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विश्व पुस्तक मेले के लेखक मंच पर “प्रकृति पथ–नन्दा पथ” का लोकार्पण

नन्दा देवी राजजात 2026 पर हुई विचारोत्तेजक परिचर्चा

Amar sandesh नई दिल्ली। भारत मण्डपम विश्व पुस्तक मेला, भारत मण्डपम के हॉल संख्या 2–3 स्थित सेमिनार कक्ष के लेखक मंच पर प्रसिद्ध लेखक डॉ. सर्वेश उनियाल एवं हरीश भट्ट की ट्रैवलर्स हैंडबुक “प्रकृति पथ–नन्दा पथ” का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर नन्दा देवी राजजात 2026 के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक महत्व पर विस्तृत परिचर्चा भी आयोजित हुई।पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा, उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी के पूर्व उपनिदेशक निशीथ कुमार, हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’, शिक्षाविद एवं गढ़वाल हितैषिणी सभा, दिल्ली के महासचिव डॉ. पवन कुमार मैठाणी तथा पुणे (महाराष्ट्र) से आए हिमालयन ट्रैवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
विनसर प्रकाशन और लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में अतिथियों का स्वागत करते हुए निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने कहा कि नन्दा देवी राजजात हिमालयी क्षेत्र की लगभग 280 किलोमीटर लंबी कठिन लेकिन रोमांचक यात्रा है, जो हर 12 वर्षों में आयोजित होती है। यह यात्रा गांवों, जंगलों, दर्रों और ग्लेशियरों से होकर 15 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित होमकुण्ड में सम्पन्न होती है। उन्होंने बताया कि यह यात्रा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में विश्वभर में जानी जाती है। यह केवल तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति, लोक संस्कृति और हिमालयी जीवन दर्शन का अद्भुत संगम है, जहाँ जागर, चांचड़ी, दांकुड़ी और झोड़ा जैसे लोकगीतों की परंपरा जीवंत रहती है।
हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने कहा कि “प्रकृति पथ–नन्दा पथ” नन्दा देवी राजजात पर जाने वाले यात्रियों के लिए एक संपूर्ण गाइडबुक है, जो यात्रा को अधिक सुगम और अर्थपूर्ण बनाती है। उन्होंने डॉ. सर्वेश उनियाल के लेखन की सराहना करते हुए कहा कि जिस संजीदगी से उन्होंने उत्तराखण्ड के उत्पादों और उपहारों को शब्दों में पिरोया है, उसी तरह देश के पहले लेखक गांव पर भी उनका कार्य महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।
पूर्व उपनिदेशक निशीथ कुमार ने कहा कि नन्दा देवी राजजात हिमालय के प्रति मानव मन की श्रद्धा, प्रकृति के प्रति लगाव और देवत्व के भाव का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने उल्लेख किया कि देवी नन्दा की डोली ले जाने वाले श्रद्धालु इतनी लंबी यात्रा नंगे पांव करते हैं, जो हिमालयी प्रकृति और बुग्यालों के प्रति उनके गहरे भाव को दर्शाता है।
शिक्षाविद डॉ. पवन कुमार मैठाणी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि नन्दा देवी राजजात से उनका विशेष भावनात्मक जुड़ाव है। उन्होंने बताया कि इसी विषय से जुड़े उत्तर के कारण उन्हें अपनी एम.फिल परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि राजजात मातृ शक्ति के सम्मान, बेटी के प्रति अनुराग तथा भक्ति में शक्ति के भाव की स्थापना का पर्व है।
पुणे से आए 70 वर्षीय हिमालयन ट्रैवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप ने रोचक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि वर्ष 2010 में एक समाचार पत्र की कतरन के माध्यम से उन्हें नन्दा देवी राजजात की जानकारी मिली, जिसने उन्हें इस यात्रा को करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि अनेक मित्रों के साथ यात्रा की योजना बनी, पर अंततः 2014 की नन्दा देवी राजजात उन्होंने अकेले ही पूरी की। उन्होंने यह भी बताया कि आज लोकार्पित पुस्तक का दूसरा संस्करण उन्होंने 2014 में नन्दकेसरी पड़ाव से खरीदा था और तब से वे इसे अपने सैकड़ों मित्रों व रिश्तेदारों को भेंट कर चुके हैं। संयोगवश आज वे उसी पुस्तक के तीसरे संस्करण के लोकार्पण समारोह में वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
लेखक मंच पर आयोजित इस परिचर्चा में बड़ी संख्या में श्रोताओं ने सहभागिता की। नन्दा देवी राजजात के प्रति लोगों की जिज्ञासा और उत्साह पूरे कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

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