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लेखक सुरेन्द्र हालसी
स्वतंत्र पत्रकार
फरवरी का महीना आते ही दिल कुछ ज़्यादा ही सजग हो जाता है।हवा में कोई शिकायत नहीं होती, बस एक हल्की-सी उम्मीद तैरने लगती है कि शायद किसी को याद किया जाएगा, किसी का इंतज़ार किया जाएगा। इस मौसम में प्रेम अक्सर अपने-आप सामने आ जाता है।कभी मुस्कान बनकर, कभी स्मृति बनकर, और कभी किसी अधूरे भाव की तरह, जो भीतर कहीं चुपचाप बना रहता है।
आज का युवा प्रेम को खुलकर जी रहा है, उसे कहने से नहीं डरता, और यह उसके समय की खूबसूरती है। यह सहजता, यह खुलापन, यह आत्मविश्वास; यही आज की पीढ़ी की ताकत है। प्रेम अब छिपकर नहीं, सामने से बोला जाता है।इसी खुलेपन के साथ प्रेम आज कई रंगों और नामों में सामने आता है।
रोज़ डे, प्रपोज़ डे, टेडी डे, चॉकलेट डे, हग डे, प्रॉमिस डे और फिर वेलेंटाइन डे।हर दिन किसी न किसी एहसास का प्रतीक है। कहीं गुलाब बोलते हैं, कहीं वादे, कहीं एक आलिंगन। यह सब गलत नहीं है। यह बस समय का बदला हुआ तरीका है, जिससे प्रेम अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है।
लेकिन इसी आधुनिक उत्सव के बीच, कहीं बहुत पीछे स्मृतियों की पगडंडी पर, एक और तरह का प्रेम भी साँस ले रहा है ।
वह प्रेम, जो दिखता नहीं था, पर भीतर बहुत गहराई से महसूस किया जाता था।
वह प्रेम, जो शोर नहीं करता था, पर कमज़ोर भी नहीं था।
वह प्रेम, जो एक ऐसे कालखंड में जिया गया, जब भावनाएँ उतनी ही सच्ची थीं जितनी आज हैं, बस उन्हें व्यक्त करने के रास्ते कम थे, और डर अधिक।
उस समय न मोबाइल था, न चैट, न स्क्रीन पर दिन-रात चलती बातचीत।प्रेम किसी एक दिन का आयोजन नहीं था।वह धीरे-धीरे मन में उतरने वाली अनुभूति थी, जिसे नाम देना भी संकोच का विषय होता था। कई बार तो प्रेम को स्वीकार करने से पहले ही उसे छुपा लिया जाता था। क्योंकि प्रेम से नहीं, “लोक-लज्जा” से डर लगता था।
प्रेम का इज़हार किसी क्लिक से नहीं, बल्कि साहस से होता था।काग़ज़ और कलम ही संवाद के साधन थे, और वही भावनाओं का पूरा संसार भी।एक प्रेम-पत्र लिखना अपने आप में जोखिम था ! हाथ काँपते थे, शब्द चुनते हुए साँस थम जाती थी। हर पंक्ति के साथ यह डर जुड़ा होता था कि अगर यह पत्र गलत हाथों में पड़ गया तो क्या होगा?
और सच तो यह है कि उस दौर में प्रेम के साथ सबसे बड़ा खतरा “असफल होना” नहीं था,सबसे बड़ा खतरा था-उजागर हो जाना। स्कूल, कस्बे और मोहल्ले प्रेम के लिए नहीं, निगरानी के लिए बने थे।परिवार, विद्यालय और समाज-तीनों मिलकर एक ऐसी सामाजिक संरचना रचते थे, जहाँ व्यक्तिगत भावनाओं के लिए जगह बहुत सीमित थी।एक तरफ़ भावनाएँ थीं – सच्ची, निश्छल, कोमल।
दूसरी तरफ़ व्यवस्था थी -कठोर, अनुशासनप्रिय और कई बार असंवेदनशील।
लोक-लज्जा उस दौर का सबसे कठोर न्यायालय थी।
एक मासूम-सा इज़हार अगर सार्वजनिक हो गया, तो वह अपराध जैसा महसूस होता था।हँसी, फुसफुसाहट, उँगलियों के इशारे , ये सब किसी सज़ा से कम नहीं थे।
उस क्षण में अपराध प्रेम नहीं था, बल्कि “पकड़े जाना” था।
कई बार एक छोटी-सी चिट्ठी, एक डायरी का पन्ना, या किसी दोस्त के जरिए भेजा गया संदेश – गलत हाथों में पड़ जाता था। और फिर एक मासूम भावना पूरे समूह की मनोरंजन सामग्री बन जाती थी।उस लड़की या उस लड़के की आँखों के सामने दुनिया बदल जाती थी।चेहरा उतर जाता था, आवाज़ काँपने लगती थी, मन सिकुड़ जाता था।वह क्षण केवल शर्म का नहीं होता था- वह जीवन भर के लिए मन में बैठ जाने वाला डर होता था।इसीलिए उस दौर का प्रेम अक्सर अधूरा रह गया।
न संवाद पूरा हुआ, न स्वीकार।पर इसी अधूरेपन में उसकी गहराई भी थी।क्योंकि जो कहा नहीं जा सका, वह मन में जीवन-भर गूँजता रहा।
उस समय प्रेम शब्दों से नहीं, संकेतों से समझा जाता था-
बरामदे में एक पल की नज़र,
किताब लौटाते हुए उँगलियों का हल्का स्पर्श,
मेले में अचानक सामना हो जाना,
और फिर देर तक उसी क्षण का यादों में बस जाना।
आज का प्रेम इससे बिल्कुल अलग संसार में साँस ले रहा है।आज मंच है, स्वतंत्रता है, संवाद के अनगिनत साधन हैं।इज़हार आसान है, दूरी मिट चुकी है, और भावनाएँ कहने से पहले दबाई नहीं जातीं।यह बदलाव अपने-आप में सकारात्मक है।
लेकिन हर सुविधा अपने साथ एक चुनौती भी लाती है।
आज प्रेम में शब्द बहुत हैं, पर प्रतीक्षा कम होती जा रही है।बातचीत लगातार है, पर ठहराव कम।रिश्ते जल्दी बनते हैं और कभी-कभी उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं।कहीं न कहीं, इस तेज़ रफ्तार समय ने प्रेम को भी तेज़ कर दिया है।
अब रिश्ते “समझने” से पहले “घोषित” हो जाते हैं।
अब बात “गहराई” से पहले “प्रस्तुति” तक पहुँच जाती है।
और कई बार भावनाएँ दिल में टिकने से पहले ही स्क्रीन पर बह जाती हैं।
लेकिन यह कहना भी उचित नहीं होगा कि आज के प्रेम में सच्चाई नहीं है।
सच्चाई आज भी है,बस उसका स्वरूप बदल गया है।
आज के युवाओं के पास अधिकार है, विकल्प है और अपनी बात कहने की स्वतंत्रता भी।
पर जहाँ अधिकार होता है, वहाँ जिम्मेदारी भी ज़रूरी हो जाती है।
इसलिए, यदि उस पुराने दौर का प्रेम आज के युवाओं के लिए कोई सीख बन सकता है,
तो वह है, संवेदनशीलता।
प्रेम में केवल “कह देना” महत्वपूर्ण नहीं,
किस तरह कहना, कब कहना और कितना कहना है,यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
और प्रेम में केवल “मिल जाना” ही नहीं,
निभा पाना भी एक कला है।
उस दौर के प्रेम की सबसे बड़ी पूँजी प्रतीक्षा थी।
डाकिए की राह देखना,
बरसात में भीगते हुए किसी संदेश की उम्मीद रखना,
त्योहार पर मिले एक पत्र को बार-बार पढ़ना,यही प्रेम था।वह प्रेम शोर नहीं करता था, वह भीतर धीरे-धीरे गहराता था।कभी-कभी लगता है, उस समय प्रेम के पास साधन नहीं थे,पर प्रेम के पास समय था।
और समय, प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा भी है और सबसे बड़ा सौंदर्य भी।
यह लेख आधुनिक प्रेम का विरोध नहीं है।
यह केवल एक विनम्र स्मरण है,कि प्रेम केवल मनाने की वस्तु नहीं,
बल्कि समझने और सँजोने की भावना है।
तकनीक ने हमें पास ला दिया है,
लेकिन संवेदनशीलता अब भी सीखी जानी चाहिए।
आज के युवाओं के लिए उस पुराने दौर का प्रेम एक प्रेरणा हो सकता है-
कि प्रेम में सम्मान हो, धैर्य हो और दूसरे के मन को सुनने की ईमानदार कोशिश हो।
हर भावना को तुरंत दुनिया के सामने रखना ज़रूरी नहीं।
कुछ भाव मन के सुरक्षित कोनों में ही सबसे सुंदर होते हैं।
और उस पुराने दौर के युवाओं के लिए यह लेख एक श्रद्धांजलि है-
उन तमाम अधूरे प्रेमों को,
जो कभी पूरे नहीं हो पाए,
लेकिन जिन्होंने हमें महसूस करना सिखाया।
इस वेलेंटाइन पर, जब प्रेम अलग-अलग दिनों में मनाया जाएगा,
शायद किसी एक पल में कोई पुरानी चिट्ठी याद आ जाए।
और तब यह समझ में आए कि-
जब प्रेम चिट्ठी था,
तब वह कम कहा जाता था,
पर पूरी ज़िंदगी के लिए कहा जाता था।
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