Post Views: 0
सी एम पपनैं
भतरौंजखान (नैनीताल)। रंगो का त्योहार होली सामाजिक व धार्मिक आधार पर बड़ा त्योहार है। जिसे होली, होलिका या होलाका नाम से बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है। फाल्गुन मास में पूर्ण चंद्रमां के दिन मनाई जाने वाली होली उत्तर भारत में एक सप्ताह व मणिपुर में छह दिन तक मनाई जाती है। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पौष का महिना आते ही बैठकी होली से इस पर्व की शुरुआत होती है। बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक। पंचमी से शिवरात्रि तक अर्ध श्रंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस में डूबी होली गीत गाए जाते हैं। 
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में बसंत पंचमी के आते ही होल्यारो का उत्साह देखने योग्य होता है। महाशिव रात्रि से खड़ी होली शुरू हो जाती है। रंग एकादशी के दिन चीर बांधी जाती है। एकादशी से होली का त्योहार पूरे सवाब पर चढ़ जाता है। महिला व पुरुष समूह कदमताल करते गीतों में झूमते नजर आते हैं। 
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में सांझ ढलते ही होल्यारो की महफिले सज जाती हैं। होली की बैठकों में हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। होल्यार मुक्त कंठ से भाग लगाते हैं। वाद्य यंत्रों की जुगल बंदी इस उल्लास को और खास बनाती है। ढोल, मंजीरे, हारमोनियम, हुड़का, चिमटा, ढपली, थाली की मधुर ध्वनि संगीत में जान डाल देती है। रात भर होली गायन का क्रम, सवाब पर होता है। होल्यारो की पूरी रात मस्ती में गुजर जाती है। पता ही नहीं चलता कि भोर कब हुई। 
अंचल की होली बैठक में राग आधारित गायन ही किया जाता है। सांयकालीन राग से बैठक का शुभारंभ किया जाता है। गायन में सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। अन्य देवी-देवताओं, प्रकृति प्रेम इत्यादि के गीत गाए जाते हैं। कुछ गीतों में मद मस्ती का मिला-जुला घोल भी समाहित रहता है। सुबह भैरवी राग गाकर होली बैठक समाप्त की जाती है।
उत्तराखंड की पारंपरिक होली गायन में बसंत पंचमी से प्राकृतिक वर्णन के गीतों की प्रमुखता रहती है। होली गायन में भक्ति, बैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियो की हंसी ठिठोली, प्रेमी प्रेमिका की अनबन, देवर भाभी की छेड़-छाड़, उक्त सभी रस मिलते हैं। होली गायन में वात्सल्य, श्रृंगार व भक्ति रस का एक साथ मौजूद रहना इस होली गायन की खास खूबी कहलाई जाती है। सभी बंदिशे राग-रागनियों में गायी जाती हैं। यह खांटी का शास्त्रीय गायन कहलाया जाता है। 
उत्तराखंड की बैठकी होली त्योहार को एक गरिमा देती हैं। जो अपने समृद्ध लोकसंगीत की वजह से उत्तराखंड की संस्कृति में रच बस गई है। कुमांऊ का राग आधारित होली गायन, कुमांऊनी नाम से जरूर जाना जाता है पर इसकी बोली-भाषा ब्रज है जो इसकी खूबियों में सुमार रहा है।
कुमांऊ अंचल में महिलाओ का समूह अलग-अलग घरों में दिन में होली गायन का आयोजन करती हैं। तो रात में पुरुषो की टोली होली गीत गाती है। महिलाओ और पुरुषो की होली गायन में अंतर भी देखा जाता है। महिलाऐ बैठ कर होली गीत गाती हैं वहीं पुरुषो की होली दो तरह की होती है। पुरुष खड़ी होली में गोल घेरे के बीच हुड़का, ढोलक, मंजीरा आदि बजा, घेरे मे नाच, ठुमके लगाते हुए होली गीत गायन करते हैं। होल्यारो की टोली को प्रत्येक घर पर गुड़, मिठाई, गुजिया व आलू के गुटके व भांग की चटनी बाटी जाती है। हर घर में महिलाओ का उल्लास, उमंग और पारंपरिक गीतों की मधुर ध्वनि मन को सुकून देती है। अनेकों संगठन पुरुषो की खड़ी होली का अलग से भी आयोजन करते हैं। आधुनिक बदलाव के दौर में पुरुष व महिलाओ की सामूहिक बैठके भी आयोजित होते देखी जा सकती हैं।
होली गायन में पुरुष होल्यार, चटख सफेद रंग का कुर्ता व पायजामा तथा महिलाऐ परंपरागत साड़ियां धारण कर होली गायन में प्रतिभाग करती हैं। छलडी से सप्ताह पूर्व कपड़ो में रंग छिड़का जाता है। होली आयोजन में अबीर, गुलाल लगाने का प्रचलन है।
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में कई जगह इस त्योहार में चीर प्रथा का भी प्रचलन है। हर घर से नए कपडे का एक छोटा टुकड़ा जमा कर, पवित्र ‘पौंय’ पेड़ की डाली पर बांधा जाता है। बड़े आंगन में यह चीर की डाली गड्डा खोद उसमें खड़ी की जाती है। धुलेडी के दिन एक होल्यार उक्त चीर को लेकर अन्य होल्यारो के आगे-आगे चलता है। बांकी होल्यारो की टोली उसके पीछे चलती है। पुरुष टोली के बीच एक लड़का लड़की बन, स्वांग रच, हंसी ठिठोली कर, होली की मस्ती में उमंग व हर्षोल्लास का रंग भरता है। महिलाओ की टोली में उक्त स्वांग महिला पुरुष रूप धारण कर हंसी ठिठोली करती है।
पूर्णिमा के दिन चीर दहन और अगले दिन छरडी होती है। होली के अगले दिन टीका कार्यक्रम चलता है। गांव, कस्बों व शहर के मंदिर में सब लोग जुटते हैं। मीठा पकवान बना सब मिल बैठ कर खाते हैं। होली टीका के साथ त्योहार का समापन होने पर सब एक दूसरे को बधाई देते हैं।
उत्तराखंड गढ़वाल मण्डल, रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि ब्लाक, तल्ला नागपुर पट्टी के गांव क्वेली, चौदला व कुटछड नामक गांवों में पौराणिक किवदंतियों के चलते, विगत पन्द्रह पीढ़ियों से होली का पर्व नहीं मनाया जाता है। यहां न कोई होल्यार आता है न कोई होली खेलता है, न कोई किसी को रंग लगाता है। बच्चों को होली न मनाने का सदैव मलाल रहता है।
स्थानीय ग्रामीण बुजुर्गो के कथनानुसार उनके पूर्वजो ने भी कभी होली नहीं खेली थी। एक सौ पचास वर्ष पूर्व उनके बुजुर्गो ने परंपरा को तोड़ होली खेलने का दुस्साहस किया था। उनके गांव में हैजा व अन्य बीमारियां फैल गई थी। बहुत बडी जनहानि हो गई थी। तब से सबक ले गांव वालो ने होली मनाने से तोबा कर ली थी।
ग्रामीणों के कथनानुसार, करीब चार सौ वर्ष पूर्व कुछ पुरोहित परिवार, यजमान व काश्तकार अपने परिवारों के साथ जम्मू कश्मीर से पलायन कर गढ़वाल के उक्त गांवो में आए थे। जो अपने साथ अपनी कुल व ईष्ट देवी मां त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति को साथ लेकर आए थे। जिसकी स्थापना उक्त गांवो में की गई थी। मां त्रिपुरा सुंदरी जिसे वैष्णो देवी की बहन माना जाता है उसको होली का हुड़दंग व रंग पसंद नहीं था। ईष्ट देवी की इस चाहत का अनुसरण उक्त गांव के लोग पीढ़ियों से करते आ रहे हैं, जो क्रम अब भी जारी है। उक्त गढ़वाल के गांवो के लोग व्याप्त परंपरा व मान्यतानुसार होली का त्योहार वर्तमान मे भी नहीं मनाते हैं।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में होली का त्योहार विभिन्न प्रकार के आयोजन कर मनाया जा रहा है। नैनीताल में शारदा संघ, युगमंच, नैना देवी ट्रस्ट व नैनीताल समाचार द्वारा राजीव लोचन साह व जहूर आलम, रानीखेत में सांस्कृतिक समिति अध्यक्ष विमल सती, चंपावत में नरेंद्र लडवाल तथा भतरौंजखान में डी एन पी स्कूल संस्थापक ललित करगेती के नेतृत्व में स्थानीय जन व स्कूली बच्चों के सहयोग से होली के अनेकों कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। पुरुषो की खडी होली, महिला बैठ होली, एकल गायन, युवा व बाल होल्यारो द्वारा अंचल के विभिन्न स्थानों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर धूम मचाई जा रही है। उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों में दिग्गज होल्यारो की बैठ होली का भी प्रभावशाली आयोजन किया गया।
उत्तराखंड कुमांऊ अंचल के अन्य प्रमुख क्षेत्रों हल्द्वानी, भवाली, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़, लोहाघाट एवं अल्मोड़ा में रंग एकादशी के दिन चीर बंधन के बाद से स्थानीय होली गायको व रसिकों के मध्य दिन-रात होली गायन की खुमारी चढ़ी देखी गई है।
राष्ट्रीय फलक पर ब्रज के बाद कुमांऊ की होली को विशिष्ट माना जाता है। उत्तराखंड की कुमांऊनी होली गायन का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना है। चंद राजाओं के समय से होली गायन का उल्लेख मिलता है। होली गायन कुमांऊनी संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। यह एक ऐसी परंपरा है जो दशकों से राष्ट्रीय फलक पर, लोकप्रिय रही है। उत्तराखंड के कुमांऊ क्षेत्र में होली खेलने व गाने की विशिष्ट परंपरा रही है।कुमांऊ की होली अनोखी होती है। जिसे रागों व रंगो से मनाया जाता है।
होली उत्सव प्रेम करने से सम्बंधित हैं। इस पर्व का उद्देश्य मानव कल्याण है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से, कहानियों और यहां तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है।
होली त्योहार से जुड़ी अनेक पौराणिक गाथाओं में कामदेव, प्रहलाद, ढुंढी और पूतना की कहानियां प्रमुख हैं। उक्त प्रत्येक कहानी का अंत असत्य पर सत्य अर्थात अधर्म पर धर्म की विजय से होती है।
होली त्योहार अधिकतर पूर्वी भारत में ही मनाया जाता है। होली त्योहार से जुड़ी कथाओं का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक ग्रन्थों में दर्ज है। नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रन्थों के साथ ही ईसा से तीन-चार सौ वर्ष पुराने कई अभिलेखों मे भी इस पर्व का उल्लेख अंकित है।
Like this:
Like Loading...
Related