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सी एम पपनैं
नई दिल्ली। उत्तराखंड की आंचलिक बोली-भाषा में जोधा फिल्मस, संजय जोशी तथा सुधीर धर द्वारा निर्मित “घंगतोल” विगत 6 मार्च को दिल्ली सहित देश के अन्य राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व महाराष्ट्र के अनेक सिनेमा घरों में व्यापक प्रचार प्रसार के साथ रिलीज हुई। निर्मित आंचलिक बोली-भाषा की फिल्म उत्तराखंड के प्रवासियों व अप्रवासियों को अंचल के गांव वापसी का सामाजिक संदेश देती है। रिलीज हुई फिल्म की पटकथा, गीत -संगीत, प्राकृतिक सौंदर्यता, सिनेमैटोग्राफी को दर्शकों द्वारा बड़े स्तर पर सराहा जा रहा है।
रिलीज हुई फिल्म “घंगतोल” का फिल्मांकन उत्तराखंड पर्वतीय अंचल के विभिन्न स्थानों में प्रकृति से ओत-प्रोत सुंदर व शांत वादी में बेहतरीन अंदाज में किया गया है। फिल्म की पटकथा संयुक्त रूप से संजय जोशी व सुशीला रावत द्वारा रचित है। फिल्म का निर्देशन सुशीला रावत द्वारा बखूबी किया गया है। करीब सौ कलाकारों के अभिनय व प्रभावशाली संवाद युक्त आंचलिक बोली-भाषा की फिल्म में अभिनय व व्यक्त संवादों की दृष्टि से विशंभर के रूप में कुलदीप असवाल, खिमदा के रूप में पदमेंद्र रावत, चंद्र मोहन के रूप में अजय सिंह बिष्ट, नीरजा के रूप में किरन लखेड़ा ईष्टवाल, पीताम्बर दत्त के रूप में खुशाल सिंह बिष्ट, विभा के रूप में प्रज्ञा रावत तथा आभा की भूमिका में नीलम रावत के अभिनय ने दर्शकों को प्रभावित किया है।
निर्मित आंचलिक बोली-भाषा की फिल्म “घंगतोल” में उत्तराखंड की सभ्यता के साथ-साथ अंचल की मुख्य समस्याओं को जिस प्रकार फिल्माया गया है, फिल्मी रूप में प्रस्तुत किया गया है, अति प्रभावी और आकर्षण युक्त है। फिल्म निर्माण और एडिटिंग कार्य बहुत गंभीरता व सोच-समझकर कर किया गया है, जो निर्मित आंचलिक बोली-भाषा फिल्म की खूबी कही जा सकती है। उत्तराखंड प्रवासी रंगमंच की पृष्ठभूमि से जुड़े रहे कलाकारों द्वारा फिल्म में अपने अभिनय के माध्यम से एक बेहतरीन छवि प्रस्तुत की है। कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय तथा डॉ. शिवानंद नौटियाल, डॉ. सतीश कालेश्वरी, राजा बिष्ट तथा सुशीला रावत द्वारा रचित व राजेंद्र चौहान द्वारा संगीतबद्ध तथा नरेंद्र सिंह नेगी, अनुराधा निराला, कल्पना चौहान, रोहित चौहान तथा विवेक नौटियाल के प्रभावशाली सुरीले गायन ने फिल्म को सुपरहिट व यादगार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उत्तराखंड फिल्म नीति 2024 के जरिए उत्तराखंड सरकार द्वारा आंचलिक फिल्म शूटिंग को बढ़ावा देने तथा नई फिल्म नीति में आंचलिक फिल्मों की शूटिंग पर दो करोड़ रुपए तक की सब्सिडी का प्रावधान रखना बड़े स्तर पर स्वागत योग्य कदम माना गया है, जिसका लाभ आंचलिक फिल्म निर्माण में “घंगतोल” जैसी फिल्म के माध्यम से देखने को तथा अन्य निर्मित हो रही आंचलिक फिल्मों की वृद्धि से देखा जा सकता है।
याद रखने योग्य है, अस्सी के दशक में निर्मित गढ़वाल की पहली फीचर फिल्म ‘जग्वाल’
(1983), कुमाऊंनी फीचर फिल्म ‘मेघा आ’ वर्ष (1986), जौनसारी फिल्म ‘मेरे गांव की बाट’ तथा वर्ष 2026 में ‘घंगतोल’ अंचल की ऐसी निर्मित फीचर फिल्म है जो रिलीज होने के दिन से ही दर्शकों को बड़ी संख्या में फिल्म सभागारों में खींचने में सफल रही है।
मध्य हिमालय उत्तराखंड के ऊंचे हिमशिखरों से कल-कल कर बहती रमणीक नदियों, हरे-भरे ऊंचे-नीचे पहाड़ों की सौन्दर्यता, बुग्यालो की हरियाली, फूलों की घाटी की भव्य छटा तथा विभिन्न तालों की सुंदरता ने सदा ही फिल्म निर्माताओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। उत्तराखंड पर्वतीय अंचल के फिल्म निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित होना अंचल के लिए शुभ संकेत है।
फिल्मों में फिल्माए गए उत्तराखंड के प्राकृतिक मनोरम भव्य व सुंदर दृश्यों ने न सिर्फ फिल्म निर्माण क्षेत्र के मुंबईया सुप्रसिद्ध निर्माताओं व अदाकारो को आकर्षित किया, बल्कि निर्मित फिल्मों के बल राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पटल पर उत्तराखंड को बृहद पहचान भी दिलाई है। विश्व पर्यटन मानचित्र में उत्तराखंड के अनेकों कस्बो व शहरो को स्थान मिल, ख्याति अर्जित हुई है। पर्यटन को बढ़ावा, क्षेत्रीय स्तर पर स्थानीय लोगों को रोजगार, स्थानीय उत्पादों को पहचान व बिक्री से व्यापारियो की आय में बृद्धि व स्थापित सरकारो की आर्थिकी में इजाफा भी हुआ है।
वर्ष 2017 मे ‘उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद’ का प्रारूप बनने से आंचलिक फिल्म निर्माण के क्षेत्र मे कुछ उम्मीद जगी थी। फिल्म निर्माण में तेजी की बाट जोही गई थी, लेकिन उक्त नीति राजनैतिक उठापटक में धूमिल हो गई थी।
अन्य राज्यो की अपेक्षा स्मृद्ध व उन्नतिशील फिल्म उद्योग स्थापित करने की क्षमता उत्तराखंड में विद्धमान है। आंचलिक फिल्मों की बडी व महत्वपूर्ण कड़ी में यहां की प्राकृतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ यहां के स्थानीय कलाकारों व प्रवासी फिल्म कलाकारों, संगठनों व संस्थाओ का सहयोग मील का पत्थर साबित हो सकता हैं। उत्तराखंड मे फिल्म व अन्य सांस्कृतिक विधाओं से जुडे प्रतिभाशाली निर्देशको, कलाकारों, गायकों व संगीतकारो की कमी नही है।
समझना जरूरी होगा कि भारतीय सिनेमा ने 20वी सदी की शुरुआत से ही विश्व के सिनेमा जगत पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। जिसमे आंचलिक फिल्मों का बड़ा योगदान रहा है। भू-मंडलीकरण के दौर मे विश्व के लगभग देशों में भारतीय प्रवासियों की बढ़ती संख्या से अनेक देशों मे भारतीय आंचलिक सिनेमा का महत्वपूर्ण बाजार बना है। सिनेमा की लोकप्रियता से देश की सभी बोली-भाषाओं में प्रतिवर्ष सैंकड़ों फिल्में बनी हैं।
भारतीय फिल्म उद्योग की 90 से ज्यादा देशों के बाजार से कुल आय 93 अरब के लगभग आंकी जाती है जिसमें आंचलिक सिनेमा का 36% राजस्व आंका जाता रहा है। वर्तमान में दक्षिण भारतीय सिनेमा, बंगाली, मराठी, भोजपुरी दर्शको की बदौलत तेजी से लोकप्रियता अर्जित कर रही हैं। उत्तराखंड में निर्मित हो रही आंचलिक फिल्मों की संख्या को देख कर कयास लगाया जा सकता है जल्द ही आने वाले वर्षों में उत्तराखंड का आंचलिक फिल्म उद्योग भी आशा अनुरूप शिखर पर चढ़ने लगेगा, बशर्ते निर्मित हो रही फिल्में दर्शकों को प्रभावित करने में सक्षम हों। उदाहरण स्वरूप छह दशक पूर्ण कर चुकी व प्रतिवर्ष सौ से ज्यादा सिनेमाओ का निर्माण कर, दो हजार करोड़ से ज्यादा का प्रतिवर्ष व्यवसाय करने वाला भोजपुरी आंचलिक सिनेमा जो हास्य व गंभीर दोनों प्रकार का फिल्म निर्माण करता है, तेजी से बढ़ती हुई फिल्म इंडस्ट्री है आशा है उत्तराखंड का फिल्म उद्योग भी भविष्य में भोजपुरी फिल्म उद्योग की तरह आगे बढ़ने लगेगा।
उत्तराखंड में क्षेत्रीय सिनेमा को विभिन्न प्रकार की समस्याओं, विकृतियों व सियासी दाव-पेच झेल अपना मुकाम हासिल करना है। लेकिन पटल पर इस सत्यता से कोई मुंह नही मोड़ सकता है ही कि, उत्तराखंड का आंचलिक सिनेमा संसाधनों के साथ ही दर्शकों के लिए भी तरस रहा है।
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