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विज्ञान भवन में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला कुलपति विचारकों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन, भारती – नारी से नारायणी

लेखक -डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी

अतिथि प्राध्यापिका, हिंदी विश्वविद्यालय

कोलकाता/दिल्ली। नई दिल्ली, 7 और 8 मार्च 2026, को विज्ञान भवन में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला कुलपति विचारकों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन बड़ी ही कुशलपूर्वक संपन्न हुआ। जिसमें नारी को नारायणी तक देखा गया और इस सम्मेलन में उच्च शिक्षा और लीडर के तौरपर महिलाओं के योगदान से जुड़े कई बिंदुओं पर चर्चा हुई।

इस अवसर परराष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (8 मार्च, 2026) नई दिल्ली में राष्ट्र सेविका समिति-शरण्या के सहयोग से भारतीय विद्वत परिषद द्वारा आयोजित महिला विचारकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया और सम्मेलन को संबोधित किया। इस सम्मेलन का विषय ‘भारती- नारी से नारायणी’ था।

राष्ट्रपति ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि वैदिक काल में ब्रह्मवादिनी महिलाओं की प्रखरता से लेकर आधुनिक युग में रानी दुर्गावती, वीरमाता जीजाबाई, रानी चेन्नम्मा, लक्ष्मीबाई, झलकारीबाई और देवी अहिल्याबाई होल्कर के शौर्य और बुद्धिमत्ता के आदर्श पूरे समाज, विशेष रूप से महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने लोगों से महिला सशक्तिकरण के इन प्रेरक उदाहरणों को याद रखने और उनके आदर्शों को अमल में लाने का आग्रह किया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि सेवा, समर्पण, राष्ट्रवाद, बहादुरी, धैर्य और प्रतिभा जैसे कई आयामों में महिलाएं पुरुषों के बराबर या उनसे भी श्रेष्ठ हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में अधिकांश दीक्षांत समारोहों में, उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए पदक प्राप्त करने वाली छात्राओं की संख्या अधिक होती है। इससे पता चलता है कि अवसर मिलने पर लड़कियां बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने कहा कि हमारी परंपरा में शक्ति ही शिव को पूर्ण करती है। शिव और शक्ति की अभिन्नता हमारी सांस्कृतिक चेतना का मूल तत्व है। मानव समाज की प्रगति का रथ तभी आगे बढ़ेगा जब उस रथ के दोनों पहिए, यानी महिला और पुरुष, पूर्णतः समान और समन्वित रहेंगे।

इस कार्यक्रम में शिक्षा से रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित किया गया इस कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों से सभी कुलपति महोदया उपस्थित थीं जिनमें पश्चिम बंगाल के हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नंदिनी साहू विशेष सत्र में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थी।

उन्होंने इस अवसर पर अपने वक्तव्य में कहा कि “महिलाओं को रोजगार के लिए उन्हें एक सशक्त कार्य बल तैयार करने के लिए, विश्वविद्यालय को रोजगार की निरंतरता में आने वाली व्यवस्थागत बाधाओ को दूर करना होगा। संस्थाओं को आत्मविश्वास बढ़ाने और करियर की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए वापसी और पुर्नकौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए”।

उन्होंने अपने वक्तव्य में स्नातकों को रोजगार सृजनकर्ताओं में परिवर्तित करने के लिए आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना आवश्यक बतलाया, विश्वविद्यालय को ऐसे परिस्थिति की तंत्र विकसित करने चाहिए जो उभरते और तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र के लिए वित्तीय शिक्षा, तकनीकी साक्षरता और कौशल आधारित प्रशिक्षण तक पहुंच प्रदान करें। उन्होंने बतलाया कि विश्वविद्यालय में कौन-कौन सी विशिष्ट संस्थागत सहायता प्रणालियों, (जैसे मिश्रित शिक्षण, सुरक्षित परिवहन, कैंपस में बच्चों की देखभाल) लागू कर सकते हैं ।उन्होंने शस्त्र – शास्त्र – कला की बात की जो की एक ऐसी शैक्षिक पद्धति को संदर्भित करता है महिलाओं की आत्मरक्षा (शस्त्र), ज्ञान और बौद्धिक विकास (शास्त्र), और ललित कला, संगीत और नृत्य जैसी कलाएँ (कला) शामिल हैं। इस एकीकृत ढाँचे को शिक्षा के सभी स्तरों पर पाठ्यक्रम में कैसे शामिल किया जा सकता है ताकि व्यक्तियों के समग्र विकास को बढ़ावा दिया जा सके? इसके अलावा उन्होंने उच्च शिक्षा में महिला नेतृत्व वाले विकास के माध्यम से E2E फ्रेमवर्क को क्रियान्वित करना होगा। 2047 तक एक विकसित भारत की प्राप्ति के लिए महिला सशक्तिकरण से हटकर महिला – नेतृत्व वाले विकास की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन की आवश्यकता है। जिसमें “मोहन शक्ति से रणनीतिक शक्ति” में परिवर्तित करना है साथी भारत सरकार द्वारा घोषित नव घोषित E2E(शिक्षा से रोजगार और उद्यम) ढांचा उच्च शिक्षा संस्थानों से एकेडमिक शिक्षा और आर्थिक भागीदारी के बीच महत्वपूर्ण अंतर को पाटने की मांग करता है। अंत में निष्कर्ष रूप में कुलपति महोदय ने बतलाया कि सरकारी प्रयासों के बावजूद, देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों, आर्थिक तंगी और व्यवस्था संबंधी बाधाओं के कारण उच्च शिक्षा में छात्रों के बीच पढ़ाई छोड़ने की दर एक चुनौती बनी हुई है। विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम की उन कमियों को दूर करना होगा जहां वर्तमान पाठ्यक्रम व्यावहारिक अनुप्रयोगों या रोजगार सृजन के अनुरूप नहीं हैं। लक्ष्य यह है कि महिलाओं के सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने के लिए रणनीतियां तैयार की जाएं कि कौशल आधारित शिक्षा ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचे।

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