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श्री जगन्नाथ पुरी की ‘अक्षयपात्र’ कथा: कभी खत्म न होने वाले भोग का रहस्य, जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व”

हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर नंदिनी साहू द्वारा रचित ‘मेडूसा’ किताब कविताओं का संग्रह है जिसमें, एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता जगन्नाथ पुरी में अक्षय पात्र है जिसमें अक्षय पात्र के रूप में इसकी महिमा का वर्णन किया गया है कि यहां आने वाला कोई भी भक्त कभी भूखा नहीं लौटता और यह प्रसाद सभी की भूख को शांत करने के साथ-साथ आध्यात्मिक तृप्ति प्रदान करता है। इस कविता में प्रोफेसर साहू ने बताया है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर का महाप्रसाद दुनिया की सबसे अनोखी रसोई में मिट्टी के साथ बर्तनों में एक दूसरे के ऊपर रखकर पकाया जाता है और यह प्रसाद साक्षात् लक्ष्मी जी द्वारा तैयार माना जाता है इसमें कोई कृत्रिम रंग या प्याज, लहसुन नहीं होता, फिर भी इसमें अलौकिक स्वाद और सुगंध होती है, जो इसे प्रसाद से बढ़कर ‘महाप्रसाद’ और मुक्ति का माध्यम बनती है इस कविता में कुलपति ने महाप्रसाद के महत्व को भी दर्शाया है:- महाप्रसाद वह भोजन है जो वैष्णवग्नि (विशेष अग्नि अनुष्ठान) भी पकाए जाने के बाद भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी लक्ष्मी स्वयं मंदिर के रसोई में भगवान के लिए महाप्रसाद पकाती है, जो बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारका में वस्त्र धारण करते हैं, जगन्नाथपुरी में भोजन करते हैं, और रामेश्वरम में विश्राम करते हैं।

प्रोफेसर साहू की यह कविता जगन्नाथ पुरी की रसोई वहां के ‘महाप्रसाद’ और भगवान जगन्नाथ की महिमा का एक बहुत ही सुंदर महत्वपूर्ण और गहरा वर्णन किया है।
उन्होंने इस कविता में जगन्नाथ पुरी की कुछ मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला है

. ईश्वरीय रसोई और व्यंजन-कला

कविता की शुरुआत पुरी की विशाल रसोई के वर्णन से होती है, जहाँ मिट्टी के बर्तनों और लकड़ी के चूल्हों पर भोजन तैयार किया जाता है। इसे केवल खाना बनाना नहीं, बल्कि एक ‘नृत्य’ और ‘संगीत’ की तरह पवित्र कार्य माना गया है। यहाँ का स्वाद अमृत के समान है, जो रसोइयों के कौशल और उनकी श्रद्धा से उपजता है।

_्परंपरा और विरासत का संगम

यहाँ भोजन बनाने के लिए आधुनिक मशीनों का नहीं, बल्कि प्राचीन पद्धतियों का पालन किया जाता है। बिना तेल के, केवल घी, शहद, मसालों और ताजी सब्जियों से बना यह भोजन पूर्वजों की विरासत और सदियों पुराने इतिहास को दर्शाता है। यह द्रौपदी और माता सीता के पवित्र उपहारों की याद दिलाता है, जो निस्वार्थ भाव से खिलाने का प्रतीक हैं।

 एकता और समानता का संदेश

कविता में इस बात पर जोर दिया गया है कि जगन्नाथ पुरी में भोजन की कोई सीमा नहीं है। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ कोई भूखा नहीं रहता। यह ‘महाप्रसाद’ अमीर-गरीब, जाति और पंथ के भेदभाव को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरोता है। यह प्रेम का एक ऐसा सैलाब है जो समाज की हर दीवार को ढहा देता है।

 आदिवासी जड़ें और पौराणिक कथाएँ

एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति और उनके स्वरूप का है। कविता बताती है कि कैसे भगवान का स्वरूप और यहाँ के व्यंजन शबरा जनजाति और आदिवासी राजा विश्ववसु की परंपराओं से जुड़े हैं। भगवान जगन्नाथ का ‘अपूर्ण’ दिखने वाला रूप असल में हर उस इंसान के साथ उनकी एकजुटता दिखाता है जिसे समाज अधूरा या अलग (दिव्यांग या अश्वेत) समझता है।

 प्रकृति और आध्यात्मिकता_*

पूरी प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल है। मिट्टी के चूल्हे से लेकर पूजा मंडप तक की यह यात्रा भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव और ‘जादू’ बना देती है। ओड़िया संस्कृति का यह स्वाद दिव्य आदेशों और मानवीय भावनाओं का मिश्रण है।

यह कविता बताती है कि जगन्नाथ पुरी की रसोई केवल पेट नहीं भरती, बल्कि आत्मा को तृप्त करती है। यह इतिहास, संस्कृति, और भगवान के प्रति अटूट विश्वास की एक ऐसी अनूठी यात्रा है, जहाँ हर निवाला एक आशीर्वाद है।

लेखक समीक्षा डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी

हिंदी विश्वविद्यालय
अतिथि प्राध्यापिका

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