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इंडिया एनर्जी वीक2026 पर विशेष लेख
अमर चंद्र
गोवा की धरती से शुरू हुआ इंडिया एनर्जी वीक 2026 केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा यात्रा का आत्ममंथन है। यह आयोजन अपने चौथे संस्करण में उस समय हो रहा है, जब देश विकसित भारत 2047 और 2070 तक कार्बन न्यूट्रल बनने जैसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है। सवाल यह है कि क्या हमारी ऊर्जा रणनीति इन लक्ष्यों के अनुरूप गति पकड़ पा रही है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चौथे संस्करण के उद्घाटन पर भारत को “ऊर्जा क्षेत्र में अवसरों की वैश्विक भूमि” बताया। यह कथन उत्साहजनक है, लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारी भी बढ़ाता है। दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है। विकास की इस रफ्तार को बनाए रखते हुए पर्यावरण संतुलन कैसे साधा जाए, यही असली चुनौती है।ऊर्जा मिश्रण की सच्चाई और भविष्य की कसौटी
आज भारत की ऊर्जा टोकरी पर नज़र डालें तो तस्वीर स्पष्ट है।कोयला 48 प्रतिशत।तेल 28 प्रतिशत।प्राकृतिक गैस 8 प्रतिशत।नवीकरणीय ऊर्जा 12 प्रतिशत।परमाणु ऊर्जा 4 प्रतिशत।
यानी भारत की 75 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आज भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक हैजब कोयला अब भी ऊर्जा का सबसे बड़ा आधार है, तो ग्रीन इंडिया की राह कब और कैसे पूरी होगी?
क्या 2047 तक ऊर्जा मांग में होने वाली भारी वृद्धि को नवीकरणीय स्रोतों से पूरा किया जा सकेगा?
क्या ऊर्जा संक्रमण की गति, आर्थिक विकास की गति के साथ कदम मिला पाएगी?
और क्या यह परिवर्तन आम नागरिक, किसान और उद्योग सभी के लिए वहनीय होगा?
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि भारत केवल बातें नहीं कर रहा, बल्कि ठोस कदम भी उठा रहा है।
20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करना इसका उदाहरण है। इससे देश को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचत हुई और किसानों को सीधा लाभ मिला। यह दिखाता है कि ऊर्जा नीति यदि सही दिशा में हो, तो वह पर्यावरण और अर्थव्यवस्थादोनों को साध सकती है।
2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावॉट तक ले जाने की योजना, हाइड्रोजन और जैव ईंधन पर बढ़ता फोकस, एलएनजी और स्वच्छ रसोई ईंधन का विस्तार—ये सभी संकेत देते हैं कि भारत ऊर्जा प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि ऊर्जा विस्तार की रणनीति पर चल रहा है।
संवाद से समाधान की ओर इंडिया एनर्जी वीक 2026 का चौथा संस्करण इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह नीति, निवेश और नवाचार को एक मंच पर लाता है। यहां केवल भाषण नहीं होते, बल्कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था की दिशा तय होती है। यही कारण है कि यह मंच अब भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संवाद का केंद्र बन चुका है।
ग्रीन इंडिया का सपना तभी साकार होगा, जब ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण तीनों एक साथ आगे बढ़ें। इंडिया एनर्जी वीक 2026 हमें यही सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सही सवाल पूछ रहे हैं? और क्या उन सवालों के जवाब समय रहते ढूंढ पा रहे हैं?
चौथे संस्करण में पहुंच चुका यह मंच अब परीक्षा नहीं, बल्कि परिणाम मांगता है। क्योंकि ऊर्जा का भविष्य सिर्फ आंकड़ों से नहीं, दूरदृष्टि और निर्णायक कार्यवाही से तय होगा?
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