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उत्तराखंड की कुमांऊनी, गढ़वाली तथा जौनसारी बोली-भाषा पर आयोजित संगोष्ठी व कवि सम्मेलन संपन्न

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सी एम पपनैं

 

नई दिल्ली। कुमांऊनी, गढ़वाली, जौनसारी अकादमी दिल्ली सरकार तथा उत्तराखंडी भाषा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में 5 नवम्बर को आईटीओ स्थित राजेंद्र भवन के सभागार मे उत्तराखंडी बोली-भाषा पर संगोष्ठी व कवि सम्मेलन का आयोजन दिल्ली सरकार अकादमी सचिव संजय कुमार गर्ग की प्रभावी उपस्थिति में दो सत्रों मे आयोजित किए गए।

प्रथम सत्र मे आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध साहित्यकार नीलाम्बर पांडे व मंचासीन अन्य साहित्यकारों मे प्रमुख प्रदीप पंत, डाॅ राजेश्वर, पार्थसारथी थपलियाल, डाॅ बिहारी लाल जलंधरी व अकादमी सचिव संजय कुमार गर्ग की उपस्थिति मे आयोजित की गई। मंचासीनो द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर व संगीता सुयाल द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना व स्वागत गीत तथा सभी मंचासीनो को आयोजकों द्वारा टोपी पहना कर स्वागत, अभिनंदन कर संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया।

आयोजित संगोष्ठी विषय ‘उत्तराखंड की भाषा व दिशा’ पर सभी मंचासीनो के साथ-साथ वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल द्वारा गढ़वाली, कुमांऊनी व जौनसारी बोली-भाषा के संरक्षण, उन्नयन व मानक पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए गए।

दिल्ली सरकार अकादमी सचिव संजय कुमार गर्ग द्वारा संबंधित विषय पर बोलते हुए कहा गया, किसी भी संस्कृति की पहचान उसकी बोली-भाषा से होती है। दिल्ली महानगर मे उत्तराखंड के प्रवासीजन अपने अंचल की स्थानीय बोली-भाषा के प्रति उदासीन हैं। भागीदारी बहुत कम रहती है, जो चिंतनीय है। अंचल की बोली-भाषा का उन्नयन तभी होगा जब अंचल के प्रवासी जन घर-घर मे अपने बच्चों को अपनी दुदबोली मे बात करैगे। इस छोटे प्रयास से निश्चय ही बोली-भाषा उन्नति करेगी। कहा गया, अकादमी सिर्फ एक माध्यम होना चाहिए, कार्य समाज को करने हैं।

मंचासीन अन्य सुप्रसिद्ध साहित्यकारों द्वारा व्यक्त किया गया, उत्तराखंड मे गढ़वाली, कुमांऊनी व जौनसारी के अलावा अंचल मे करीब एक दर्जन अन्य बोलिया भी छुटमुट रूप में बोली जाती हैं। बोली-भाषा जोडने का कार्य करे न कि विभक्त करने का। उत्तराखंड राज्य गठित हुए तेईस वर्ष हो गए हैं आज तक अंचल की बोली-भाषा पर स्थापित सरकारों की कोई सोच नहीं बन पाई है, बोली-भाषा पर कार्य नहीं होना व उदासीनता बरतना अंचल का दुर्भाग्य कहा जा सकता है।

वक्ता साहित्यकारों द्वारा कहा गया, अंग्रेजो ने एक भाषा के बल विश्व के देशो पर राज किया। उत्तराखंड मे विभिन्न बोली-भाषा हैं, राजनैतिक तौर पर बोली-भाषा मे बंट कर राज्य की सत्ता में निरंतर उलट फेर होता नजर आया है। लोग भी बंटते नजर आते हैं, बोली-भाषा का एक मानक बनने से समस्या सुलझाई जा सकती है। साहित्यकार भविश्य की नीव रखै।

अवगत कराया गया, हिंदी भी पहले कोई भाषा नहीं थी, खडी बोली थी। गढ़वाली, कुमांऊनी, जौनसारी व नेपाली मे करीब अठारह पुस्तके अपने कालखंड मे रचने वाले उत्तराखंड के साहित्यकार गुमानी को भुला दिया गया। सही मायनो मे साहित्य रच रहे साहियकारो को अकादमी द्वारा प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

वक्ता साहित्यकारों द्वारा कहा गया, भाषा का प्रश्न शुरू से जटिल रहा है। भाषाऐ उभरती हैं, फैलती हैं, विस्तार पाती हैं, कई सम्रद्ध भाषाऐ संपन्न होने के बावजूद सिमटने के कगार पर चली गई, जिनमे संस्कृत एक है जो संकुचित होती चली गई। दो-चार श्लोक पढ़ कर या उनका वाचन कर संस्कृत भाषा सम्रद्ध नहीं मानी जा सकती। भाषा तभी सम्रद्ध होती हैं जब वे दूसरे शब्दों को भी समाहित करती हैं। अंग्रेजी में बहुत से शब्द हिंदी से गऐ हैं व अन्य बोली भाषाओं से भी। इसीलिए अंग्रेजी सम्रद्ध होती चली गई। वैश्विक फलक पर उसका विस्तार हुआ। संस्कृत ने किसी अन्य बोली-भाषा के शब्दों को अंगीकार नहीं किया, सीमित दायरे मे सिमट सी गई। उर्दू का विकास हिंदुस्तान में हुआ। उर्दू की गजले व नगमे वही हिट हुए जिसमे सरल उर्दू के शब्दों का समावेश हुआ। भाषाऐ मिलजुल कर रहे, मिलजुल कर उनका प्रयोग हो।

वक्ताओ द्वारा कहा गया, उत्तराखंड की भाषा में कुमांऊनी, गढ़वाली व जौनसारी तीनों बोली-भाषा का मिश्रण होना चाहिए। तीनों का मिश्रण होने से बहुत कुछ हो सकता है। बंगला भाषा में अपनी स्थानीय अन्य बोलियों का भी मिश्रण है। भाषाओं का मिश्रण समसाध्य है। स्थानीय बोली-भाषाओ पर शोध कार्य किया जाए। सरकार फैलोसिप दे। स्थापित सरकारों पर नीति नियोजन का दवाब बना, बिना सरकारी दखल स्थानीय बोली-भाषा मे पढाई करवाई जाऐ। कहानी, कविता, लेख इत्यादि के अध्याय शामिल हों, इस युक्ति से सही दिशा मे काम करने की जरूरत है।

व्यक्त किया गया, संकट है, गांव बचाऐ या बोली भाषा बचाऐ। भाषा का चुम्बकीय आकर्षण होता है। भाषा का उद्देश्य होता है समझ पैदा करना। भाषा संस्कृति को सम्रद्ध बनाती है। मातृभाषा जो मां से सीखी जाती है। भाषा को सम्रद्ध अंचल के लोग ही करैगे। युनेस्को के मतानुसार उत्तराखंड की बोली-भाषाओं का जल्दी ही लोप हो जायेगा। इस तथ्य पर अंचल वासियो को चिंतन करना होगा, बोली-भाषा व संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए। व्याकरण पर काम करना होगा। वैचारिक स्तर पर एक होना होगा। भाषा के क्षेत्र मे प्रोत्साहन देना स्थानीय स्तर पर आवश्यक है।

वक्ताओ द्वारा कहा गया, नवोदित लेखको, साहित्यकारों के लिए प्रतियोगिता हो, जो समाज को जीवंतता दे रहे हैं, प्रोत्साहन देना होगा। समाज को जोड़ने के लिए लोकगीत व नृत्य बहुत बडे श्रोत हैं। जो जिस विधा मे कार्य कर रहा है उसे उसकी क्षमतानुसार बढ़ाना होगा। बांधाऐ राजनैतिक स्तर पर होती आई हैं। अकादमी के माध्यम से भाषा उन्नयन का कार्य किया जा सकता है। उत्तराखंड मे माध्यम नहीं है, हम कहां हैं, समझा जा सकता है

वक्ताओ द्वारा कहा गया, दिल्ली मे गठित की गई अकादमी का नाम उत्तराखंड साहित्य अकादमी होना चाहिए। कहा गया, भाषा वही जिंदा रहती है जो बाजार की भाषा है। भाषा का व्यवहार मे होना जरूरी है। हिंदी ने स्थानीय बोली-भाषाओं को निगला है।

संगोष्ठी अध्यक्षता कर रहे व ‘उत्तराखंडी भाषा न्यास’ अध्यक्ष नीलाम्बर पांडे द्वारा अवगत कराया गया, संस्कृत हमारी मूल भाषा है, कुमांऊनी, गढ़वाली व जौनसारी मे संस्कृत के शब्दों की भरमार है। विदेशी भाषाओ के शब्द भी हमारी बोली-भाषा में हैं। हमारी स्थानीय बोली-भाषा मे बेहतरीन साहित्य लिखा जा चुका है। देश के हर भाग व अप्रवासी भी उत्तराखंडी बोली-भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। हम लोग अपनी बोली-भाषा को हिंदी की उपबोली समझ संतोष करते आऐ हैं। कुमांऊनी, गढ़वाली व जौनसारी मे कई शब्द ऐसे हैं जो सब जगह एक जैसे बोलचाल मे प्रयुक्त होते हैं या मामूली अंतर के साथ आम प्रचलन में हैं, जिनमे मात्राओ के घटने-बढ़ने से शब्दों का उच्चारण बदलता चला गया है।

वक्ताओ द्वारा कहा गया, संस्कृत से जुडे शब्दों को जो आम चलन मे हैं, अपनी बोली-भाषा मे ज्यादा महत्व दिया जाए ये हमारे अंचल के मूल भाषा के शब्द होंगे। इस कोशिश से अंचल की सभी बोली-भाषाओ की एक मानक भाषा तय करनी होगी। अवगत कराया गया डाॅ बिहारी लाल जलंधरी उक्त मानक बोली-भाषा के लिए अब तक अंचल के विभिन्न कस्बो व नगरों के साथ-साथ देश के विभिन्न शहरो मे एक सौ दस बैंठके कर चुके हैं। आज की संगोष्ठी उसी सोच के तहत आयोजित की गई है।

आयोजन के पहले सत्र मे डाॅ राजेश्वर द्वारा रचित पुस्तक व डाॅ बिहारीलाल जलंधरी की दो पुस्तकों ‘पद संग्रह’ तथा ‘छुयाल’ का लोकार्पण मंचासीन साहित्यकारो द्वारा किया गया। अवगत कराया गया, कई वर्षो के संघर्ष व मेहनत के बाद ‘छुयाल’ नामक पुस्तक उत्तराखंड की बोली-भाषा पर नई लिपी व भाषा में लिखी व प्रकाशित की गई है।

आयोजन के दूसरे सत्र में कुमांऊनी, गढ़वाली व जौनसारी बोली-भाषा के कवियों मे प्रमुख कौस्तुभा नंद चंदौला की अध्यक्षता मे मीना पांडे, गिरीश बिष्ट ‘हंसमुख’, रमेश चंद्र सोनी, कुंज बिहारी मुंडेपी, पृथ्वी सिंह केदारखंडी, सुरेन्द्र सिंह रावत ‘लाटा’, पूनम तोमर व राम सिंह तोमर द्वारा अंचल के जनमानस के दुःख दर्द, बढ़ते पलायन, पर्यावरण, अभावग्रस्त जीवन इत्यादि इत्यादि ज्वलंत व गम्भीर विषयों पर मौलिक स्वरचित कविताओं का वाचन कर सभागार में बैठे श्रोताओं को भावुक भी किया और गदगद भी।

आयोजित पहले सत्र बोली-भाषा पर संगोष्ठी व दूसरे सत्र कवि सम्मेलन का मंच संचालन क्रमश: सुल्तान सिंह तोमर व डाॅ पृथ्वीसिंह केदारखंडी द्वारा सात घण्टे तक डाॅ बिहारीलाल जलंधरी के सानिध्य मे बखूबी संचालित किया गया।

 

 

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