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भोजपुरी के शेक्सपियर और उनके ‘सूत्रधार’: एक आलोचनात्मक विश्लेषण

किताब कि लेखिका डॉ.रेखा कुमारी त्रिपाठी
प्रस्तावना
साहित्य और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। जब हम भोजपुरी लोक-संस्कृति और लोक-चेतना की बात करते हैं, तो एक नाम पूरी प्रखरता के साथ उभरता है— भिखारी ठाकुर। डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी की पुस्तक ‘सूत्रधार का सामाजिक परिपेक्ष्य’ इसी महान व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर लिखी गई है। इस पुस्तक का मूल आधार सुप्रसिद्ध उपन्यासकार संजीव द्वारा रचित उपन्यास ‘सूत्रधार’ है, जिसमें भिखारी ठाकुर के जीवन-संघर्ष और उनकी कलात्मक ऊर्जा को जीवंत किया गया है।
कथाकार संजीव: संघर्ष से सृजन तक
उपन्यास ‘सूत्रधार’ के लेखक संजीव हिंदी साहित्य के वह देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने सदैव हाशिए के समाज को अपनी लेखनी का विषय बनाया। उनके नामकरण की कहानी भी अत्यंत रोचक है; उनका बचपन का नाम रामसंजीवन प्रसाद था, जिसे ‘सारिका’ में कहानी छपने के दौरान संपादक कमलेश्वर जी ने छोटा कर ‘संजीव’ कर दिया।
मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित संजीव का जीवन स्वयं अभावों और संघर्षों के बीच बीता, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है। ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान! नीचे आग है’, ‘धार’ और ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने शोषित, उपेक्षित और दलित समाज की पीड़ा को स्वर दिया है।
भिखारी ठाकुर: लोक-चेतना के वास्तविक सूत्रधार
‘सूत्रधार’ उपन्यास के नायक भिखारी ठाकुर केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि वे एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे एक साथ कवि, गीतकार, नाटककार, निर्देशक, लोक-संगीतकार और अभिनेता थे। 18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर (दियारा) में जन्मे भिखारी ठाकुर ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से भोजपुरी समाज में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अलख जगाई।
प्रमुख विशेषताएँ और उपलब्धियाँ
बहुमुखी प्रतिभा: उन्होंने 1919 से 1965 तक अपनी नाट्य मंडली के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया। वे स्वयं स्त्री पात्रों का ऐसा जीवंत अभिनय करते थे कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाते थे।
लोकप्रियता: उनकी ख्याति केवल गाँवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि हथुआ, बेतिया और डुमरिया जैसे बड़े घरानों के ज़मींदारों ने भी उन्हें मान-सम्मान प्रदान किया।
भोजपुरी के शेक्सपियर: महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने उनकी अद्भुत नाट्य दृष्टि और रचनाशीलता को देखते हुए उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा था। 1944 में बिहार सरकार ने उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि से भी नवाजा।
सामाजिक यथार्थ और लोक-नाटक
भिखारी ठाकुर के नाटकों का विषय उनके परिवेश से ही उपजा था। उन्होंने समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया:
बेटी वियोग और अनमेल विवाह: अपने पड़ोस की एक घटना से प्रेरित होकर उन्होंने ‘बेटी वियोग’ लिखा, जिसमें वृद्ध वर के साथ छोटी बच्ची के विवाह की त्रासदी को दिखाया गया है।
प्रवास की पीड़ा (विदेशिया): बेरोजगारी के कारण घर छोड़ते पुरुषों और पीछे छूट गई ‘बिरहणी’ स्त्रियों के दर्द को उन्होंने ‘विदेशिया’ के माध्यम से अमर कर दिया।
पारिवारिक विघटन: ‘गबरघिचोर’ जैसे नाटकों में उन्होंने बेरोजगारी, पलायन और पारिवारिक कलह का यथार्थ चित्रण किया।
संजीव ने ‘सूत्रधार’ में यह स्पष्ट किया है कि भिखारी ठाकुर का साहित्य नारी के अभाव में अधूरा है। उन्होंने तत्कालीन ग्रामीण परिवेश में नारी की सामाजिक स्थिति और उसकी मानसिक वेदना का सूक्ष्म अनुशीलन किया। उनके नाटकों में जहाँ एक ओर स्त्रियों का शोषण और विवशता दिखती है, वहीं दूसरी ओर उनकी ममता, वात्सल्य और पतिव्रता धर्म के उज्ज्वल पक्ष भी उभरते हैं।
इसके साथ ही, उपन्यास में भारतीय नवजागरण काल की वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याओं पर भी गंभीर विमर्श मिलता है। त्योहारों (छठ, दीपावली, नवरात्र) और लोक-उत्सवों का चित्रण ग्रामीण जीवन की जीवंतता को दर्शाता है।
किताब समीक्षा लेख
डॉक्टर सुशील कुमार पांडे,
डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी की पुस्तक और संजीव का उपन्यास ‘सूत्रधार’ संयुक्त रूप से हमें उस माटी के कलाकार से मिलवाते हैं जिसने अपनी कला को समाज सुधार का माध्यम बनाया। भिखारी ठाकुर सही अर्थों में लोक के ‘सूत्रधार’ थे, जिन्होंने उपेक्षित और अशिक्षित जनता को अपनी पहचान दी। यह कृति न केवल एक जीवनी है, बल्कि भोजपुरी अंचल के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
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