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जे-4 मॉडल से ही संभव है हिमालय का संरक्षण : –दुर्गा भंडारी
Amar Chand दिल्ली।मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन द्वारा 21 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में “हिमालय में सतत विकास: एक जन-केंद्रित दृष्टिकोण” विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और मीडिया प्रतिनिधियों ने हिमालयी क्षेत्र में विकास, संरक्षण और जनभागीदारी से जुड़े विविध पहलुओं पर गंभीर मंथन किया।
कार्यक्रम में डॉ. भीम सिंह, सांसद (राज्यसभा); राजेन्द्र सिंह, सदस्य एवं विभागाध्यक्ष, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) एवं पूर्व महानिदेशक, भारतीय तटरक्षक बल; प्रो. प्रकाश चंद्र कंडपाल, ICCR चेयर, इंडियन स्टडीज़, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन (यूके); अरुण योगी जी महाराज; कुमार ऋषिकेश, आईआरएस; प्रो. पी. के. जोशी, पर्यावरण विज्ञान प्रोफेसर, जेएनयू; तथा दुर्गा सिंह भंडारी, संस्थापक एवं मुख्य समन्वयक, मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। स्वागत भाषण में दुर्गा सिंह भंडारी ने हिमालय के पारिस्थितिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिमालय का संरक्षण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।
मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन के संस्थापक दुर्गा सिंह भंडारी ने अपने संबोधन में सतत विकास के लिए जे-4 मॉडल—जल, जमीन, जंगल और जन—को एक व्यावहारिक और प्रभावी दृष्टिकोण बताया। उन्होंने कहा कि यदि विकास योजनाओं में इन चारों तत्वों के बीच संतुलन नहीं होगा, तो हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास स्थायी नहीं रह सकता।
मुख्य अतिथि सांसद डॉ. भीम सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि हरित ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति को साथ लेकर चलना आज की आवश्यकता है। उन्होंने शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे हिमालयी क्षेत्रों की जमीनी समस्याओं और समाधान को नीति-निर्माण से जोड़ें, ताकि विकास वास्तव में जन-केंद्रित बन सके।
राजेन्द्र सिंह ने आपदा प्रबंधन के संदर्भ में कहा कि प्राकृतिक और मानव-जनित आपदाओं से निपटने के लिए सामुदायिक सहभागिता अत्यंत आवश्यक है। प्रो. पी. के. जोशी ने आजीविका-केंद्रित सतत विकास पर बल देते हुए कहा कि स्थानीय लोगों को विकास की प्रक्रिया का केंद्र बनाया जाना चाहिए और पर्यटन में संख्या के बजाय गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अरुण योगी जी महाराज ने हिमालय के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। प्रो. प्रकाश चंद्र कंडपाल ने हिमालयी समुदायों के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए आर्थिक आकांक्षाओं और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य बनाए रखने पर जोर दिया।
संगोष्ठी के दौरान मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन द्वारा स्थापित हिमालयन गौरव सम्मान शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों में उल्लेखनीय योगदान के लिए विभिन्न व्यक्तियों को प्रदान किए गए। कार्यक्रम में भारत और नेपाल से आए छात्र, शिक्षाविद, पर्यावरणविद, शोधार्थी और उद्यमियों ने सक्रिय भागीदारी की।
इस आयोजन को एनटीपीसी और बीपीसीएल का सहयोग प्राप्त हुआ। यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन नॉलेज पार्टनर, फेडरेशन ऑफ सोशल ऑर्गनाइजेशन्स (FOSO) सहयोगी भागीदार तथा इंडिया वॉइस मीडिया पार्टनर रहा। मीडिया जगत में योगदान के लिए अमर संदेश समाचार पत्र को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का सफल समन्वय रवि प्रकाश, शोधार्थी, जेएनयू ने अपनी टीम के साथ किया, जबकि संचालन विवेक वैष्णवी और आश्मिता शर्मा ने किया। कार्यक्रम का समापन एफओएसओ के संस्थापक अभिषेक मिश्रा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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