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*श्रीकांत वर्मा की 95वीं जयंती पर अशोक वाजपेयी को “श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान” से सम्मानित किया गया*

राजेश डंडरियाल,नई दिल्ली। प्रख्यात कवि, आलोचक, अनुवादक, संपादक, सांस्कृतिक व्यक्तित्व और संस्था-निर्माता अशोक वाजपेयी को श्रीकांत वर्मा की 95वीं जयंती के अवसर पर श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट द्वारा आयोजित साहित्यिक समारोह में “श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान” से सम्मानित किया गया। श्रीकांत वर्मा हिंदी के विशिष्ट साहित्यकार, पत्रकार, राज्यसभा के दो बार सदस्य तथा भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण हस्ती थे।

यह सम्मान श्री अशोक वाजपेयी के हिंदी साहित्य तथा भारतीय कला और संस्कृति में उनके विशिष्ट एवं दीर्घकालिक योगदान के लिए प्रदान किया गया। पुरस्कार में श्रीकांत वर्मा की सात किलोग्राम वजनी ठोस पंचधातु प्रतिमा, जो सोने, चांदी, तांबे, पीतल, लोहे और जस्ते से निर्मित है, एक प्रशस्ति-पत्र तथा ₹21 लाख की सम्मान राशि शामिल है।

श्री अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख स्वरों में से एक हैं और भारत के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जीवन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। उनकी कविता में प्रेम, स्मृति, सौंदर्य, समय, अनुपस्थिति और मानवीय मृत्युबोध के सूक्ष्म अनुभव अभिव्यक्त होते हैं। कविता के साथ-साथ उन्होंने साहित्यिक आलोचना, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारत भवन, भोपाल जैसी सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण में उनकी भूमिका तथा कला और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उनके कार्य ने हिंदी के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को व्यापक बनाया है। साहित्य और अन्य कलाओं के बीच संवाद स्थापित करने, युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे वर्तमान में रज़ा फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रबंध न्यासी हैं।

श्रीकांत वर्मा का जन्म 18 सितम्बर 1931 को बिलासपुर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और साहित्य, पत्रकारिता तथा राजनीति के क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित की। वे दिनमान से निकटता से जुड़े रहे और द टाइम्स ऑफ इंडिया में विशेष संवाददाता के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने कविता और गद्य की बीस से अधिक पुस्तकें लिखीं। 1984 में प्रकाशित उनकी चर्चित कृति मगध को उनकी साहित्यिक प्रतिभा की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति माना जाता है।

सार्वजनिक जीवन में श्रीकांत वर्मा मध्य प्रदेश से दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव भी रहे और लगभग एक दशक तक पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता का दायित्व निभाया। कैंसर से पीड़ित रहने के बाद 25 मई 1986 को न्यूयॉर्क में उनका निधन हुआ। उस समय उनकी आयु 54 वर्ष थी।

श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की स्थापना 1985 में उनकी पत्नी श्रीमती वीणा वर्मा और उनके एकमात्र पुत्र डॉ. अभिषेक वर्मा ने की थी। ट्रस्ट का उद्देश्य श्रीकांत वर्मा की स्मृति को सुरक्षित रखते हुए नई पीढ़ी के लेखकों और सृजनशील प्रतिभाओं को प्रोत्साहित कर भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाना है।

इसी उद्देश्य से उत्कृष्ट साहित्यिक प्रतिभाओं को पहचानने और प्रोत्साहित करने के लिए श्रीकांत वर्मा साहित्य पुरस्कार की स्थापना की गई। इस वर्ष श्री अशोक वाजपेयी को प्रदान किया गया पुरस्कार श्रीकांत वर्मा साहित्य पुरस्कार का 18वां संस्करण था। वर्षों से इस पुरस्कार ने अनेक विशिष्ट लेखकों को सम्मानित किया है, जिनमें से कई आगे चलकर हिंदी साहित्य के अग्रणी नाम बने, जैसे मंगलेश डबराल, राजेश जोशी और अरुण कमल।

वर्ष 2025 में ट्रस्ट ने साहित्य से आगे बढ़ते हुए अपने पुरस्कारों का विस्तार किया। पत्रकारिता के लिए ₹5 लाख का पुरस्कार तथा दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं सहित भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योगदान के लिए ₹2 लाख के पुरस्कार स्थापित किए गए।

समारोह में प्रख्यात लेखक अरुण कमल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे तथा अध्यक्षता प्रसिद्ध चित्रकार परमजीत सिंह ने की। विशिष्ट लेखिका एवं उपन्यासकार ममता कालिया, आलोचक एवं विचारक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल तथा कवि, कथाकार, कला एवं फिल्म समीक्षक और पत्रकार विनोद भारद्वाज ने श्रीकांत वर्मा से जुड़ी अपनी स्मृतियां साझा कीं और साहित्य में उनके योगदान पर विचार रखे।

कार्यक्रम का आरंभ विख्यात शास्त्रीय गायिका विदुषी सुधा रघुरामन की प्रस्तुति से हुआ, जिन्होंने श्रीकांत वर्मा की चर्चित कृति मगध की संगीतात्मक प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति को श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक सराहा।

श्रीकांत वर्मा के जीवन, साहित्यिक योगदान और विरासत पर एक लघु फिल्म भी प्रदर्शित की गई, जिसने उपस्थित जनों को भावुक कर दिया। सम्मान ग्रहण करने के बाद अशोक वाजपेयी ने चयन के लिए निर्णायक मंडल के सदस्यों का आभार व्यक्त किया और कहा कि श्रीकांत वर्मा की कविता ने केवल अपने समय को ही नहीं, बल्कि हमारे समय को भी अंकित किया है।

उन्होंने कहा कि कविता सत्य को दर्ज करती है, स्मृति को संजोती है और भय के समय में भी निर्भीकता के लिए एक स्थान निर्मित करती है। उन्होंने कहा कि टूटन और विघटन के इस दौर में कविता की भूमिका जोड़ने, संभालने और बचाए रखने की है।

उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की और विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान देश के प्रमुख साहित्यिक सम्मानों में अपना स्थान बनाएगा।

श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी और श्रीकांत वर्मा के एकमात्र पुत्र डॉ. अभिषेक वर्मा ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि साहित्य और राजनीति को सदैव अलग-अलग रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो वास्तव में लेखकों के कल्याण के लिए समर्पित हैं। साहित्य और साहित्यकारों, दोनों के संरक्षण, पोषण और प्रोत्साहन की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश साहित्य के उन्नयन के लिए किए गए ईमानदार प्रयासों को भी कभी-कभी आलोचना, राजनीति और व्यक्तिगत वैमनस्य की दृष्टि से देखा जाता है, जिससे अंततः साहित्य का ही नुकसान होता है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि श्रीकांत वर्मा ने सदैव साहित्य और लेखकों के अधिकारों को अत्यंत महत्व दिया। श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट इन्हीं मूल्यों को समर्पण और दृढ़ विश्वास के साथ आगे बढ़ा रहा है।

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