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माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती पर शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में नैतिक प्रतिरोध की पत्रकारिता पर राष्ट्रीय विमर्श
कोलकात (04 अप्रैल 2026) : शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा महाकवि माखनलाल चतुर्वेदी की 137वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक भव्य राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का विषय ‘माखनलाल चतुर्वेदी और नैतिक प्रतिरोध की पत्रकारिता’ रहा, जिसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से जुड़े विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी गायत्री उपाध्याय (डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर) द्वारा किया गया। उन्होंने शब्दभूमि प्रकाशन के उद्देश्य और कार्यों का परिचय देते हुए कहा कि यह संस्था साहित्य के संवर्धन, संरक्षण और प्रसार के लिए समर्पित एक सहकारी मंच है, जहाँ रचनात्मकता को व्यावसायिकता से ऊपर स्थान दिया जाता है।
संगोष्ठी के प्रारंभ में माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की पंक्तियों के माध्यम से राष्ट्रप्रेम और त्याग की भावना को स्मरण किया गया। वक्ताओं ने चतुर्वेदी जी को एक निर्भीक पत्रकार, ओजस्वी कवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में याद करते हुए उनके योगदान को वर्तमान समय में भी प्रासंगिक बताया।
श्रद्धांजलि और वैचारिक भूमिका
संगोष्ठी का प्रारंभ महाकवि माखनलाल चतुर्वेदी की अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की ओजस्वी पंक्तियों के पाठ से हुआ, जिसने उपस्थित सभी प्रतिभागियों के मन में राष्ट्रप्रेम, त्याग और समर्पण की भावना का संचार किया। वक्ताओं ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि माखनलाल चतुर्वेदी केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी, निर्भीक पत्रकार और राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत थे। ‘कर्मवीर’, ‘प्रभा’ और ‘प्रताप’ जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनजागरण और प्रतिरोध का सशक्त औजार बनाया।
इस संगोष्ठी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें प्रस्तुत सभी शोधपत्र और वक्तव्य समकालीन समाज, मीडिया और नैतिक मूल्यों के संकट से सीधे संवाद करते दिखाई दिए।
इस अवसर पर प्रो. सद्दाम होसैन, डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती, अमन कुमार और सेठी आशा दीनबंधु ने अपने-अपने वक्तव्यों में यह प्रश्न उठाया कि आज के इंस्टाग्राम और रील्स आधारित डिजिटल युग में आदर्शवाद किस प्रकार चुनौती के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि जहाँ चतुर्वेदी जी का साहित्य त्याग, बलिदान और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है, वहीं आज की डिजिटल संस्कृति त्वरित प्रसिद्धि और सतही अभिव्यक्ति को बढ़ावा दे रही है।
पत्रकारिता और प्रतिरोध की भाषा
अंजनी कुमार (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने ‘कर्मवीर’ के संपादकीय लेखन का विश्लेषण करते हुए कहा कि चतुर्वेदी जी की पत्रकारिता में भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि प्रतिरोध और परिवर्तन का हथियार थी। उनके लेखन में नैतिक साहस, स्पष्टता और जनपक्षधरता का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है।
राष्ट्रवाद और समकालीन विमर्श
प्रिंस कुमार ने राष्ट्रवाद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि चतुर्वेदी जी का राष्ट्रवाद समावेशी, मानवीय और नैतिक मूल्यों पर आधारित था, जबकि आज के दौर में उसका विकृत रूप देखने को मिलता है।
आशीष अम्बर ने अपने विचारों में नई पीढ़ी के संदर्भ में राष्ट्रीय कर्तव्यों की पुनर्परिभाषा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को केवल तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति भी सजग होना होगा।
त्याग, बलिदान और सेल्फ-ब्रांडिंग का द्वंद्व
रजनीश कुमार मिश्रा ने अपने वक्तव्य में वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ‘त्याग बनाम सेल्फ-ब्रांडिंग’ को उठाते हुए कहा कि आज का समाज व्यक्तिगत छवि निर्माण में अधिक व्यस्त है, जबकि चतुर्वेदी जी का जीवन और साहित्य सामूहिकता और राष्ट्रहित के लिए समर्पण का संदेश देता है।
डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी (हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा, पश्चिम बंगाल) ने अपने व्याख्यान में माखनलाल चतुर्वेदी को राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक बताते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और सत्य के पक्ष में बोलने की प्रेरणा देता है।
माखनलाल चतुर्वेदी : जीवन और योगदान
संगोष्ठी में वक्ताओं ने उनके जीवन पर भी प्रकाश डाला। 04 अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के बाबई ग्राम में जन्मे चतुर्वेदी जी ने न केवल साहित्य बल्कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अमिट छाप छोड़ी। वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बार जेल गए और कारावास में भी अपनी रचनात्मकता को जीवित रखा। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए, किंतु हिंदी भाषा के सम्मान हेतु उन्होंने पद्म भूषण सम्मान को लौटा दिया, जो उनके सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है।
यह संगोष्ठी केवल एक स्मृति आयोजन नहीं रही, बल्कि समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और मीडिया परिदृश्य में नैतिकता, आदर्शवाद और प्रतिरोध की आवश्यकता पर एक गंभीर राष्ट्रीय संवाद का मंच सिद्ध हुई।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया l संयोजक विनोद यादव के नेतृत्व और सक्रिय सहयोग के कारण यह आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ l
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