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सेना के जाबांज व जांबाज महानायक पर बनी फिल्म के फिल्मकारो का गढ़वाल हितैषणी सभा द्वारा सम्मान

सी एम पपनैं
नई दिल्ली। दिल्ली प्रवास मे लगन, मेहनत व संघर्षशीलता के बल उत्कृष्ट कार्यो हेतु मान-सम्मान मिलना किसी भी उत्तराखंडी के लिए सम्मान की बात होती है। सम्मान जितनी बड़ी प्रतिष्ठित संस्था व प्रतिष्ठान का होगा उस सम्मान का उतना ही आदरभाव माना जाता है।
दिल्ली प्रवास मे उत्तराखंड की प्रतिष्ठित संस्था गढ़वाल हितैषणी सभा द्वारा 3 फरवरी को गढ़वाल भवन मे मुख्य अतिथि लैफ्टीनैंट जनरल अरविंद सिंह रावत के हाथों उत्तराखंड के अनेक सैनिक अधिकारियों, सेना के अनेक जाबांजो सहित महावीर चक्र विजेता राइफल मैन जसवंत सिंह रावत पर बनी फिल्म ’72 आवर्स मार्टियर हू नेवर डाइड’ के निर्माता, निर्देशक व कलाकारों को खचाखच भरे सभागार मे संस्था के अध्यक्ष मोहब्बत सिंह राणा, महासचिव पवन मैठाणी व संस्था के अन्य पधाधिकारियो व प्रबुद्ध दिनेश भट्ट, डॉ कुसुम नोटियाल, वीर सिंह पवार, ब्रजमोहन उप्रेती, डॉ विनोद बछेती, श्यामलाल मजेडा, अनिल ध्यानी, आनंद प्रकाश शर्मा,  अरविंद गौड़, संयोगिता ध्यानी, दिनेश ध्यानी, सुनील नेगी,  विनोद ढोंडियाल, योगेश भट्ट, रमेश चंद्र घिंडियाल इत्यादि के सानिध्य मे सम्मानित कर स्मृति चिन्ह भेट किए गए व फिल्म का विशेष शो प्रदर्शित किया गया। सम्मानित होने वाले सैनिक अधिकारियों मे कर्नल अरुंण मैठाणी, ले कर्नल चंद्रपाल सिंह पटवाल, अनूप सिंह कंडारी, स्क्वानलीडर आशाराम नोटियाल व राजपाल सिंह कुमई, एम एन नोटियाल, कैलाश सिंह बिष्ट, मोहर सिंह कैतुरा व माधोसिंह रावत मुख्य थे। फिल्म डिवीजन के सम्मानित होने वाले निर्माता, निर्देशक व कलाकारों में प्रशाली रावत, अभिषेक मेन्डुला व अविनाश ध्यानी प्रमुख थे। विशेष शो से पूर्व फिल्म के निर्माता प्रशाली रावत, स्क्रिप्ट राइटर अविनाश ध्यानी व अभिषेक मैन्डुला ने फिल्म के निर्माण मे झेले-भुगते अनुभवो को साझा किया। अवगत कराया की फिल्म के शोधकार्य व  पटकथा लिखने मे साढ़े तीन वर्ष का समय लगा। दिल्ली एनसीआर के प्रवासी उत्तराखंडियों के फिल्म के प्रति उत्साह न जताने की बात कही। बताया कि अरुणाचल मे फिल्म सुपर हिट हुई, सिनेमाघर हाऊस फुल गए। सम्पूर्ण देश के सिनेमाघरो मे फिल्म संतोषजनक कामकाज कर ख्याति अर्जित कर रही है। फिल्म मे पन्द्रह करोड़ की लागत आई है। करीब छह सौ कलाकारों व तकनीशियनों ने 43 दिनों तक फिल्म निर्माण मे कार्य किया। सात-आठ महीने फिल्म की एडिटिंग मे जाया हुए। शूटिंग उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चकराता, वैराट खाई, खलंगा,  हर्षिल व हरियाणा के रिवाड़ी मे सम्पन्न हुई। फिल्म मे नायक जसवंत सिंह रावत की भूमिका मे देहरादून के अविनाश ध्यानी व नायिका नूरा की भूमिका मे अरुणाचल की यसीदया है। कोरियोग्राफी अजय भारती व असिस्टेंट को-डायलोक ऋषिराज भट्ट के हैं। फिल्म के 10 प्रतिशत कलाकार मुम्बई व अन्य 90 प्रतिशत उत्तराखंड मूल के हैं। कुछ कानूनी अड़चने भी फिल्म निर्माता को झेलनी पड़ी। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ती विभू वाखरु के आदेश के बाद फिल्म 24 दिसंबर को देहरादून मे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के करकमलों द्वारा इस हिंदी फिल्म जो एक 21 वर्षीय वीर जांबाज सैनिक रायफलमैन महावीर चक्र विजेता उत्तराखंड के पौड़ी जिला स्थित गांव बाडियू निवासी के शौर्य, देशप्रेम, अदम्य साहस व बलिदान की गाथा पर फिल्माई गई है, का ट्रेलर रिलीज हुआ। मुख्यमंत्री ने फिल्म को जीएसटी नियम के मुताबिक फिल्म को टैक्सफ्री करने से इंकार किया। उत्तराखंड मे फिल्म को सराहना व प्रसिद्धि हाशिल हुई है। जे एस आर प्रोडक्शन के बैनर तले निर्मित फिल्म ’72 आवर्स-मार्टियर हू नेवर डाइड’ की पटकथा उत्तराखंड के 21 वर्षीय जांबाज महानायक जसवंत सिंह रावत की आन-बान-शान व पराक्रम पर लिखी व फिल्माई गई  फिल्म है। शौर्य, देशप्रेम, अदम्य साहस और बलिदान की गाथा से ओजपूर्ण जांबाज जसवंत के साथी लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी, गोपाल सिंह स्थानीय बालाऐं नूरा और सेला की बहादुरी की भारत-चीन युद्ध ‘नूरांग घाटी’ नेफा (अरुणाचल प्रदेश) की यह बेमिसाल वीरगाथा है। जिसके गीत सुखविन्दर, शान, मोहित चौहान व श्रेया घोषाल ने गाए हैं। देश की आजादी के बाद सन 1962 मे नूरांग घाटी नेफा चीन युद्ध मे चौथी गढ़वाल राइफल इन्फैंट्री रेजीमेंट के रायफलमैन जसवंत सिंह रावत का नाम युद्ध मे देश के लिए प्राण न्योछावर करने वालो जाबांजो मे प्रमुख रूप से शामिल है, जिसने दुश्मनों को अकेले ही छका कर चीनी सैनिकों को 72 घन्टे (तीन दिनों तक) बिना अन्न-पानी ग्रहण किए, अलग अलग बंकरो मे जाकर गोलीबारी कर घमासान युद्ध कर दुश्मन के 300 सैनिकों को मौत के घाट उतार कर, स्वयं को गोली मार, मौत को गले लगाया। गुवाहाटी-तवांग मार्ग मे 12 हजार फिट की ऊंचाई पर जिसकी स्मृति मे जसवंतगढ़ युद्ध स्मारक विराजमान है। कहा जाता है कि चीनी सैनिक इस वीर सैनिक का सिर काटकर ले गए। युद्ध विराम के बाद चीनी कमांडर ने जसवंत सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर उसका सिर और उसका एक तांबे का लोकेट भारत के कमांडर को वापस कर दिया था। नूरांग की इस पोस्ट पर स्थानीय दो बालाओं शैला और नूरा ने भी इस जांबाज का साथ हथियार और असलहा मुहैया कर दिया था। देश की सेना प्रबंधन ने इन दो स्थानीय बालाओं को भी सम्मान दिया, यहां के एक द्र्रे का नाम शैला व एक हाइवे का नाम नूरा रख कर। जांबाज जसवंत सिंह रावत चीन सीमा के जिस पोस्ट के कमरे मे रहता था, आज भी सेना के नियुक्त जवान उसके जूतो की पालिस, कपड़ो की धुलाई व प्रैस कर उन्हे उसके कमरे मे सजा कर रखते हैं। प्रति रात्रि जसवंत का बिस्तर भी लगाया जाता है। देखा जाता है कि पोस्ट पर तैनात सैनिक आज भी रात्रि में जसवंत के पड़ते थप्पड़ के डर से रात भर जग कर सीमा की सुरक्षा में मुस्तैद रहते हैं। इसे जसवंत की देश रक्षा की निष्ठा व कर्तव्य कहै या जसवंत की वीरता, अदम्य साहस व बलिदान का पुण्य जिसके नाम सीमा पर तैनात सैनिक आज भी इस बलिदानी को याद कर सीमा की सुरक्षा मे तत्पर रहते हैं। जसवंतगढ़ स्मारक के पास ही एक मंदिर भी बनवाया गया है। कहा जाता है कि चीनियों ने जसवंत को पकड़ कर पेड पर लटका कर फांसी दे दी थी। उक्त पेड और फंदे मे इस्तेमाल टेलीफोन तार आज भी इस मंदिर के पास मौजूद है। स्थानीय गांव के लोग मंदिर जाकर इस बलदानी को जसवंत बाबा के नाम से पुकार नतमस्तक होते हैं। जसवंत के स्मारक को देखने वालों को तैनात सिख रेजीमेंट चाय, नाश्ता व भोजन की व्यवस्था करती है।  सभी पकवानों का पहला भोग जसवंत को लगाया जाता है। नियमित भोग चढ़ाने के लिए यहां चौबीसों घण्टे 5 सैनिक ड्यूटी मे तैनात रहते हैं। जसवंत की शहादत की पुष्टि के बाद भी उसे सेवानिवर्त नही किया गया। जब इस बलिदानी की रिटायरमेंट की अवधि आई तब उसे रिटायर घोषित किया गया। उसे पदोन्नति भी समय-समय पर मिलती रही। पहले नायक फिर कैप्टन और फिर मेजर जनरल के पद पर पहुच कर जांबाज को सेवानिवर्त किया गया। यह देश की सेना का एक मात्र उदाहरण है। जसवंत को कभी भी मरणोपरांत नही पुकारा गया। आयोजित कार्यक्रम व सम्मान समारोह का संचालन गढ़वाल हितैषणी सभा के महासचिव पवन मैठाणी ने बखूबी किया।
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