे संवाद और सहभागिता के महत्व पर जोर देते हैं।

उत्तराखंड से दिल्ली-एनसीआर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बसे प्रवासी लोगों के लिए अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखना एक महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे में उत्तराखण्डी फिल्मों, सांस्कृतिक आयोजनों और सामाजिक परिचर्चाओं के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

पहाड़ों में पलायन की समस्या का समाधान रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से जुड़ा है। सिनेमा इन मुद्दों पर जनचेतना विकसित करने तथा लोगों को अपनी जन्मभूमि के प्रति संवेदनशील बनाने में सहायक हो सकता है। संजय जोशी जैसे फिल्म निर्माताओं के प्रयासों का महत्व इसी व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

समाज और सरकार के बीच संवाद की सराहनीय पहल

दिल्ली स्थित उत्तराखंड सदन में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों के जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों पर परिचर्चाओं का आयोजन एक सकारात्मक पहल है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मीडिया कोऑर्डिनेटर मदन मोहन सती के प्रयासों से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे लोगों के जीवन और योगदान पर ऐसी परिचर्चाएं आयोजित की जा रही हैं। यह पहल प्रतिभाओं को पहचान दिलाने के साथ-साथ उनके अनुभवों और विचारों को समाज के सामने रखने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है।

इन परिचर्चाओं का महत्व केवल किसी व्यक्ति की उपलब्धियों पर चर्चा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके माध्यम से समाज की अपेक्षाओं, समस्याओं, सुझावों और संभावनाओं पर भी सार्थक संवाद का अवसर मिलता है। समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों और कलाकारों को अपने विचार साझा करने का अवसर मिलने से सरकार और समाज के बीच संवाद का सेतु मजबूत हो सकता है।

मदन मोहन सती के प्रयासों से आगे बढ़ रही यह पहल इस दृष्टि से सराहनीय है कि इसमें विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तित्वों के सामाजिक योगदान और अनुभवों को महत्व दिया जा रहा है। संजय जोशी जैसे व्यक्तित्वों पर होने वाली परिचर्चाएं उत्तराखंड की लोकभाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय सिनेमा और सामाजिक सरोकारों को व्यापक पहचान दिलाने का अवसर प्रदान करती हैं। ऐसी पहल समाज में सकारात्मक संदेश देने के साथ जनहित के मुद्दों पर संवाद और सहभागिता की परंपरा को भी मजबूत करती है।

24 अक्टूबर को उत्तराखंड सदन में होगी परिचर्चा

संजय जोशी के जीवन, व्यक्तित्व, सामाजिक दृष्टिकोण और उत्तराखंड की लोकभाषा एवं संस्कृति के लिए उनके योगदान पर शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को दिल्ली स्थित उत्तराखंड सदन में परिचर्चा आयोजित होने जा रही है। इस परिचर्चा में उनके व्यक्तित्व और कार्यों के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

ऐसे आयोजन किसी व्यक्ति के कार्यों को सामने लाने के साथ-साथ उत्तराखंड की भाषा, कला, संस्कृति और सामाजिक चुनौतियों पर सार्थक संवाद का अवसर भी प्रदान करते हैं। विशेष रूप से क्षेत्रीय सिनेमा के सामने मौजूद आर्थिक, तकनीकी और वितरण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करना समय की आवश्यकता है, ताकि गढ़वाली फिल्मों को अधिक दर्शक मिल सकें और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिले।

अमर संदेश परिवार संजय जोशी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। आशा है कि वे उत्तराखंड की लोकभाषा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से आगे बढ़ाते रहेंगे। साथ ही, गढ़वाली सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने और स्थानीय कलाकारों को बेहतर अवसर दिलाने के उनके प्रयास निरंतर जारी रहेंगे

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