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-डॉ. के सी पांडेय
गिरिडीह: भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) कोलकाता और गिरिडीह की समाजशास्त्रीय अनुसंधान इकाई द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘राष्ट्रीय ग्रामीण उद्यमिता शिखर सम्मेलन और कार्यशाला’ (6-7 फरवरी 2026) में विशेषज्ञों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने पर मंथन किया। इस अवसर पर अपने आमंत्रित व्याख्यान में प्रो. के. अनिल कुमार ने कहा कि भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय अब केवल इतिहास के ‘संरक्षक’ की अपनी पारंपरिक भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रचनात्मक आर्थिक विकास के एक सक्रिय ‘इंजन’ के रूप में उभर रहा है।
“सांस्कृतिक विरासत और उद्यमशीलता सहायता के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त बनाना” विषय पर बोलते हुए प्रो. कुमार ने मंत्रालय की रणनीतिक पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (NMCM) के तहत देश के लगभग 6.5 लाख गांवों की सांस्कृतिक संपत्तियों का डेटाबेस तैयार किया जा रहा है।
“इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) ने पहले ही लाखों गांवों का दस्तावेजीकरण पूरा कर लिया है। ‘मेरा गाँव मेरी धरोहर’ (MGMD) जैसी पहल इन गाँवों की अनूठी कला, शिल्प और परंपराओं को न केवल सहेज रही है, बल्कि उन्हें आर्थिक लाभ वाले उत्पादों में बदलकर रोजगार के अवसर पैदा कर रही है।”
प्रो. कुमार ने चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उल्लेख किया।
आत्मनिर्भर भारत डिजाइन केंद्र (ABCD): लाल किले में स्थापित यह केंद्र ‘वोकल फॉर लोकल’ को बढ़ावा देकर कारीगरों को आत्मनिर्भर बना रहा है।
शिल्प और आजीविका सहायता: पारंपरिक हस्तशिल्प का आधुनिकीकरण कर उन्हें शहरी बाजारों के अनुकूल बनाया जा रहा है।
GI टैग और क्षेत्रीय केंद्र: भौगोलिक संकेत (GI) उत्पादों के माध्यम से कारीगरों को विशिष्ट बाजार मिल रहे हैं, जबकि सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (ZCC) सीधे बिक्री को सुगम बना रहे हैं।
व्याख्यान के समापन पर प्रो. अनिल कुमार ने एक महत्वपूर्ण इशारा करते हुए कहा कि कई विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान अभी भी इन सरकारी पहलों से अनभिज्ञ हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि मंत्रालय और विश्वविद्यालय मिलकर काम करें, तो एक ऐसी सशक्त सहायता प्रणाली विकसित की जा सकती है जो ग्रामीण उद्यमियों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाए। यह तालमेल न केवल समुदायों को लाभ पहुँचाएगा, बल्कि अकादमिक शोध को भी व्यवहारिक धरातल प्रदान करेगा।
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