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शब्दों से समाज बदलने की ताकत: मंगला वाघमारे की प्रेरक साहित्यिक यात्रा

शिक्षा और साहित्य की सुमन मंगला सुचित्रा नारायणराव वाघमारे*

मंगला सुचित्रा नारायणराव वाघमारे एक प्रतिभाशाली शोधार्थी हैं जो हिंदी साहित्य में अपनी पहचान बना रही हैं। उनकी मातृभाषा मराठी है और उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाओं में कविता, लेख, कहानी लिखने का कार्य महाविद्यालय के दिनों से ही प्रारंभ कर किया था। मंगलाजी ने स्नातकोत्तर की पढ़ाई नांदेड़ में पूर्ण की और उन्होंने B.Ed., MSW, BJ, B.Lib. की पदवी प्राप्त की। वर्तमान में वह एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई में शोधार्थी हैं। अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के बल पर वह आज वैजापुर में ग्राम मसूल अधिकारी पद पर कार्यरत हैं।

मंगला वाघमारे ने हिंदी और मराठी साहित्य में कई कविताएं, कहानियां और लेख लिखे हैं। उनके मराठी कविता ‘ज्वाला’ , ‘धागा’ को पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई शोध प्रस्तुत किए हैं और कई कार्यशालाओं और संगोष्ठी में सक्रिय सहभागिता निभाई है। मंगल जी के आदर्श उनके नाना- नानी और पिताजी और माताजी हैं। उनके विचारों ने उन्हें हर मुश्किल का डटकर सामना करने की सीख दी है। वह पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को प्रेम से संभालती हैं और मानवता, भाईचारे से शांति पूर्ण सुख में जीवन जीने की भी सीख देती हैं।

मंगल जी का शोध कार्य नारी मुक्ति के साथ-साथ नारी के अधिकार और उनके कर्तव्यों पर प्रकाश डालना है। वह स्त्री को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर आने वाले समाज में नारी को सम्मान तथा एक सशक्त, निर्भय और परिपूर्ण रूप में देखना चाहती हैं। उनकी यह प्रवृत्ति उन्हें एक आदर्श साहित्यकार और शोधार्थी बनाती है।

हिंदी भाषा और संस्कृति के प्रति मंगला जी का प्रेम और समर्पण सराहनीय है। उन्होंने रेडिओ और अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिंदी भाषा का प्रचार किया है। वह हिंदी साहित्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

मंगला सुचित्रा नारायणराव वाघमारे की इस यात्रा में उनके परिवार और मित्रों का सहयोग और समर्थन भी महत्वपूर्ण है। उनकी माता जी ने उन्हें हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेरित किया और उनके पिता जी ने उन्हें शिक्षा के महत्व को समझाया। उनका जीवन हमें यह बताता है कि शिक्षा और सहित्य के माध्यम से हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। अमर संदेश को यह जानकारी कोलकाता से शिक्षाविद विनोद यादव ने दी है।

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