पर्वतीय कला केंद्र संस्थापक स्व. मोहन उप्रेती के 98वे जन्मदिवस पर आंचलिक गीत-संगीत की धुनों ने मचाई धूम
अमरचंद
नई दिल्ली। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर ख्यातिरत सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र द्वारा संस्था संस्थापक तथा रंगमंच जगत के सुप्रसिद्ध संगीतकार स्व.मोहन उप्रेती के 98वे जन्मदिवस पर मंडी हाउस स्थित एल टी जी सभागार में संगोष्ठी, संस्था के 58 वर्षों के प्रभावी उपलब्धियों पर स्मारिका लोकार्पण तथा स्व. मोहन उप्रेती द्वारा गीतनाट्यों व नाटकों में संगीत बद्ध किए गए गीत-संगीत का अति प्रभावशाली व मनमोहक कार्यक्रम आयोजित किया गया।
पर्वतीय कला केंद्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम का श्रीगणेश उत्तराखंड के ढोल दमाऊ और मशकबीन पर बजती ‘बेडू पाको’ की लोकधुन तथा स्व. मोहन उप्रेती के चित्र पर सभागार में बैठे प्रबुद्धजनों तथा संस्था पदाधिकारियों द्वारा पुष्प अर्पित कर किया गया।
आयोजित संगोष्ठी प्रमुख वक्ताओं में संगीत नाटक अकादमी सम्मान प्राप्त दीवान सिंह बजेली, वरिष्ठ साहित्यकार व हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार सेवा निवृत सचिव डॉ. हरि सुमन बिष्ट, आंचलिक फिल्म निर्माता संजय जोशी, उत्तराखंड प्रवासी राज्यमंत्री पूरन चंद्र नैलवाल, उत्तराखंड मुख्यमंत्री मीडिया कॉर्डिनेटर मदन मोहन सती, भारतीय उद्योग जगत से जुड़े टी सी उप्रेती व नरेंद्र लडवाल तथा पर्वतीय कला केंद्र अध्यक्ष सी एम पपनै द्वारा स्व. मोहन उप्रेती के द्वारा रंगमंच जगत तथा पर्वतीय कला केंद्र के द्वारा मंचित किए गए गीत नाट्यों में पिरोई गई अंचल की लुप्त प्राय लाेक संगीत की धुनों पर सारगर्भित प्रकाश डाला गया।
प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा कहा गया, अंचल की मनमोहक प्राकृतिक सुंदरता और अल्मोड़ा नगर की समृद्ध सांस्कृतिक तानेबाने ने मोहन उप्रेती जी पर गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा था।इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन में सीनियर डिप्लोमा के साथ स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद मोहन उप्रेती का कॉमरेड पी. सी. जोशी के साथ निकट का संबंध रहा, इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन की गतिविधियों में उनकी भागीदारी, मैक्सिम गोर्की का अध्ययन और कुमाऊं अंचल के विख्यात लोकगायक मोहन सिंह बोरा रीठागाड़ी से उनकी आकस्मिक भेंट ने उनके दृष्टिकोण में एक व्यक्ति और एक कलाकार दोनों रूपों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया था। 
प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा कहा गया, एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मोहन उप्रेती ने उत्तराखंड की लोक धुनों और लोकगाथाओं के विशाल भंडार को एकत्रित किया, संरक्षित किया और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पुनः सृजित किया। एक लोकगायक के रूप में उन्होंने मानवीय दुर्बलताओं, जीवन के आनंद, प्रेम-रोमांस की अनुभूति, सौंदर्य और उल्लास के गीत जनसाधारण तक पहुंचाए और वे एक लोक कलाकार के रूप में स्थापित हुए थे। उन्होंने मेहनतकश जनता के लिए देशभक्ति गीतों की रचना भी की और उनका गायन भी किया। अपनी समस्त रचनात्मकता में उन्होंने यह विश्वास प्रकट किया कि मनुष्य मूलतः अच्छा होता है और अपने जीवन को नया आकार देने की शक्ति रखता है। उन्होंने स्वयं को लोकसंस्कृति के सृजको, किसानों और स्थानीय परंपरागत रूप में कार्य कर रहे लोककलाकारों को जोड़ा था, जिनके प्रति पहाड़ी समाज का उच्च वर्ग उपेक्षा का भाव रखता था।
प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा अवगत कराया गया, भारतीय रंगमंच संगीत के अग्रदूत मोहन उप्रेती द्वारा लोक कलाकार संघ, अल्मोड़ा के संस्थापक निदेशक के रूप में कार्य करने के बाद वर्ष 1968 दिल्ली में पर्वतीय कला केंद्र की स्थापना की, गठित संस्था सांस्कृतिक निदेशक तथा संस्था अध्यक्ष बने। उन्होंने पर्वतीय कला केंद्र को एक जीवंत और रचनात्मक मंच में परिवर्तित किया, उत्तराखंड की अनेकों लोकप्रिय पौराणिक व लोकगाथाओं का गीत नाट्य के रूप में मंचन किया और केंद्रीय हिमालयी क्षेत्र की लोककलाओं को भारत तथा विदेशों के कला-प्रेमियों के बीच नई पहचान दिलाई। वर्ष 1977 से 1990 तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में संगीत के एसोसिएट प्रोफेसर रहे और कुछ समय के लिए उक्त संस्थान के निदेशक के रूप में भी उन्होंने कार्य किया था।
वक्ताओं द्वारा कहा गया, मोहन जी एक सरल और विनम्र व्यक्तित्व के धनी थे, उनकी सौम्यता और आकर्षण ने उनके संपर्क में आने वाले सभी लोगों का दिल जीता था। मूलतः मानवतावादी होने के कारण पहाड़ी लोग उन्हें स्नेह से ‘मोहन दा’ कहते थे। कहा गया, व्यापक रूप से संगीत की विभिन्न विधाओं में कार्य करने वाले मोहन दा को अपनी पहाड़ी जड़ों से गहरा प्रेम था।
प्रबुद्ध वक्ताओं द्वारा कहा गया, मोहन जी के कार्यों का मूल्यांकन यह दर्शाता है कि उन्होंने विशेष रूप से पर्वतीय कला केंद्र के साथ-साथ भारतीय रंगमंच संगीत और सामान्य रूप से आधुनिक भारतीय रंगमंच के लिए एक सैद्धांतिक ढांचा विकसित करने का प्रयास किया, जिसमें भारतीय शास्त्रीय रंगमंच तथा भारतीय लोककला के तत्वों को समाहित कर समकालीन मनुष्य के सामाजिक संघर्ष और दुविधाओं को अभिव्यक्त किया गया।
आयोजित कार्यक्रम में पर्वतीय कला केंद्र द्वारा विगत 58 वर्षो के दौरान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोक परम्पराओं और लोक गाथाओं के क्षेत्र में किए गए प्रभावी कार्यों पर आधारित स्मारिका का लोकार्पण संजय जोशी, पूरन नैलवाल, टी सी उप्रेती, मदन मोहन सती, पी सी नैनवाल, उमाशंकर कुकरेती, डॉ. हरि सुमन बिष्ट, आयोजक संस्था अध्यक्ष, महासचिव, सचिव तथा उपाध्यक्ष क्रमशः सी एम पपनै, चंदन डांगी, चंद्रा बिष्ट, बबीता पांडे व कैलाश पांडे, कोषाध्यक्ष दीपक जोशी, खुशहाल सिंह रावत इत्यादि इत्यादि के कर कमलों किया गया।
भूले बिसरे गीतों के कार्यक्रम में पर्वतीय कला केंद्र के गायक और वादक कलाकारों द्वारा स्व. मोहन उप्रेती द्वारा संगीत बद्ध गीतों को सुधीर रिखाड़ी के संगीत निर्देशन, बबीता पांडे और चंद्रा बिष्ट के गीत-संगीत संयोजन तथा सी एम पपनै के प्रस्तुतिकरण में प्रस्तुत किया गया। पर्वतीय कला केंद्र द्वारा मंचित किए गए गीत नाट्यों व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा मंचित किए गए नाटकों में पिरोए गए स्व. मोहन उप्रेती द्वारा सुसज्जित लाेक संगीत की अद्भुत धुनों ने सभागार में बैठे श्रोताओं को भाव विभोर किया, प्रस्तुत किए गए प्रत्येक गीत-संगीत के बाद श्रोताओं द्वारा तालिया बजाने का क्रम जारी रखा गया।
महिला गायिकाओं चंद्रा बिष्ट, बबीता पांडे व नीमा गुसाई, पुरुष गायकों में महेंद्र लटवाल, हरीश रावत, पदमेंद्र रावत, भुवन रावत तथा सुधीर रिखाड़ी के गायन, बांसुरी वादन में राजेंद्र सेमवाल की लोकधुनों तथा तबला तथा ढोलक वादन में सुंदर लाल आर्या के वादन ने श्रोताओं को बहुत प्रभावित किया, आयोजित कार्यक्रम को यादगार बनाया।

