डॉ. के सी पांडेय, शांतिनिकेतन। स्थित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में भाषा संरक्षण की चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर तपु बिस्वास के संयोजन में आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य विश्व भर में तेजी से विलुप्त हो रही और संकटग्रस्त भाषाओं की स्थिति पर गंभीर विमर्श करना था। इस बौद्धिक समागम में विभिन्न अकादमिक क्षेत्रों से जुड़े साठ से अधिक विद्वानों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत कर भाषाई विविधता को बचाने पर बल दिया।
संगोष्ठी के मुख्य आकर्षण के रूप में हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की माननीय कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने ‘पूर्ण-अधिवेशन’ (Plenary Address) दिया। अपने संबोधन में प्रो. साहू ने भाषा संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए स्वयं द्वारा विकसित शैक्षणिक कार्यक्रमों और शोध पहलों का विस्तृत खाका पेश किया।
उन्होंने लोकसाहित्य (फोकलोर) के शोधकर्ताओं और शिक्षकों के लिए एक ‘नीड असेसमेंट स्टडी’ और व्यावहारिक ‘रोडमैप’ साझा किया, ताकि संकटग्रस्त भाषाओं के संरक्षण की दिशा में केवल कागजी नहीं बल्कि धरातलीय और ठोस कार्य किया जा सके।
इस अवसर पर प्रख्यात विद्वान प्रो. पवित्रा सरकार और प्रो. देबारती बंद्योपाध्याय ने भी अपने विचार साझा करते हुए संगोष्ठी की वैचारिक गहराई को समृद्ध किया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि किसी भाषा का मिटना केवल संवाद के माध्यम का खोना नहीं है, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति और ज्ञान-परंपरा का अंत है।
संगोष्ठी ने संदेश दिया कि भाषा, संस्कृति और विरासत को बचाने के लिए अंतर्विषयी दृष्टिकोण और व्यापक अकादमिक सहयोग समय की मांग है। समापन सत्र में यह निष्कर्ष निकला कि यह आयोजन महज एक चर्चा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की बहुलतावादी चेतना को सुरक्षित रखने की दिशा में एक सशक्त बौद्धिक हस्तक्षेप है, जो शोध और नीति-निर्धारण के बीच एक सेतु का कार्य करेगा।