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खामोशी में छिपी सियासत: क्या हरीश रावत करेंगे बड़ा राजनीतिक वार?

– सुरेंद्र सिंह हालसी,

नई दिल्ली।उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी है, लेकिन यह खामोशी सामान्य नहीं मानी जा रही। राजनीतिक गलियारों में इसे “तूफान से पहले की शांति” कहा जा रहा है। इस खामोशी के केंद्र में हैं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता , जिनकी सक्रियता भले ही कम दिखाई दे रही हो, लेकिन उनके इर्द-गिर्द सियासी हलचल तेज हो चुकी है।

करीब छह दशक से कांग्रेस की राजनीति का अहम हिस्सा रहे हरीश रावत ने ग्राम स्तर से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक का लंबा सफर तय किया है। संगठन और सरकार दोनों में उनकी गहरी पकड़ रही है। यही कारण है कि आज भी उन्हें उत्तराखंड की राजनीति का सबसे अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा माना जाता है।

हालांकि, वर्तमान समय में पार्टी के भीतर उनकी भूमिका पहले जैसी सक्रिय नहीं दिखती। निर्णय प्रक्रिया से उन्हें कुछ हद तक अलग-थलग किया गया है और उनकी राय को वह महत्व नहीं मिल रहा, जिसकी अपेक्षा एक वरिष्ठ नेता के तौर पर की जाती है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरीश रावत जैसे नेता को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।

इसी बीच रामनगर से उभरते युवा नेता को लेकर सियासत गर्म है। पिछले विधानसभा चुनाव में 17 हजार से अधिक मत हासिल कर उन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। कांग्रेस पृष्ठभूमि से जुड़े रहने के बावजूद उन्होंने कभी पार्टी के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी नहीं की, जिससे उनकी स्वीकार्यता और बढ़ी है।

सूत्रों के अनुसार, हरीश रावत संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल कराने के लिए प्रयासरत हैं। इसे केवल एक सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन इस राह में एक बड़ी चुनौती भी है-रामनगर की राजनीति में और संजय नेगी और रणजीत रावत के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेद।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी संतुलन साध ले और रंजीत रावत को सल्ट तथा संजय नेगी को रामनगर से अवसर दे, तो कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो सकती है। लेकिन इसके लिए आंतरिक मतभेदों को सुलझाना आवश्यक होगा।

वर्तमान परिदृश्य में हरीश रावत का रुख बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। संजय नेगी के मुद्दे पर उनका अडिग रहना यह संकेत देता है कि वे इस बार किसी समझौते के मूड में नहीं हैं। राजनीतिक भाषा में इसे “अंगद का पैर” कहा जा रहा है जिसे हिलाना आसान नहीं होगा।

अब सवाल यह है कि कांग्रेस नेतृत्व क्या निर्णय लेता है। क्या पार्टी अपने अनुभवी नेता की बात मानकर संगठनात्मक संतुलन बनाएगी, या फिर नए समीकरणों के साथ आगे बढ़ने का जोखिम उठाएगी?

स्पष्ट है कि हरीश रावत की खामोशी को कमजोरी नहीं माना जा सकता। यह उनके अनुभव का हिस्सा है, जहां वे सही समय का इंतजार करते हैं और फिर निर्णायक चाल चलते हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में आने वाले समय में बदलाव की पूरी संभावना है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि हरीश रावत की अगली चाल क्या होगी क्योंकि अक्सर उनकी एक चाल पूरे सियासी समीकरण बदलने की क्षमता रखती है।

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