उत्तराखण्डदिल्लीराष्ट्रीय

उतरैणी-मकरैणी पर्व से दिल्ली एनसीआर में गठित उत्तराखंड की प्रवासी संस्थाओं के कार्यक्रमो का शुभारंभ

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। दिल्ली एनसीआर में प्रवासरत उत्तराखंड के उत्साही प्रवासी बन्धुओं द्वारा सैंकड़ों की तादात में गठित सांस्कृतिक व जन सरोकारों से जुड़ी सामाजिक संस्थाओं द्वारा नववर्ष 2026 में मनाए जाने वाले त्योहारों व पर्वो का श्रीगणेश उतरैणी-मकरैणी के सांस्कृतिक आयोजन आयोजित कर मनना शुरू कर दिया है। जौनसार बावर जनजातीय कल्याण समिति से जुड़े प्रवासी बंधुओं द्वारा भी पौष त्योहार मनाने की तैयारी बड़े स्तर पर की जा रही है।

उतरैणी-मकरैणी पावन पर्व के अवसर पर दिल्ली एनसीआर के प्रवासी बहुल इलाकों, हाउसिंग सोसायटियों व स्थानीय क्षेत्र के बड़े-बड़े मैदानों में जगह-जगह पर हजारों की संख्या में एकजुट एकमुट होकर कुमाऊं और गढ़वाल अंचल के प्रवासी जनों द्वारा गठित संस्थाएं बड़े ही मनोयोग से अंचल की पारंपरिक लोक संस्कृति से जुड़े पर्व के सुअवसर पर सांस्कृतिक आयोजन आयोजित कर उक्त पर्व को हर्षोल्लास के साथ मना अलख जगा रहे हैं।

11 जनवरी को संत नगर-बुराड़ी में उत्तराखंड के प्रवासी बंधुओं द्वारा गठित संस्था कुमाऊं सांस्कृतिक कला मंच द्वारा 29वां उतरैणी कौतिक कौशिक एनक्लेव बुराड़ी में अपार जन-समूह के मध्य बड़े हर्षोल्लास के साथ गीत, संगीत और नृत्यों का आयोजन कर धूमधाम के साथ मनाया गया। आयोजित भव्य आयोजन के माध्यम से अंचल की भावी प्रवासी पीढ़ी को अपनी बोली-भाषा, साहित्य, संस्कृति और उत्सवों को संजोए रखने का आह्वान किया गया, उतरैणी पर्व के महत्व को उजागर किया गया।

बुराड़ी में आयोजित आयोजन में महादेव कला मंच के कलाकारों द्वारा लोकगायक चंदन फुलारा के निर्देशन, गौरव नेगी, सतीश नेगी ‘राही’, सुभाष पांडे, सुभाष सुडली, विजय बिष्ट के संगीत वादन में लोक गायिका कल्पना चौहान, दीपा नगरकोटी तथा गायक राकेश खनवाल व रोहित चौहान द्वारा उत्तराखंड का लोकगायन तथा दीप चंद्रा एवं मेधना चन्द्रा के नृत्य निर्देशन में अंचल के मनोहारी नृत्य मंचित किए गए। मंच संचालन चंदन फ़ुलारा तथा गिरीश चंद्र जोशी द्वारा बखूबी किया गया। अपार जन-समूह के मध्य अनेकों प्रवासी प्रबुद्ध जनों का स्वागत अभिनन्दन आयोजक संस्था पदाधिकारियों में प्रमुख संस्था अध्यक्ष दिनेश भट्ट, उपाध्यक्ष आनंद जोशी, महासचिव व सचिव क्रमशः हर्ष नेगी व खीम सिंह रावत तथा संस्था सलाहकार गिरीश जोशी द्वारा अंचल की पहाड़ी टोपी व शाल ओढ़ा कर किया गया।

उतरैणी के पावन पर्व पर आयोजित आयोजन को सफल और यादगार बनाने में गठित संस्था से बड़ी संख्या में जुड़ी नारी शक्ति का विशेष योगदान रहा। अंचल की प्रवासी महिलाओं द्वारा रंग-बिरंगे परिधान पहनकर आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा उतरैणी पर्व को यादगार बनाया गया। आयोजित आयोजन से एक दिन पूर्व संत नगर और बुराड़ी की स्थानीय नारी शक्ति द्वारा क्षेत्र में सांस्कृतिक शोभायात्रा निकाल कर अलख जगाई गई थी।

नववर्ष 2026 के शुभारम्भ में ही कुमाऊं, गढ़वाल व जौनसार अंचल की सैकड़ों सांस्कृतिक व समाजिक सरोकारों से जुड़ी संस्थाओं द्वारा दिल्ली एनसीआर के लगभग प्रवासी बहुल इलाकों में वर्ष के प्रथम माह जनवरी से उतरैणी-मकरैणी त्योहार के सु-अवसर पर प्रभावशाली सांस्कृतिक आयोजनों के साथ-साथ, झांकियों, नंदा यात्रा, गोलू देव पूजन तथा कवि सम्मेलनों का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाने लगा है।

विगत अनेकों वर्षों व दशकों से उत्तरैणी-मकरैणी त्योहार के सु-अवसर पर प्रभावशाली सांस्कृतिक आयोजन करने वाली संस्थाओ में शुमार रही कुमाऊं सांस्कृतिक कला मंच संत नगर- बुराड़ी, उत्तराखंड भ्रातृ संगठन वसुंधरा, गाजियाबाद, उत्तराखंड एकता मंच तिमारपुर, उत्तरांचल भ्रातृ समिति शालीमार गार्डन, उत्तराखंड जन सेवा समिति करावल नगर, उत्तराखण्ड जन समूह कर्मपुरा, कुमाऊं मंडल सांस्कृतिक मंच बलजीत नगर, श्रीगुरुमणिकनाथ सर्वजन कल्याण सेवा संस्था सूरघाट वजीराबाद, पर्वतीय प्रवासी जन कल्याण परिषद इंदिरापुरम, कल्याणी सामाजिक संस्था संगम विहार, उत्तराखंड उत्तरायणी महोत्सव समिति द्वारका इत्यादि इत्यादि का नाम विशेष तौर पर लिया जा सकता है।

दिल्ली सरकार द्वारा 2019 में गठित गढ़वाली, कुमाऊनी एवं जौनसारी अकादमी दिल्ली द्धारा अकादमी वर्तमान सचिव संजय गर्ग के सहयोग से उतरैणी-मकरैणी के पावन पर्व पर संगोष्ठी, सांस्कृतिक व कवि सम्मेलन का आयोजन भी दिल्ली महानगर के अनेकों स्थानों पर किया जाने लगा है जो अकादमी की सराहनीय व प्रोत्साहन युक्त पहल कही जा सकती है उत्तराखंड अंचल की उक्त सांस्कृतिक व समाजिक संस्थाओं तथा अकादमी द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झलक देखने के लिए हज़ारों की संख्या में उत्तराखंड के प्रवासी परिवारों को बाल बच्चों सहित पूरे एनसीआर के अयोजित आयोजनों में विगत वर्षों में उमड़ते हुए देखा जाता रहा है।

आयोजित आयोजनों में प्रवासी सांस्कृतिक दलों द्वारा उत्तराखंड अंचल के प्रभावशाली लोकगायन को संगीत की कर्ण प्रिय धुनों व नृत्यों के साथ-साथ नंदा देवी यात्रा व कवि सम्मेलनों के माध्यम से अपार जनसमूह के मध्य मंचित किया जाता रहा है। उक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमो में हजारों उत्साही श्रोताओं को मंत्रमुग्ध व मदहोश होकर नाचते-गाते हुए भी देखा गया है। विगत दिन बुराड़ी में आयोजित किया गया सांस्कृतिक आयोजन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण स्वरूप है।

पारंपरिक रूप से मनाए जाने वाले उक्त त्योहार व पर्व उत्तराखंड समाज की धार्मिक आस्था, विश्वास व समर्पण का प्रतीक माने जाते रहे हैं। एक तरह से उक्त पर्व व त्यौहार हमारी ऋतुओं के साथ-साथ चेतना, प्रकृति और मनुष्य के बीच अंर्तसंबंधो, सामूहिकता में पिरोई सामाजिक संरचना की सामुहिक अभिव्यक्ति तथा नदियों के संरक्षण की चेतना के त्यौहार रहे हैं। दिल्ली एनसीआर में मनाए जाने वाले उक्त उतरैणी-मकरैणी व पौष त्योहार का वर्तमान में स्वरूप बदल विकराल हो चुका है। उक्त पर्व और त्यौहार पर दर्जनों क्षेत्रों में अयोजित होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में हजारों प्रवासी परिवारों की भीड़ उमड़ती देखी जाती है। जिस भीड़ को देख अनुमान लगाया जा सकता है अपने अंचल की लोक कला व लोक संस्कृति के प्रति प्रवासी बंधुओं की अटूट आस्था व निष्ठा कितनी गहरी तह तक पैठ किए हुए है। प्रवास में भी प्रवासी बंधुओ का अपने अंचल के गीत-संगीत व नृत्य तथा लग रहे मेले में पहाड़ी जैविक उत्पादों के खानपान तथा वस्त्र व आभूषणों से कितना आत्मिक लगाव बना हुआ है।

दिल्ली एनसीआर में उत्तराखंड के प्रवासियों द्वारा गठित दर्जनों संस्थाओं द्वारा बृहद तौर पर हर्षोल्लास व उमंग के साथ मनाए जाने वाले उतरैणी-मकरैणी पर्व व पौष त्योहार का सीधा संबंध उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की समृद्धि से ताल्लुख रखती है। दिल्ली में प्रवासरत उत्तराखंडियों का उक्त पर्व और त्यौहार मनाने का उद्देश्य अपनी लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन हेतु पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरागत रूप में देखा जाता रहा है।

उत्तराखंड अंचल की दिल्ली एनसीआर में प्रवासरत युवा पीढ़ी को निष्ठा पूर्वक अपनी पारंपारिक लोक विधाओं, संस्कृति व बोली-भाषा को समृद्ध करने हेतु जागरूक रहना व ध्वज वाहक बन कर खड़ा रहना समय की मांग है। प्रवासी बंधुओं को जागरूक होकर समझना होगा, कोई भी समाज तब तक तरक्की नही कर सकता जब तक वह अपने अंचल की मूल लोकसंस्कृति व बोली-भाषा को न जानता हो। दिल्ली में प्रवासरत उत्तराखंड के जनमानस खासकर युवाओं को कुमांऊनी, गढ़वाली एवं जौनसारी लोक संस्कृति व बोली-भाषा के संवर्धन के प्रति संवेदनशील होना अति आवश्यक है तभी उत्तराखंड के प्रवासी बंधु अपनी पहचान को कायम रख पायेंगे, अपना हक हासिल कर पाएंगे।

Share This Post:-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *