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संघर्षों की मिट्टी से खिला साहित्य का कमल: प्रिया श्रीवास्तव की प्रेरक कहानी

कोलकाता/सिवान। बिहार के सिवान जिले के छोटे से गाँव खड़सरा से निकलकर साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाने वाली प्रिया श्रीवास्तव आज संघर्ष, शिक्षा और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी हैं। 20 जून 1990 को जन्मी प्रिया ने उस परिवेश में आंखें खोलीं, जहाँ बेटियों की शिक्षा से ज्यादा उनके कम उम्र में विवाह को प्राथमिकता दी जाती थी। सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच पली-बढ़ी प्रिया ने अपने माता-पिता के सहयोग से शिक्षा को हथियार बनाकर अपने जीवन की दिशा बदल दी।

प्रिया श्रीवास्तव ने जगदम कॉलेज, छपरा से मनोविज्ञान में एम.ए. तथा इग्नू से हिंदी में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की, साथ ही बी.एड. कर शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखा। आज वह एक सम्मानित शिक्षिका होने के साथ-साथ एक उभरती हुई लेखिका के रूप में भी जानी जाती हैं। विवाह के बाद वह वर्तमान में हावड़ा (पश्चिम बंगाल) में अपने परिवार के साथ निवास कर रही हैं।

दिलचस्प बात यह है कि प्रिया के साहित्यिक सफर की शुरुआत विवाह के बाद हुई। उनके पति रवि श्रीवास्तव ने उनकी लिखी पंक्तियों को पढ़कर उन्हें प्रोत्साहित किया और यहीं से उनकी लेखनी को नई उड़ान मिली। आज उनकी रचनाएं प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, नवोदित प्रवाह, साहित्यनामा, काव्य स्पंदन, मुक्तांचल सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में “रिश्तों के अंकुर” (कहानी संग्रह), “काव्यांचल” और “मुक्ति” (कविता संग्रह) शामिल हैं। उनकी कहानियाँ जैसे “वजह”, “सांवली सी एक लड़की”, “अगले जनम मोहें बिटिया ना कीजो” और कविताएँ “हे स्त्री! तुम काली बन जाओ”, “ताजमहल”, “पहला खत” आदि पाठकों के बीच काफी सराही जा रही हैं।

साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें प्रगति साहित्य मनीषी सम्मान, कथा गौरव सम्मान और स्त्री सशक्तिकरण सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। वर्तमान में वह ‘भोजपुरी साहित्य विकास मंच’ एवं ‘भारतीय भाषा शोध संस्थान’ की महिला विंग की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

प्रिया श्रीवास्तव की सोच समाज को नई दिशा देने वाली है। वह दहेज प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए भविष्य में काम करना चाहती हैं। उनका मानना है, “साहित्य वो गुबार है जो मन के कोने में जमा रहता है और शब्दों के माध्यम से कागज पर उतरता है।”

उनकी सफलता के पीछे उनके परिवार का अहम योगदान रहा है, विशेषकर उनकी सास, बच्चों और करीबी सहयोगियों का, जिनके समर्थन ने उनके सफर को आसान बनाया।

 यह जानकारी अमर संदेश को कोलकाता से शिक्षामित्र विनोद यादव द्वारा दी गई है।

प्रिया श्रीवास्तव की यह प्रेरणादायक कहानी हर उस व्यक्ति के लिए मिसाल है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को साकार करने का हौसला रखता है।

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