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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेज़ी से सशक्त हो रहा है: अवधेश कुमार

भारतीय संस्कृति में विश्वबंधुत्व इनबिल्ट है:- प्रो. महताब आलम रिज़वी

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेज़ी से सशक्त हो रहा है: अवधेश कुमार

नई दिल्ली, 8 फरवरी। भारत की बुनियादी सोच “विश्वबंधुत्व” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में विश्वबंधुत्व अंतर्निहित (इनबिल्ट) है। हम पूरी दुनिया को भाई-बहन की दृष्टि से देखते हैं और उसी भावना के साथ व्यवहार करते हैं। यह विचार जामिया मिल्लिया इस्लामिया के रजिस्ट्रार और जाने-माने शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली स्थित कन्वेंशन सेंटर में आयोजित दो दिवसीय छठे हिमालय–हिंद महासागर राष्ट्र समूह (HHRS) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2026 के समापन समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. महताब आलम रिज़वी ने कहा कि यदि समाज आपसी सद्भाव, सम्मान और सहयोग के साथ रहना सीख ले, तो संघर्ष और हिंसा अपने-आप समाप्त हो सकते हैं। उन्होंने पारिवारिक संबंधों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार भाई का कर्तव्य अपनी बहन का सम्मान और रक्षा करना है तथा बहन का कर्तव्य अपने भाई की भलाई की कामना करना है, उसी प्रकार आपसी रिश्ते और मानवीय संवेदनाएं वैश्विक शांति की मज़बूत नींव रख सकती हैं।

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि भारत ने हमेशा शक्ति प्रदर्शन के बजाय संतुलन, सद्भाव और सहयोग को प्राथमिकता दी है। आज जब दुनिया अनेक वैश्विक तनावों और टकरावों से गुज़र रही है, ऐसे समय में भारत शांति, स्थिरता और समानता पर आधारित एक वैकल्पिक और नैतिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

प्रो. महताब आलम रिज़वी ने स्पष्ट किया कि सम्पूर्ण वैश्विक शांति तभी संभव है जब राष्ट्र प्रतिस्पर्धा के बजाय सह-अस्तित्व को अपनाएं और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव विकसित करें।

अपने वक्तव्य में प्रो रिज़वी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया—क्या हम अपनी असली सॉफ्ट पावर से, अपनी कूटनीति, भाषा, संस्कृति और सभ्यतागत समझ से फिर से जुड़ने को तैयार हैं? उन्होंने कहा कि यह केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारे समय का एक ऐतिहासिक निर्णय है। वैश्विक प्रणाली में सम्मान और छवि केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति से नहीं बनती, बल्कि मूल्यों, नैतिकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से निर्मित होती है। दूसरों की लगातार नकल करने से हमारी विशिष्ट पहचान खोने का ख़तरा हमेशा बना रहता है।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हिमालय–हिंद महासागर राष्ट्र समूह (HHRS) और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच (RSJM) द्वारा,

सेंटर ऑफ़ रशियन स्टडीज़ (CRS), स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज, लिटरेचर एंड कल्चर स्टडीज़ (SLL&CS), इंटर-हॉल एडमिनिस्ट्रेशन (IHA), JNU,

नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रेज़ोल्यूशन (जामिया मिलिया इस्लामिया) तथा सेंटर फ़ॉर हिमालयन स्टडीज़ (दिल्ली विश्वविद्यालय) के सहयोग से आयोजित किया गया।

“इंडियन ओशन रीजन में इंडिया का जियोपॉलिटिकल और स्ट्रेटेजिक महत्व।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका

समापन समारोह में विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने अपने ओजस्वी और विचारोत्तेजक संबोधन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेज़ी से सशक्त हो रहा है और आज वैश्विक स्तर पर निर्णय लेते समय दुनिया भारत को गंभीरता से ध्यान में रखती है।

उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र के रणनीतिक और आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह क्षेत्र लगभग 68 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैला है और वैश्विक समुद्री व्यापार की लाइफ़लाइन है। दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत समुद्री व्यापार का आवागमन इसी क्षेत्र से होकर होता है।

अवधेश कुमार ने कहा कि प्राचीन काल में भारत का समुद्री व्यापार पूर्वी अफ्रीका, अरब देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था, जिससे सांस्कृतिक संवाद और सभ्यताओं के बीच गहरा संबंध विकसित हुआ।

उन्होंने यह भी कहा कि जहां औपनिवेशिक शक्तियाँ संसाधनों और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा करती थीं, वहीं स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी समुद्री क्षमताओं को सुदृढ़ करते हुए क्षेत्रीय संतुलन और सहयोग को लगातार मज़बूत किया है।

JNU की डीन प्रोफेसर मनुराधा चौधरी ने कहा कि भारत का दृष्टिकोण सदैव समावेशी और मानवीय मूल्यों पर आधारित रहा है। भारतीय व्यापारी, नाविक और विद्वान केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भाषा, संस्कृति, योग, दर्शन और जीवन मूल्यों का भी प्रसार किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी. डब्ल्यू. पांडे ने कहा कि किसी भी सभ्यता की असली ताकत उसकी संवाद करने की क्षमता में होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा संघर्ष के बजाय संवाद को प्राथमिकता दी है, जो इसकी वैश्विक स्वीकृति का आधार है।

विशेष अतिथि प्रोफेसर वी. रविचंद्रन, कुलपति, दिल्ली फार्मास्युटिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली ने कहा कि हिंद महासागर केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि रणनीतिक केंद्रीयता का प्रतीक है, जो भारत को कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ प्रदान करता है।

नेपाल स्थित मिड-ईस्ट यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर ध्रुबा कुमार ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना में निहित है। भारत को केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता के रूप में समझा जाना चाहिए।

सम्मेलन में अनेक अकादमिक और पैरेलल सत्र आयोजित किए गए, जिनमें कुल 100 से अधिक शोधकर्ताओं और विद्वानों ने भाग लिया। “भारत और हिंद महासागर क्षेत्र: चुनौतियाँ और समाधान” तथा “उभरते रुझान और संभावनाएं” जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।

कार्यक्रम का समापन ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन: आगे का रास्ता के साथ हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रो. (डॉ.) एम. महताब आलम रिज़वी ने की।

दो दिवसीय यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, शांति, संवाद और अकादमिक सहयोग का एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरा। इस भव्य आयोजन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों-विद्वानों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की टीम ने उत्साह और ऊर्जा के साथ सक्रिय भागीदारी निभाई।

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