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सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों में जवाबदेही और पारदर्शिता पर जोर
Amar sandesh नई दिल्ली/अहमदाबाद।वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस), भारत सरकार द्वारा 27–28 फरवरी, 2026 को बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) अकादमी, अहमदाबाद में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों, क्षेत्रीय नियामक संस्थाओं तथा सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों में भारत सरकार की आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और दिव्यांगजनों के लिए वित्तीय सेवाओं की सुगम्यता को सुदृढ़ करना रहा।
इस कार्यशाला का आयोजन सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों में आरक्षण नीतियों एवं कल्याणकारी उपायों के समान, पारदर्शी और प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने हेतु संस्थागत क्षमता को मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया गया। यह पहल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने तथा समाज के प्रत्येक वर्ग को वित्तीय सेवाओं तक समान अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है।
कार्यशाला में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), पेंशन निधि विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) तथा भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के वरिष्ठ अधिकारियों सहित देश के सभी 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, 7 सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों तथा 7 सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधियों ने सक्रिय सहभागिता की।
सुगम्य भारत पहल के अंतर्गत आयोजित विशेष सेंसिटाइज़ेशन सत्र में सुगम्यता मानकों (Accessibility Standards) और अनुपालन आवश्यकताओं पर विस्तृत जानकारी दी गई। इसके पश्चात आयोजित राउंडटेबल चर्चा में सुगम्यता से जुड़े कानूनी प्रावधानों, व्यावहारिक चुनौतियों, निर्धारित लक्ष्यों तथा जमीनी स्तर की वास्तविकताओं पर गंभीर विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभागियों ने विभिन्न संस्थानों में अपनाई जा रही सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करते हुए सुगम वित्तीय सेवाओं के विस्तार पर जोर दिया।
कार्यशाला का समापन एक इंटरैक्टिव प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने संचालन संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए वित्तीय सेवा पारिस्थितिकी तंत्र में समावेशिता, सुगम्यता और आरक्षण नीतियों के समान क्रियान्वयन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए।
यह कार्यशाला समावेशी और सुलभ वित्तीय प्रणाली के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई, जो “सबका साथ, सबका विकास” के संकल्प को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में सार्थक कदम मानी जा रही है।
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