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विश्व शांति का महाकुंभ: कनाना में 1008 कुण्डीय श्री ललिता महायज्ञ की भव्य पूर्णाहुति का आगाज़

डॉ.के सी पांडे

कनाना। जहाँ एक ओर वर्तमान विश्व युद्ध की विभीषिका और संसाधनों की मारा-मारी से जूझ रहा है, वहीं राजस्थान की धोरों वाली धरती, बालोतरा के कनाना मठ में ब्रह्मांड शांति एवं विश्व कल्याण हेतु एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक अनुष्ठान अपनी पूर्णता की ओर बढ़ रहा है। पिछले एक वर्ष से अनवरत चल रहे श्री ललिता महायज्ञ की 365 दिवसीय भक्ति यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव पर है, जिसका भव्य शुभारंभ 22 मार्च 2026 को एक विशाल कलश यात्रा के साथ हुआ। इस अवसर पर मेवाड़ और मारवाड़ के कोने-कोने से श्रद्धालुओं का ऐसा अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ा कि कनाना की रेतीली धरा भक्ति के सागर में सराबोर हो गई। देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से भी हजारों की संख्या में लोग इस दुर्लभ आध्यात्मिक अवसर का पुण्य लाभ लेने यहाँ पहुँचे हैं।

इस महायज्ञ का बीजारोपण महंत श्री परशुराम गिरी जी के उस संकल्प से हुआ था, जो उन्होंने गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में ध्यान के दौरान लिया था। इस दिव्य कार्य की सफलता में दिल्ली की सुप्रसिद्ध ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ आचार्य महिमा अग्रवाल ने बहुत अहम भूमिका निभाई है; उन्होंने न केवल 1008 यज्ञकुंडों की वास्तु स्थिति और शुभ मुहूर्त निर्धारित किए, बल्कि आज की भव्य कलश व रथ यात्रा में भी माता के स्वरूप में विराजमान रहकर भक्तों को अभिप्रेरित किया। पूर्णाहुति के पहले दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि 11 लाख आहुतियां रहीं, जिन्हें विभिन्न गुरुकुलों से आए1100 विद्वान ब्राह्मणों की टोली ने शुद्ध गाय के घी और वैदिक समिधाओं के साथ 1008 कुंडों में समर्पित किया। गुरुकुल से आए इन सभी ब्राह्मणों को ललिता सहस्रनाम कॉन्टस्थ है। मंत्रोच्चार की इस दिव्य गूँज ने पूरे वातावरण को असीम ऊर्जा से भर दिया है।

यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर सामाजिक समरसता और ‘आध्यात्मिक अर्थशास्त्र’ का अनूठा उदाहरण बन गया है। यहाँ जैन, पटेल और राजपुरोहित समाज सहित 36 कौम के लोग कंधे से कंधा मिलाकर व्यवस्थाओं में जुटे हैं। महंत जी के विजन के अनुरूप 1600 कन्याओं द्वारा श्री यंत्र की स्थापना का नेतृत्व करना महिला सशक्तिकरण की एक बुलंद तस्वीर पेश करता है। साथ ही, लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से स्थानीय पर्यटन और व्यापार को जो मजबूती मिली है, उसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए द्वार खोल दिए हैं। श्रद्धालुओं के लिए ठहरने हेतु स्थानीय धर्मशालाओं और भवनों को खोल दिया गया है, जहाँ भोजन और आवास की अत्यंत सुंदर व व्यवस्थित व्यवस्था की गई है।

आज के इस महायज्ञ में महंत परशुराम गिरी जी महाराज की माता जी भी इस महायज्ञ में आई जिन्होंने अपने पुत्र को मात्र 6 साल की उम्र में महंत महेंद्र गिरी जी को भेंट कर दिया था। महायज्ञ में आए इतने बड़े जन सैलाब को देखकर वह विराट स्वरूप से चल रहे मायाग्य को देखकर वह भी भाव विभोर हो गई।

भक्ति के साथ-साथ यहाँ सामाजिक संस्कारों और मनोरंजन का भी अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। शाम के समय आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और कवि सम्मेलन आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस महाकुंभ में देश के विभिन्न मठों के मठाधीश और साधु-संतों का

जमावड़ा लगा हुआ है। महंत परशुराम गिरी जी के अनुसार, यह महायज्ञ ब्रह्मांड शांति की प्रार्थना के साथ-साथ एक नशामुक्त, संस्कारयुक्त और देशभक्त समाज के निर्माण की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी है। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का चरम समापन 24 मार्च 2026 को होगा, जिसमें स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज का सानिध्य प्राप्त होगा और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी पूर्ण आहुति देकर विश्व कल्याण की कामना करेंगे।

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