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नई दिल्ली। 10 जनवरी को संस्कृत अकादमी सभागार झंडेवालान में दि हाई हिलर्स ग्रुप द्वारा गढ़वाली, कुमाऊनी एवं जौनसारी अकादमी (कला, संस्कृति और भाषा विभाग) दिल्ली सरकार के सौजन्य से गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय कवि सम्मेलन व कला, संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर प्रभावशाली संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त आयोजन का श्री गणेश अकादमी सचिव संजय गर्ग, सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. हरि सुमन बिष्ट व रमेश घिल्डियाल, जौनसारी कवि खजान दत्त शर्मा, आंचलिक फिल्म निर्देशिका सुशीला रावत तथा कुमाऊनी कवि व साहित्यकार पूरन चंद्र कांडपाल द्वारा दीप प्रज्वलित कर तथा सामूहिक रूप से राष्ट्रगान “जन-गण-मन” गाकर किया गया। 
आयोजित आयोजन के प्रथम सत्र में उत्तराखंड के नाटक/ लोकनाट्य कल आज और कल विषय पर हेम पंत, सुशीला रावत तथा मनोज चंदोला द्वारा रमेश घिल्डियाल की अध्यक्षता में सारगर्भित विचार व्यक्त किए गए। उक्त वक्ताओं द्वारा कहा गया, मानव विकास की परम्परा से उत्तराखंड के नाटकों का शुभारंभ माना जा सकता है। रामलीला, रम्माण, पांडव नृत्य इत्यादि इत्यादि को शुरुआती मंचन कहा गया। नाटककार कालीदास का जन्म गढ़वाल अंचल के कालीगाड़ में बताया गया। उत्तराखंड के शहरों में जगह-जगह नाटकों के मंचन आयोजन की बात वक्ताओं द्वारा कही गई। अवगत कराया गया, नाटक के दो रूप दृष्टिगत होते हैं आंचलिक लोकनाट्य व हिंदी नाटक। भवानी दत्त थपलियाल, गोबिंद बल्लभ पंत, ललित मोहन थपलियाल, विश्वंभर दत्त उनियाल, गिरधारी लाल ‘कंकाल’, हरीश भट्ट शैलेश, मोहन उप्रेती, बृजेंद्र लाल साह, बी एम शाह, डॉ. गोविंद चातक, राजेंद्र धस्माना, जीत सिंह नेगी, कन्हैया लाल डंडरियाल इत्यादि इत्यादि नाटककारों तथा पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली जैसी नामी सांस्कृतिक संस्था के योगदान की चर्चा वक्ताओं द्वारा की गई। 
वक्ताओं द्वारा कहा गया, रंगमंच हमारे विचार हैं, दृष्टि है। अंचल के कुमाऊं, गढ़वाल और जौनसार के विभिन्न प्रकार के पहनावे, खानपान, रीति रिवाजों व बोली-भाषा पर भी वक्ताओं द्वारा विचार व्यक्त किए गए। कहा गया, आंचलिक रंगमंच तभी जीवित रहेगा जब लोक की बात होगी। आज लोग भटक रहे हैं। लोक नृत्यों पर भी काम होना जरूरी है। आंचलिक बोली भाषा का प्रयोग नाटक के रूप में करने पर वक्ताओं द्वारा बल दिया गया। सांस्कृतिक संस्थाओं के आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान आकर्षित किया गया। वक्ताओं द्वारा एकजुटता तथा नई पीढ़ी की सहभागिता पर बल देने की बात कही गई। 
वक्ताओं द्वारा कहा गया, गढ़वाली नाटकों को राजेंद्र धस्माना द्वारा आधुनिक रंगमंच की ओर मोड़ा गया। जागर संस्था और हाई हिलर्स सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा जन के सहयोग से इसे आगे बढ़ाने का कार्य किया।कहा गया, जागर विधा का पारंपरिक स्वरूप कभी बदलने वाला नहीं है क्योंकि यह अंचल के जन की गहरी आस्था व विश्वास से जुड़ा हुआ है। लोक नाट्य निरंतर चलायमान रहेंगे। नाटकों में समय के अनुकूल बदलाव होता रहेगा।
वक्ताओं द्वारा पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली के द्वारा देश-विदेश में मंचित किए गए नाटकों की विस्तृत जानकारी दी गई। संस्था के द्वारा किए गए कार्यों को सराहा गया।
आयोजन के दूसरे सत्र ‘उत्तराखंड लोक संगीत के विभिन्न आयाम’ की शुरूआत गायक महेंद्र सिंह रावत के लोकगायन-
गंगोत्री जै जै, यमनोत्री जै जै, बद्री केदार जै जै….।
से किया गया। उक्त सत्र में वीरेंद्र नेगी ‘राही’, डॉ. कमल कर्नाटक, खजान दत्त शर्मा, डॉ. सतीश कालेश्वरी द्वारा रमेश घिल्डियाल की अध्यक्षता में शिरकत की गई। 
उक्त दूसरे सत्र में उत्तराखंड के आंचलिक लोक, गीत संगीत से जुड़े विद्वान वक्ताओं द्वारा कहा गया, लोकगीत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होते रहते हैं। यह मौखिक परंपरा है। लोक संगीत में सरलता और भावुकता नजर आती है। इसमें कोई कठोर नियम लागू नहीं होता। स्वत: ही स्वर प्रफुल्लित होते हैं। लोक संगीत उत्तराखंड के जन की जीवन शैली और लोकसंस्कृति से जुड़ा हुआ है। लोकगायन में रचनाकार अधिकतर अज्ञात होता है। लोक संगीत में जागर की धुनें भी होती हैं।
अनुभवरत वक्ताओं द्वारा कहा गया, उत्तराखंड की लोकसंस्कृति विशाल है। लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी आंचलिक संस्कृति सांझा संस्कृति है। लोक संस्कृति के विभिन्न आयाम हैं। संस्कृति सरकार और राज्य नहीं लोक से बनती है। अंचल की संस्कृति मिलीजुली संस्कृति का तानाबाना है। कहा गया, उत्तराखंड में पचास से ज्यादा बोली-भाषाएं हैं। तेरह अभी भी बोली जाती हैं। उत्तराखंड की संस्कृति मुख्यतया प्रकृति से जुड़ी हुई है। अंचल की सदियों पुरानी बोली-भाषा प्रकृति के नजदीक है। गीत, बोली-भाषा, रहन-सहन, खानपान के विभिन्न आयाम हैं।
वक्ताओं द्वारा कहा गया, संस्कृति के नाम पर आज सिर्फ नाच, गान और संगीत को ही माना जाता है, ऐसा नहीं है। हमारी संस्कृति विशाल और समृद्ध रही है। उत्तराखंड का शिल्प बहुत पीछे छूट गया है। जेवरों की प्रभावशाली बनावट व प्रकार समाप्त हो गए हैं। काष्ठ कला लुप्त हो गई है। आंचलिक वेषभूषा की भिन्नता में बदलाव हो चुका है। प्राचीन कृषि उपकरण निर्माण समाप्त हो चुका है।
जौनसारी सुप्रसिद्ध गायक ख़ज़ान दत्त शर्मा द्वारा उक्त सत्र में जौनसार के लोकजीवन में व्याप्त विश्वास, लोक साहित्य तथा गीत-संगीत इत्यादि इत्यादि पर सारगर्भित प्रभावी विचार रखे गए। अंचल के लोकगायन और उसमें निहित भावों पर प्रकाश डाला गया।
प्रथम और द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे रमेश चंद्र घिल्डियाल द्वारा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी अकादमी सचिव संजय गर्ग के द्वारा अंचल की बोली-भाषा व लोक संस्कृति के निरंतर उत्थान हेतु दिए जा रहे सहयोग और प्रोत्साहन हेतु आभार व्यक्त किया गया। कहा गया, नववर्ष 2026 यादगार वर्ष रहेगा, कामना करता हूं। विभिन्न विधाओं से जुड़ी संस्थाओं के लोगों की सभागार में बड़ी संख्या में मौजूदगी को उत्साह वर्धक बताया गया। श्रोताओं की उपस्थिति के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
आयोजन का तीसरा सत्र ‘उत्तराखंड के साहित्य की अनवरत यात्रा’ शीर्षक पर आयोजित किया गया। उक्त सत्र में डॉ. हरि सुमन बिष्ट, चारु तिवारी, पूरन चंद्र कांडपाल तथा रमेश चंद्र घिल्डियाल द्वारा प्रतिभाग कर विगत कालखंडों में रचित उत्तराखंड लोक साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर ज्ञान वर्धक विचार व्यक्त किए गए, रचे गए उक्त साहित्य की जानकारी से अवगत कराया गया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर अकादमी द्वारा राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया जिसमें अंचल के प्रमुख आमंत्रित कवियों जय पाल सिंह रावत, डॉ. हेमा उनियाल, प्रदीप खुदेड, डॉ. पुष्पलता भट्ट, रमेश हितैषी, राम सिंह तोमर, पूनम तोमर व जगमोहन सिंह जगमोरा द्वारा प्रतिभाग किया गया। अंचल के सभी कवियों द्वारा विभिन्न विषयों पर रचित व व्यक्त कविताओं के द्वारा श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया गया, भरपूर मनोरंजन किया गया।
आयोजित सभी सत्रों में प्रतिभाग करने वाले सभी प्रबुद्ध वक्ताओं और कवियों का अकादमी सचिव संजय गर्ग व रमेश तिवारी द्वारा सम्मान की प्रतीक टोपी पहना कर स्वागत अभिनन्दन किया गया। प्रथम और दूसरे सत्र का मंच संचालन नीरज बवाड़ी तथा तीसरे और चौथे सत्र का मंच संचालन रमेश हितैषी द्वारा बखूबी किया गया।
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