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अर्जुन सिंह अहमदाबाद। गुजरात विश्वविद्यालय परिसर स्थित डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सभागृह में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, विचार और समर्पण पर आधारित पुस्तक समर्पण दीनदयाल उपाध्याय के गुजराती संस्करण का विमोचन गुरुवार अहमदाबाद में किया गया। इस अवसर पर एकात्म मानव दर्शन विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का भी आयोजन हुआ। कार्यक्रम में देशभर से आए विद्वानों, चिंतकों, शोधकर्ताओं और वरिष्ठ प्राध्यापकों ने सहभागिता की तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और दर्शन के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
सेमिनार में विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों से आए शोधकर्ताओं ने 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन शोध-पत्रों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, अर्थनीति, मानव-केंद्रित विकास और भारतीय चिंतन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई। पुस्तक के लेखक चन्दन कुमार ने बताया कि समर्पण दीनदयाल उपाध्याय का भारत की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि सेमिनार में प्रस्तुत शोध-पत्रों का भी गुजरात विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशन कराया जाना चाहिए, जिससे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और एकात्म मानव दर्शन से संबंधित शोध को व्यापक स्तर पर समाज तक पहुंचाया जा सके। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को आधुनिक युग के महान चिंतकों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद जब देश विभिन्न पश्चिमी राजनीतिक विचारधाराओं के प्रभाव में था, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित मौलिक विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी चिंतन में व्यक्तिवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और राष्ट्रवाद जैसी विभिन्न विचारधाराओं के बीच संघर्ष दिखाई देता है, जबकि एकात्म मानव दर्शन व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को एक-दूसरे से जोड़ने वाला दर्शन है। इसमें व्यक्ति और समाज, व्यक्ति और राष्ट्र तथा विभिन्न राष्ट्रों के हितों को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना गया है। कहा कि भारतीय दर्शन का आधार संघर्ष के बजाय संवाद, पारस्परिक स्नेह, विश्व बंधुत्व और वैश्विक एकता है। तो वहीं गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जगदीशभाई जोशी ने स्वागत भाषण में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों और चिंतकों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि गुजरात विश्वविद्यालय के परिसर में इतने बड़े स्तर पर विद्वानों का एकत्रित होना विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है। कहा कि सेमिनार के आगामी सत्रों में प्रस्तुत शोध-पत्रों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी, जिससे विद्यार्थियों को पंडित दीनदयाल उपाध्याय के प्रेरणादायी चिंतन और भारतीय दर्शन को समझने का अवसर मिलेगा
और भारतीय चिंतन और मूल्यों से प्रेरित युवा पीढ़ी ही भारत 2047 श्रेष्ठ भारत, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने सेमिनार के सफल आयोजन के लिए प्रो. डॉ. हितेशभाई पटेल और उनकी पूरी टीम, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों का आभार व्यक्त किया। राज्यशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत शोध-पत्रों के माध्यम से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को अकादमिक दृष्टि से समझने और वर्तमान समय के संदर्भ में उनके महत्व पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों पर आधारित चिंतन को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। पुस्तक विमोचन और राष्ट्रीय सेमिनार के माध्यम से गुजरात विश्वविद्यालय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर व्यापक बौद्धिक और अकादमिक विमर्श देखने को मिला।
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