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भोपाल। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में 25 फरवरी 2026 को भोपाल में “भारत के पवित्र उपवनों पर व्याख्यान श्रृंखला सह प्रदर्शनी” विषय पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (IGRMS), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), भारतीय सांख्यिकी संस्थान और ‘संकला’ के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस पांच दिवसीय आयोजन का केंद्रीय विषय “पवित्र उपवन: जैव-सांस्कृतिक विरासत के भंडार और सतत संरक्षण” रखा गया है।
कार्यक्रम की शुरुआत एक भव्य दीप प्रज्वलन समारोह के साथ हुई, जिसके बाद IGRMS के निदेशक प्रोफेसर अमिताभ पांडे ने अतिथियों का स्वागत करते हुए देश के पारिस्थितिक परिदृश्य में इन वनों के अमूर्त सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। मुख्य अतिथि और MoEFCC के पूर्व महानिदेशक श्री सुभाष चंद्र (IFS) ने अपने संबोधन में आधुनिक पर्यावरण नीतियों में पारंपरिक संरक्षण प्रथाओं को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।
इसी क्रम में, IGRMS के पूर्व निदेशक प्रोफेसर के. के. मिश्रा ने अपने मुख्य भाषण “भारत में पवित्र पारिस्थितिकी: पर्यावरण चेतना की स्थानीय जड़ें” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि कैसे स्वदेशी समुदायों ने सदियों से धार्मिक विश्वासों के जरिए जैव विविधता की रक्षा की है।
प्रथम तकनीकी सत्र में प्रोफेसर ए. बी. ओटा की अध्यक्षता में प्रोफेसर अमिताभ पांडे ने मानवशास्त्रीय और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से पवित्र उपवनों को ‘जीवंत संग्रहालय’ के रूप में प्रस्तुत किया। दूसरे सत्र में IGNCA के प्रोफेसर के. अनिल कुमार ने आंध्र प्रदेश के विशिष्ट संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के बीच इन परंपराओं के लचीलेपन पर चर्चा की और जोर दिया कि प्रकृति को अबाधित छोड़ना ही उसका सबसे बड़ा उपचार है। वहीं, डॉ. हरि चरण बेहरा ने पारसनाथ पहाड़ियों के जटिल अंतर्संबंधों और डॉ. बिक्कू राठौड़ ने राजस्थान के बिश्नोई समाज की पर्यावरण नैतिकता पर ऑनलाइन प्रस्तुति दी। उद्घाटन दिवस की इन गहन चर्चाओं ने न केवल भारत की क्षेत्रीय विविधता को प्रदर्शित किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि पवित्र उपवन केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सतत भविष्य के लिए वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत के अपरिहार्य स्तंभ हैं।
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