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Amar sandesh कोलकाता/हावड़ा। प्राचीन भारतीय इतिहास के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखने वाले डॉ. सुशील कुमार पांडेय आज उन चुनिंदा विद्वानों में शुमार हैं, जिन्होंने इतिहास, पुरातत्व और कला के समन्वय से शोध की नई दिशा निर्धारित की है। राजनीतिक इतिहास के मर्मज्ञ होने के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और उनके गहन विश्लेषण में उनकी विशेष दक्षता रही है।
05 मई 1962 को जन्मे डॉ. पांडेय ने अपनी उच्च शिक्षा रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता से वर्ष 1991 में पीएचडी के रूप में पूर्ण की। वर्तमान में वे हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा (पश्चिम बंगाल) में अतिथि प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
डॉ. पांडेय का शोध कार्य मुख्यतः “प्राचीन भारतीय मृण्मयी मूर्तिकला” (टेराकोटा कला) पर केंद्रित रहा है। उनके अध्ययन ने यह स्थापित किया है कि मिट्टी की साधारण प्रतीत होने वाली कलाकृतियों में भी उस समय के समाज, संस्कृति और जीवन शैली के गहरे संकेत छिपे होते हैं। वर्ष 1997 में प्रकाशित उनका शोध-ग्रंथ “प्राचीन मृण्मयी मूर्तिकला” कला और इतिहास जगत में एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में प्रतिष्ठित है।
विशेष रूप से “गुप्तकालीन मृण्मयी मूर्तियों” पर उनके शोध-पत्रों ने उस युग के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक जीवन के विविध आयामों को उजागर करते हुए इतिहास की नई कड़ियों को जोड़ा है।
डॉ. पांडेय की विशेषज्ञता का मूल आधार पुरातत्व के माध्यम से इतिहास का अन्वेषण करना है। उनकी लेखनी मिट्टी की कलाकृतियों में निहित सामाजिक इतिहास को उजागर करने की क्षमता रखती है, जिससे अतीत के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है।
इतिहास और कला के इस अद्वितीय संगम ने डॉ. सुशील कुमार पांडेय को अकादमिक जगत में एक विशिष्ट स्थान दिलाया है, जहां उनके योगदान को गंभीरता और सम्मान के साथ देखा जाता है। अमर संदेश को यह जानकारी कोलकाता से शिक्षाविद् डॉक्टर रेखा त्रिपाठी द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कर दी गई।
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