उत्तराखण्डदिल्लीराष्ट्रीय

कलश कलाश्री द्वारा मंचित नाटक ‘घूघूती और कौव’ तथा सम्मान समारोह सम्पन्न

सी एम पपनै

नई दिल्ली। उत्तराखंड की विलुप्त होती संस्कृति, परंपराओं एवं लोक विरासत के संरक्षण एवं पुनर्जीवन हेतु निरंतर कार्यरत सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था कलश कलाश्री द्वारा के एन पांडेय ‘ख़िमदा’ द्वारा कुमाऊनी बोली-भाषा में उत्तरायणी पर्व पर रचित गीत, संगीत, नृत्य और संवाद आधारित नाटक ‘घूघूती और कौव’ का मंचन युवा रंगकर्मी अखिलेश भट्ट के निर्देशन व मनीष कुमार के संगीत निर्देशन में एल टी जी सभागार मंडी हाउस में 16 जनवरी की सायं मंचित किया गया।

आयोजन का श्रीगणेश सभागार में उपस्थित प्रबुद्ध जनों द्वारा दीप प्रज्वलित कर, संस्था द्वारा प्रकाशित स्मारिका- 2026 का लोकार्पण कर तथा विभिन्न सरोकारों के क्षेत्र में निरंतर प्रभावी कार्य कर रही विभूतियों को ‘कलश कलाश्री सम्मान- 2026’ से सम्मानित कर किया गया।

कुमाऊनी साहित्य सृजन क्षेत्र में कार्य कर रहे अल्मोड़ा के ‘पहरू’ पत्रिका संपादक डॉ. हयात सिंह रावत, रंगमंच के क्षेत्र में गीता नेगी, पत्रकारिता के क्षेत्र में सुनील नेगी के साथ-साथ अल्मोड़ा की दिव्यांग बाल गायिका नेहा आगरी को शाल ओढ़ा कर, स्मृति चिन्ह तथा नकद राशि प्रदान कर ‘कलश कलाश्री सम्मान- 2026’ से सम्मानित किया गया।

कलश कलाश्री संस्था संरक्षक (IRS) हीरा बल्लभ जोशी तथा संस्था अध्यक्ष के एन पांडेय ‘ख़िमदा’ द्वारा सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों का स्वागत अभिनन्दन कर दस वर्ष पूर्व गठित संस्था के उद्देश्यों व विगत वर्षों में किए गए प्रभावी क्रिया कलापों पर प्रकाश डाला गया, संस्था के उद्देश्य परख कार्यों को निरंतर जारी रखने हेतु आर्थिक मदद का आह्वान किया गया।योजन के इस अवसर पर मकर संक्रांति पर्व पर आधारित गीत, संगीत, नृत्य और संवाद युक्त नाटक ‘घूघूती और कौव’ का प्रभावशाली मंचन कुमाऊनी बोली-भाषा में किया गया। मंचित नाटक का कथासार उत्तराखंड के चंदवंश शासक रहे कल्याण चंद के कालखंड में घटित एक घटना क्रम पर आधारित था। संतान विहीन कल्याण चंद के राजपाट पर उसके महामंत्री की नजर थी। महामंत्री को पूरा विश्वास था राजा के देहांत के बाद वह राजपाठ का उत्तराधिकारी बन जायेगा। चिंतित राजा को स्वप्न में संतान प्राप्ति हेतु बागनाथ मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करने और पुत्र प्राप्ति हेतु भगवान से आशीर्वाद लेने हेतु अवगत कराया जाता है। राजा रानी स्वप्न में मिले आदेश का पालन कर बागनाथ मंदिर जाकर पूजा अर्चना कर पुत्र प्राप्ति का सुख प्राप्त करते हैं।

राजा कल्याण चंद का महामंत्री राजा के पुत्र प्राप्ति के सुख पर ग्रहण लगाने हेतु अपने एक मंत्री को लोभ लालच दे राजा के पुत्र निर्भय चंद जिसे रानी प्यार से घुघुति नाम से पुकारती थी उसे मारने का षड्यंत्र रचते हैं। मकर संक्रांति के दिन राजा रानी पूजा हेतु बागनाथ मंदिर को प्रस्थान करने से पूर्व महामंत्री को बालक निर्भय चंद की देखरेख का जिम्मा सौप जाते हैं। महामंत्री अपने एक अन्य मंत्री के साथ मिलकर मकर संक्रांति के दिन युवराज को मारने हेतु जंगल की ओर ले जाते हैं।

युवराज (घुघुति) बचपन से ही महल के आंगन में चहल कदमी करने वाले कौओं के साथ भाग दौड़ करने व उन्हें खाने-खिलाने में मदमस्त रहता था। कौवे भी युवराज को पहचानने लगे थे। महामंत्री और उसका साथी मंत्री जब युवराज को जंगल में मारने की कोशिश करते हैं कौवे का झुंड उन पर हमला कर युवराज की रक्षा करते हैं। एक कौवा युवराज के गले में पड़ी घुघुति माला को लेकर बागनाथ मंदिर में पूजा अर्चना कर रहे राजा रानी के इर्द गिर्द मडरा कर उन्हें घुघुति माला दिखा कर युवराज के साथ हो रहे खतरे का संकेत देता है। रानी उक्त माला को पहचान राजा को राज महल लौटने को कहती है।

राजा रानी कौवे के द्वारा दिए गए खतरे के संकेत व दी गई दिशा पर चल कर जंगल में कौवों के द्वारा युवराज को दी गई सुरक्षा को देख तथा उक्त स्थान पर महामंत्री के कान से गिरे कुंडल को पहचान, खुले दरबार में महामंत्री को बुला दगाबाजी का खुलासा कर उसे और उसके साथ जुड़े दूसरे मंत्री को दंड देने का कार्य करता है।

दंत कथाओं में घुघुति की उक्त गाथा को मकर संक्रांति के दिन उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में घर-घर में बनाए जाने वाले स्वादिष्ट मीठे पकवान घुघुति तथा उक्त घुघुति पकवानों को माला में पिरो कर बच्चों के गले में पहना कर तथा उक्त पकवान बच्चों द्वारा कौओं को बुला-बुला कर उनका आह्वान कर उन्हें खिलाने तथा उक्त मालाओं को अन्य लोगों को भेंट स्वरूप दिए जाने की परंपरा उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में वर्तमान में भी चलन में है जो इस परम्परा और प्रथा का साक्ष्य है।

कलश कलाश्री संस्था द्वारा मंचित उक्त नाटक उत्तराखंड के प्रवासी दर्शकों पर छुटमुट रंगमंचीय त्रुटियां होने के बावजूद प्रभाव जमाने में सफल रहा। वेशभूषा पात्रों के अनुकूल थी। मंचित नाटक का कथासार मुंबई से अंचल के गांव घूमने आए एक प्रवासी दंपत्ति की ईजा (मां) द्वारा अपने नाती- पोतों को मकर संक्रांति के दिन बच्चों द्वारा घुघुति की माला पहनने की परम्परा से जुड़ी दंतकथा को सुना नाटक को गति देना रचना कार और निर्देशक की सूझ बूझ और समझ को दर्शाता नजर आया। उत्तराखंड की लोक संस्कृति और बोली-भाषा के संवर्धन का उद्देश्य मंचित नाटक के माध्यम से उजागर होता है।

मंचित नाटक के पात्रों भगत नेगी द्वारा गांव के चाचा, लक्ष्मी रौतेला महतो गांव की चाची, राजा व रानी क्रमशः वीरेंद्र कैटा व पुष्पा भट्ट, महामंत्री व मंत्री क्रमशः भूपाल सिंह बिष्ट व पुष्कर पांडेय, पुजारी और बद्रीदत्त पांडे की भूमिका में के एन पांडे, नृत्यकारों में ज्योति ढौंडियाल, वैभवी नेगी, नवीन बोरा, गोविंद महतो, शहरी महिला व पुरुष क्रमशः ममता कर्नाटक व डॉ. कमल कर्नाटक तथा घुघुति व ग्रामीण की भूमिका में क्रमशः ध्रुव पांडेय व हरीश रावत द्वारा बोले गए संवादों, अभिनय व नृत्यों से मंचित नाटक को प्रभावी और यादगार बनाया।

Share This Post:-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *