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कोलकाता में ‘नदी उत्सव’ का भव्य आयोजन: नदियों से संबंधित संस्कृति और वाणिज्य पर हुआ मंथन

डॉ के सी पांडेय

संवाददाता। कोलकात्ता।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के ‘जनपद संपदा’ प्रभाग द्वारा कोलकाता में दो दिवसीय ‘नदी उत्सव’ का भव्य आयोजन किया गया। ब्रिटिश उप उच्चायोग के सहयोग से आयोजित इस उत्सव का मुख्य विषय “द फ्लुवियल आर्काइव: द गंगा बेसिन, कल्चर एंड कॉमर्स” (नदी अभिलेखागार: गंगा बेसिन, संस्कृति और वाणिज्य) रहा। 31 जनवरी से 1 फरवरी तक चले इस कार्यक्रम में विद्वानों, शोधकर्ताओं और कलाकारों ने गंगा नदी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व पर चर्चा की।
उत्सव के प्रथम सत्र की शुरुआत बेहद भावपूर्ण रही।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इसकी वायलिन प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके साथ ही, प्राचीन मंदिर परंपराओं से लेकर आधुनिक भारत तक कथक के क्रमिक विकास को नृत्य के माध्यम से दर्शाया गया।
संगीत सत्र में “मेरा गाँव नदिया किनारे” और “मोरा सैयां बुलाए आधी रात नदिया किनारे” जैसे गीतों के माध्यम से नदी परंपराओं को जीवंत किया गया। साथ ही, “अ रिवर ऑफ फ्लेवर्स” सत्र में औपनिवेशिक व्यंजनों और बंगाली स्वाद के विकास पर रोचक जानकारी साझा की गई।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर डॉ. एंड्रयू फ्लेमिंग उपस्थित रहे। उन्होंने भारत की जल विरासत के संरक्षण और सांस्कृतिक साझाकरण के महत्व पर बल दिया।
दूसरे सत्र में विशेषज्ञों ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे, जिनमें प्रमुख थे-सार्वजनिक कला के रूप में भक्ति: पुनर्जागरण का सांस्कृतिक इंजन,
औपनिवेशिक वास्तुकला-बाजार का ब्लूप्रिंट और ज्यामिति, शहर और गंगा -वास्तुकला और रबीन्द्र संगीत के साथ नदी का अंतर्संबंध।
यह उत्सव केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने गंगा के सामने खड़ी पारिस्थितिक चुनौतियों पर भी ध्यान केंद्रित किया। विशेषज्ञों ने नदी किनारे सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया।
आभार व्यक्त किया गया
कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए आयोजकों ने अरिजीत दत्ता और सुबोजित दत्ता के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। साथ ही, ब्रिटिश उप उच्चायोग के कर्मचारी अरुणवो भट्टाचार्य और देवाजिन को उनके उत्कृष्ट प्रबंधन और सहयोग के लिए सम्मानित किया गया।
इस आयोजन के मुख्य रूप से गंगा बेसिन की विरासत, वायलिन पर वंदे मातरम, कथक नृत्य, और औपनिवेशिक व्यंजनों पर शोधपरक चर्चा आकर्षण का विषय रहे।

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