शब्दों की साधना और सुरों की सरिता: देवभूमि की गौरवशाली प्रतिभा – लक्ष्मी नौडियाल ‘रश्मिसुधा’
अमर चंद
देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत केवल पर्वतों और नदियों में ही नहीं, बल्कि वहां के लोगों की आत्मा, भाषा और कला में भी जीवित है। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने और आगे बढ़ाने का कार्य कर रही हैं एक संवेदनशील, बहुमुखी और प्रेरणादायक व्यक्तित्व लक्ष्मी नौडियाल ‘रश्मिसुधा’।
टिहरी गढ़वाल की खास पट्टी की मूल निवासी लक्ष्मी नौडियाल जी एक संस्कारवान परिवार से आती हैं। उनके पिता स्वर्गीय श्री मूर्तिराम लेखवार और माता श्रीमती विशला देवी लेखवार ने उन्हें सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की समृद्ध विरासत दी। उनके जीवनसाथी श्री संजय नौडियाल सदैव उनके साथ खड़े रहते हुए उनके हर प्रयास में सहयोगी रहे हैं।
वर्तमान में वे दिल्ली में निवास करती हैं, लेकिन अपने मूल उत्तराखंड से उनका जुड़ाव आज भी उतना ही गहरा और आत्मीय है।
दिल्ली विश्वविद्यालय से कला विषय में स्नातक करने के बाद उन्होंने मार्च 2020 से अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत की। बहुत ही कम समय में उन्होंने गढ़वाली और हिंदी भाषा में कविता, गीत, ग़ज़ल, भजन जैसी विविध विधाओं में अपनी लेखनी का प्रभाव छोड़ा है।
उनकी रचनाएं न केवल प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, बल्कि अनेक साहित्यिक मंचों और कवि सम्मेलनों में भी उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है।
विशेष रूप से उनकी रचनाओं को उत्तराखंड की मातृभाषा के संरक्षण हेतु प्रकाशित काव्य संकलनों आखर, बिनसरि, चिट्ठी पत्री, रन्तरैबार, धाद कवितांक, फुलारी, हलंत में स्थान प्राप्त हुआ है, जो उनके रचनात्मक योगदान का प्रमाण है।
साहित्य के साथ-साथ संगीत के क्षेत्र में भी उनकी गहरी रुचि रही है। नई दिल्ली के गाँधर्व महाविद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने अपनी कला को निखारा है। आकाशवाणी दिल्ली के युवावाणी केंद्र से उनके भजन प्रसारित हो चुके हैं, जो उनकी गायन प्रतिभा की सशक्त पहचान है।


