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सुरेंद्र सिंह हालसी
स्वतंत्र पत्रकार
उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं क्षेत्र हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है, और इसी क्षेत्र की रामनगर विधानसभा इन दिनों एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस चर्चा के केंद्र में हैं संजय नेगी, एक ऐसा नाम जो बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के साथ जुड़े हुए भी क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
संजय नेगी का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था। कॉलेज के दिनों में उन्होंने छात्रहितों के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया और अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। यही सक्रियता आगे चलकर उन्हें रामनगर की राजनीति में एक मजबूत और जुझारू चेहरा बनाती गई। कांग्रेस की पृष्ठभूमि से जुड़े रहे संजय नेगी लंबे समय तक पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ताओं में गिने जाते थे।
साल 2022 के विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का अहम मोड़ साबित हुए। जब कांग्रेस ने रामनगर सीट से बाहरी उम्मीदवार महेंद्र पाल सिंह को टिकट दिया, तो स्थानीय असंतोष के बीच संजय नेगी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगभग 17 हजार वोट हासिल कर सभी राजनीतिक दलों को चौंका दिया। यह परिणाम न केवल उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता का प्रमाण था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि रामनगर की जनता के बीच उनकी गहरी पकड़ है।
संजय नेगी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क है। वे लगातार लोगों के सुख-दुख में शामिल रहते हैं, जिससे उनका सीधा जुड़ाव जनता से बना रहता है। यही कारण है कि वे बिना बड़े संसाधनों के भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने में सक्षम रहते हैं। रामनगर नगरपालिका चुनाव में बीजेपी का चेयरमैन उम्मीदवार तय न कर पाना भी कई राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उनकी रणनीतिक पकड़ का उदाहरण माना जाता है।
वर्तमान में भी संजय नेगी का प्रभाव कम नहीं हुआ है। हाल ही में हुए ब्लॉक प्रमुख चुनाव में उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी पत्नी को ब्लॉक प्रमुख बनवाकर अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया, जबकि वे स्वयं ज्येष्ठ प्रमुख के पद पर हैं। यह उनकी संगठन क्षमता और जमीनी पकड़ को और मजबूत करता है।
अब नजर 2027 के विधानसभा चुनावों पर है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई जैसा माना जा रहा है। ऐसे में पार्टी का टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व के साथ सामंजस्य बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस रामनगर में संजय नेगी जैसे जनाधार वाले नेता को साथ नहीं जोड़ती, तो उसे एक बार फिर हार का सामना करना पड़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के भीतर ही एक धड़ा संजय नेगी की संभावित एंट्री का विरोध कर रहा है, जिसका कारण आंतरिक गुटबाजी और व्यक्तिगत हित बताए जा रहे हैं। खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ उनकी नजदीकियों को भी इस विरोध का कारण माना जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठकर जीत की रणनीति बनाएगी या फिर एक बार फिर वही गलती दोहराएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पिछले चुनावों में कांग्रेस को टिकट वितरण की गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ा था, विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र में। यदि 2027 में भी पार्टी ने स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज किया, तो रामनगर और आसपास की सीटें उसके हाथ से निकल सकती हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि संजय नेगी किसी एक दल तक सीमित नहीं हैं। वे जिस भी राजनीतिक दल के साथ जाएंगे, उस दल का पलड़ा भारी होने की संभावना जताई जा रही है। यहां तक कि यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि वे निर्दलीय रूप से भी चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं, खासकर युवाओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए।
रामनगर की जनता के बीच यह चर्चा आम है कि वे संजय नेगी को अपने विधायक के रूप में देखना चाहते हैं। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व समय रहते सही निर्णय लेता है या नहीं।
अंततः सवाल सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि कांग्रेस के भविष्य का है। क्या पार्टी वास्तव में उत्तराखंड में वापसी चाहती है, या आंतरिक राजनीति उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनी रहेगी? रामनगर इसका स्पष्ट जवाब देने वाली सीट साबित हो सकती है।
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