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अवधेश कुमार
कुल 932 घंटे 35 मिनट यानी 40 दिनों के युद्ध में खरबों की क्षति के बाद खाड़ी में अस्थायी दो सप्ताह के संघर्ष विराम की घोषणा हुई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद ईरान ने भी इसे स्वीकार कर लिया तथा इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कहा है कि वे ट्रंप के कदमों से सहमत हैं। हालांकि यह संघर्ष विराम है संघर्ष की समाप्ति नहीं। ईरान की ओर से कहा गया है कि उसने जो 10 बिंदु दिए अमेरिका उन पर विचार कर रहा है। अमेरिका ने कहा है कि हमने जो 15 शर्तें रखीं उन पर ईरान विचार कर रहा है। यानी दोनों ने शर्तों को स्वीकारने की घोषणा नहीं की है। दूसरे , इजरायल ने ईरान पर हमले रोकने की बात स्वीकारते हुए कहा है कि लेबनान समझौते से बाहर है। ईरान के 10 बिन्दुओं में लेबनान में हिज्बुल्लाह पर हमले रोकने की शर्त भी है। ट्रंप का कथन है कि युद्धविराम के बाद हम दीर्घकालिक शांति तथा पश्चिम एशिया के स्थायी समझौते की ओर बढ़ेंगे। क्या वाकई पश्चिम एशिया की जटिल समस्या का समाधान संभव है?
दुनिया भर में निहित स्वार्थी नैरेटिव चलाने वाले पहले दिन से अमेरिका इजरायल को विश्व खलनायक एवं ईरान को योद्धा तथा निर्दोष पीड़ित साबित करते रहे हैं। सोच यह है कि ट्रंप को झुकना पड़ा एवं ईरान ने अपनी शर्तों पर संघर्ष विराम माना तो साफ है कि ऐसे तत्व शांति नहीं कुछ और चाहते हैं। ट्रंप ने 6 अप्रैल को अपने पोस्ट में ईरान के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए स्पष्ट धमकी दी थी कि अगर होर्मूज जलडमरूमध्य नहीं खोला तो एक ही पैकेज में उसके ऊर्जा संस्थान,आधारभूत संरचना, पुल सभी ध्वस्त होंगे। दिख रहा था कि ट्रंप दबाव की तरह भले धमकी का इस्तेमाल कर रहे हैं , वे युद्ध से वापसी भी चाहते थे, लेकिन उनके तेवर इतने कड़े थे और उन्होंने इसके प्रमाण दिए थे तो ईरान का अड़ियल रवैये पर पुनर्विचार करना स्वाभाविक था। ईरान अड़ता तो उसका विनष्ट होना निश्चित था। अगर भयानक रक्तपात व अनवरत युद्ध वाले पश्चिम एशिया समस्या का समाधान हो जाए तो विश्व में शांति स्थापना के ऐसे अध्याय की शुरुआत होगी जिसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती। किंतु तह साकार होता नहीं दिखता। इजरायल को लेकर ईरानी इस्लामी शासन की विचारधारा, व्यवहार , लेबानन, गाजा, इराक से यमन तक उसके द्वारा खड़े आतंकवादी समूह की गतिविधियां, आंतरिक राजनीति तथा यहूदी इस्लाम के बीच मजहबी विवाद आदि को आधार बनाएं तो यह लक्ष्य अत्यंत कठिन है।
तत्काल इतना हुआ है कि ईरान ने परिस्थितियां देखकर होर्मूज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को स्वीकृति दी है किंतु यह भी कहा है कि ईरानी सेना के साथ समन्वय और तकनीकी शर्तों के आधार पर होगा। समस्या यही है। उसके सबसे बड़े सहयोगी चीन की समझाइस का तत्काल असर है। उसकी 10 शर्तों में ईरान जलडमरूमध्य के नियमन और नियंत्रण का उसका अधिकार स्वीकार करना, प्रति जहाज 2 करोड़ डॉलर टोल लेना भी शामिल है। हालांकि उसने कहा है कि इसमें ओमान का भी हिस्सा होगा। उसने ईरान पर भविष्य में हमले न करने तथा सुरक्षा की गारंटी, उसके न्यूक्लियर कार्यक्रम को जारी रखने की अनुमति, युद्ध की पूरी क्षतिपूर्ति, क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति की समाप्ति, लेबनान में सारे हमले रोकने आदि उसकी शर्तों ऐसी है जो स्वीकार नहीं हो सकती। उसने नहीं कहा है कि हिजबुल्लाह ,हमास या हुती इजरायल पर हमले रोक देंगे। बावजूद रोकने के बाद अमेरिका तुरंत हमला शायद ही करे।
28 फरवरी को आरंभ युद्ध में ईरान को ऐसी अपूरणीय क्षति हुई है जिसकी उसने दु:स्वप्नों में भी कल्पना नहीं की थी। यह इस युद्ध का कटु सच है जिसको नकारने के बाद आप सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। युद्ध में 3721 मौतें हुई। इनमें ईरान में सबसे ज्यादा 2076, लेबनान में 1461और अरब देशों में 156 लोग मारे गए। अरब में इराक में 109, कुवैत में 7,बहरीन में 3, सऊदी अरब में 2,संयुक्त अरब अमीरात में 12, सीरिया में 4 और ओमान में 3 मौतें हुई। इसके समानांतर इजराइल में 26 लोग मारे गए तथा 13 अमेरिकी सैनिक भी। एक फ्रांसीसी सैनिक की मृत्यु हो गई। ईरान में कुल 13 हजार स्थानों पर बम गिरे हैं। कल्पना करिए कि कैसा विध्वंस हुआ है। उसकी न्यूक्लियर क्षमता वाले स्थान ध्वस्त किए गए, मिसाइल बनाने के केंद्र काफी हद तक विनष्ट हुए, उसके लिए जो स्टील और अन्य सामग्रियां चाहिए वहां भी विध्वंस हुआ। जिन स्थानों में अंदर प्रवेश करना कठिन था उनके गेट या अन्य दिखने वाले जगहों पर बम गिराकर जितना ध्वस्त किया जा सकता था उतना करके छोड़ दिया गया। आगे के लिए अमेरिका और इजरायल ने काफी विचार कर विनाश के लिए ऐसे स्थान चिन्हित किए थे जिनमें उसके महत्वपूर्ण बिजली केंद्र , पूल , संचार संस्थान , आवश्यक सेवाओं की आपूर्तियों के महत्वपूर्ण केंद्र आदि थे। 28 फरवरी के हमले के बाद ईरान के इतिहास का सबसे बड़ा आघात अयातुल्लाह अलखामेनेई , उनके परिवार व रिश्तेदारों के महत्वपूर्ण सदस्य तथा सत्ता शीर्ष के एक साथ करीब तीन दर्जन लोगों का मार दिया जाना था। अचानक एक रिक्ति आ गई। यह ऐसे ही था जैसे ईरान एक साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके महत्वपूर्ण मंत्रियों तथा इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू सहित प्रमुख मंत्रियों और सैन्य अधिकारियों को मार डाले। बीच में जो भी सामने दिखता सेना प्रमुख, खुफिया प्रमुख ,आईआरजीसी प्रमुख,पुलिस प्रमुख, बासित फोर्स प्रमुख , उनके उप प्रमुख , इनके उत्तराधिकारी सब मारे जा रहे थे। मोजताबा खामेनेई को उत्तराधिकारी घोषित किया गया लेकिन अभी तक वे नहीं दिखे और जैसी सूचना है इतनी बुरी तरह घायल हुए हैं कि उनका उठना कठिन है।
पूरा कमान आईआरजीसी जैसी इस्लामी शक्तियों के हाथ था, जिसनेअपने जवानों के एक इमाम के साथ नमाज पढ़ने का वीडियो जारी किया। जिसका संदेश था कि हम इस्लाम के मुजाहिद हैं, उसके लिए लड़ रहे हैं और हम शहीद होंगे तो मजहब के लिए जिसके लिए हम पैदा हुए हैं। सूत्र नागरिक शासन के हाथों होता तो शायद संघर्ष राम पहले हो जाता। मसूद पेजेश्कियन ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि पर मिसइल हमले के लिए क्षमा मांगी किंतु उसके कुछ ही घंटे बाद फिर हमले हो गए। इससे साफ था कि इस्लामी क्रांति के बाद खामेनेई द्वारा सामान्य सेना, सुरक्षा, प्रशासन राजनीति के समानांतर शीर्ष भूमिका में मजहबी सेना -आंतरिक सुरक्षा , प्रशासन , राजनीतिक व्यवस्थायें खड़ी कीं कमान उनके हाथों में है । यही भविष्य की शांति में सबसे बड़ी समस्या होगी। मजहब आने के बाद किसी भी मुस्लिम देश के साथ युद्ध को निर्णायक अवस्था में पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता है।
समस्या का मूल ईरानी इस्लामी शासन द्वारा इजराइल के अस्तित्व को केवल अस्वीकार करना ही नहीं उसे समाप्त करने का राष्ट्रीय लक्ष्य बनाना है। इसके लिए यमन की हुती से लेकर गाजा में हमस ,लेबनान में हिजबुल्ला ,इराक और अन्य जगह उसने आतंकवादी समूह खड़े किए और उनको सरेआम पूरी मदद देता है। यह संगठन मिसाइल और ड्रोन से हमले करते हैं। ईरान की इस्लामी व्यवस्था इजरायल को ही नहीं, संपूर्ण यहूदी समुदाय को इस्लाम का दुश्मन मानता है और उनकी सीधी घोषणा है कि आप हमारे हो या तुम्हारा पूरी तरह नाश करेंगे। इसमें इजरायल के सामने क्या विकल्प हो सकता है? ईरान पड़ोसी अरब देशों के विरुद्ध भी हमलावर रहता है। युद्ध के दौरान उसने इजराइल से ज्यादा संयुक्त अरब अमीरात पर ड्रोन हमले किए। अगर अमेरिका अकेले एकपक्षीय तरीके से ईरान से कोई समझौता करता है तो अरब देशों के सामने समस्या पैदा होगी। वे ईरानी सैन्य शक्ति के भय वाली स्थिति में रहना नहीं चाहते। सऊदी अरब ,संयुक्त अरब अमीरात ,बहरीन ओमान , कुवैत , कतर सभी चाहते थे कि अमेरिका वहां लंबा युद्ध करे और ईरान को सैन्य और आर्थिक दृष्टि से पंगु बनाकर समझौता करने के लिए मजबूर कर दे।अगर ईरान के स्थायी रुप से मजबूर होने की संभावना नहीं बनी तो ये देश भी अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने जिसमें मिसाइल से लेकर न्यूक्लियर शक्ति बनने का लक्ष्य शामिल होगा, दिशा में तेजी से अवसर होंगे। अरब के अनेक देशों ने इजरायल के अस्तित्व को घोषित या अघोषित स्वीकार कर लिया है। ईरान और उसके पोषित हथियारबंद समूह ऐसा कभी नहीं कर सकते। पर हमले के कुछ समय पूर्व तक पूरे ईरान में हजारों लोग इस्लामी शासन के विरुद्ध सड़कों पर थे। उनको बेरहमी से कुचला गया, फांसी दी गई। मुद्रास्फीति 120% से ऊपर चली गई थी।रियाल की कीमत डेढ़ लाख डॉलर तक थी।आज रियाल 0.000070 भारतीय रुपये के बराबर है। देश में त्राहि-त्राहि थी। कुर्द, अज़रबैजानी, बलोच, अरबी आदि का विद्रोह अपनी जगह है। ईरान के कुह-ए- सियाह क्षेत्र में फंसे दो पायलटो को अमेरिका द्वारा छुड़ाने के बाद वहां के लोगों के विरुद्ध आईआरजीसी व पुलिस बलों की कार्रवाई जारी है। इस क्षेत्र के लोग इस्लामी गणराज्य के विरुद्ध आवाज उठाते रहे हैं। तो ईरान के अंदर आने वाले समय में बड़ा उबाल भी देखने को मिलेगा। मोजताबा खामेनेई सत्ता संभालने लायक नहीं हुये तो शीर्ष स्तर पर भी व्यापक सत्ता संघर्ष देखने को मिलेगा। इसमें संघर्ष विराम का भविष्य बिल्कुल अनिश्चित है।
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