उत्तराखण्डदिल्ली

माटी की महक, भाषा की पहचान बचाने में जुटे डॉ. विनोद बछेती

उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच की अनूठी पहल, दिल्ली में 6 सितंबर को एसडीएमसी कन्वेंशन सेंटर, संसद मार्ग, नई दिल्ली लोकभाषा के शिक्षकों क होगा सम्मान

 

अमर चंद्र

नई दिल्ली। उत्तराखंड की लोकभाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को महानगरों में जीवंत बनाए रखने के उद्देश्य से उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली एवं डीपीएमआई पिछले कई वर्षों से दिल्ली-एनसीआर में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। मंच की ओर से वर्ष 2012 से लगातार ग्रीष्मकालीन उत्तराखंडी भाषा शिक्षण कक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से प्रवास में रह रहे उत्तराखंडी परिवारों के बच्चों को गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी जैसी अपनी मातृभाषाओं एवं लोकबोलियों से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है।AI निर्मित सांकेतिक तस्वीर।

”मंच का यह अभियान केवल भाषा सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी माटी, जड़ों, लोकगीतों, लोककथाओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। दिल्ली-एनसीआर में जून से अगस्त तक अलग-अलग स्थानों पर लगभग 52-53 जगहों पर लोकभाषा की कक्षाएं संचालित की जाती हैं। इन कक्षाओं के माध्यम से बड़ी संख्या में बच्चों को अपनी लोकभाषा से परिचित कराया जा रहा है।

इसी महत्वपूर्ण अभियान से जुड़े शिक्षकों के सम्मान के लिए शिक्षक सम्मान समारोह-2026 का आयोजन 6 सितंबर 2026, रविवार को दोपहर 3 बजे किया जाएगा। कार्यक्रम का सही स्थान एसडीएमसी कन्वेंशन सेंटर, संसद मार्ग, जंतर-मंतर के निकट, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली है। समारोह में दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न क्षेत्रों में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषा की कक्षाएं संचालित करने वाले सभी शिक्षकों को सम्मानित किया जाएगा। ज्ञात हो डॉ विनोद बछेती वर्तमान में भाजपा दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष के पद पर कार्यरत है।

डॉ. विनोद बछेती की महत्वपूर्ण भूमिका

इस अभियान को मजबूती देने में डॉ. विनोद बछेती की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उत्तराखंड समाज में अपनी सरल, सहज, मृदुभाषी और मिलनसार छवि के लिए पहचान रखने वाले डॉ. बछेती सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक गतिविधियों के माध्यम से समाज को जोड़ने के लिए निरंतर सक्रिय रहे हैं। लोकभाषा और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की उनकी पहल को उत्तराखंडी समाज में विशेष महत्व दिया जा रहा है्।AI निर्मित सांकेतिक तस्वीर।”

अमर संदेश से बातचीत में डॉ. विनोद बछेती ने बताया कि 6 सितंबर का आयोजन बेहद भावपूर्ण और भव्य होगा। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में दिल्ली की मुख्यमंत्री को भी आमंत्रित किया गया है। इसके अलावा उत्तराखंड के सांसदों के साथ-साथ पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को भी समारोह में आमंत्रित किया गया है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य केवल शिक्षकों को सम्मानित करना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के संकल्प को और मजबूत करना है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में जून से अगस्त तक 52-53 स्थानों पर गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषा की कक्षाएं संचालित होती हैं। इन कक्षाओं को सफल बनाने में जिन शिक्षकों का योगदान रहता है, उन सभी को समारोह में सम्मानित किया जाएगा।

“भाषा हमारी पहचान और संस्कृति की आत्मा”

उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच के अध्यक्ष दिनेश ने कहा कि लोकभाषाएं हमारी पहचान और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। प्रवास में रहने वाले बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ना आज समय की आवश्यकता है। मंच का प्रयास है कि गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषा की शिक्षा नई पीढ़ी तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि इस पुनीत कार्य में योगदान देने वाले शिक्षकों का सम्मान उनके उत्साह को बढ़ाने के साथ-साथ समाज के अन्य लोगों को भी लोकभाषा संरक्षण के लिए प्रेरित करेगा।

डॉ. विनोद बछेती का मानना है कि भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति की आत्मा है। यदि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से जुड़ी रहेगी तो वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों, परंपराओं और अपनी माटी से भी मजबूती से जुड़ी रहेगी।

प्रवास में भी जड़ों से जोड़ने की मुहिम

उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच और डीपीएमआई की यह पहल दिल्ली-एनसीआर में रह रहे उत्तराखंडियों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रयास बनती जा रही है। माटी से दूर रहकर भी मातृभाषा से जुड़े रहने की यह मुहिम आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का संदेश दे रही है।

6 सितंबर का शिक्षक सम्मान समारोह इसी मुहिम को सम्मान देने और आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होगा। समारोह में लोकभाषा शिक्षकों के सम्मान के साथ उत्तराखंड की बोली-भाषा और सांस्कृतिक पहचान को बचाने का सामूहिक संकल्प भी दिखाई देगा।

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