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कनाना में भक्ति का महाकुंभ: 365 दिवसीय श्री ललिता महायज्ञ की पूर्णाहुति की ओर बढ़ते कदम          

डॉ. के सी पांडेय

राजस्थान की धोरों वाली धरती पर, जहाँ बालोतरा की रेत और प्राचीन श्रद्धा का संगम होता है, भक्ति का एक ऐसा अनूठा अनुष्ठान अपने पूर्णता की ओर बढ़ रहा है जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। यह सच्चाई है श्री ललिता महायज्ञ की श्रद्धा की एक 365 दिवसीय यात्रा, जो 2025 में चैत्र मास की षष्ठी से प्रारंभ हुई और अब 24 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक समापन की ओर अग्रसर है।

इस विशाल आयोजन का बीजारोपण किसी योजना से नहीं, बल्कि गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की गहन शांति में हुआ था। वर्ष 2025 में, गहरी साधना के दौरान महंत श्री परशुराम गिरी जी को एक आध्यात्मिक प्रेरणा मिली।मां कामाख्या मे हुए ध्यानस्थ क्षण ने महंत श्री परशुराम गिरी जी के स्वप्न व संकल्प को श्री ललित महायज्ञ जैसे एक महाकुंभ का साकार रूप दे दिया। यह समय खगोलीय रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था; यह उनकी श्री विद्या दीक्षा के ठीक 16 वर्ष पूरे होने का अवसर था, जो इस परंपरा के षोडशी चक्र के साथ पूरी तरह मेल खाता था। इस संपूर्ण आयोजन के कार्यक्रमों के शुभ मुहूर्त, तिथियां व 1008 यज्ञकुंडों की वास्तु स्थिति इत्यादि में दिल्ली एवं देश के सुप्रसिद्ध ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ आचार्य महिमा अग्रवाल ने बहुत अहम भूमिका निभाई।

इस दिव्य कार्य के लिए कानाणा को चुना गया, जो विक्रम संवत 1440 में स्थापित एक प्राचीन श्री मठ है। यहीं महंत जी ने एक ऐसे अनुष्ठान की कल्पना की जो न केवल भगवती की आराधना करे, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने को भी एक सूत्र में पिरो दे।

दैनिक साधना मैं इस ललित महायज्ञ में 51,000 मंत्रों का अनवरत स्वर गूंजता है। इस महायज्ञ में 51000 मंत्र दैनिक तथा 11पुरश्चरण होंगे। लगभग एक वर्ष से कनाना की हवाओं में हवन का धुआं और संस्कृत के मंत्रों का कंपन घुला हुआ है। यह यज्ञ चार विधियों के अटूट चक्र पर चलता है जिसमें पाठात्मक: पवित्र पाठ, अभिषेकात्मक: अनुष्ठानिक स्नान, अर्चनात्मक: पवित्र अर्पण तथा हवनात्मक: पावन अग्नि आहुति सम्मिलित है। कहा जाता है कि ऐसा यज्ञ पांडव कालीन समय में युधिष्ठिर द्वारा किया गया था। उसके पश्चात शायद इस प्रकार का अत्यंत विशाल और दुर्लभ 365 दिन तक चलने वाला आध्यात्मिक महायज्ञ भारत की पुण्य धरा कनाना में वर्तमान में हो रहा है।

प्रतिदिन सुबह 8:00 बजे से 11 विद्वान ब्राह्मण मंडल पूजन के साथ दिन की शुरुआत करते हैं, जिसके बाद माँ शीतला और पूज्य नागा जी महाराज की जीवित समाधि का पूजन होता है। दोपहर में भगवान विष्णु, भगवान शिव और अंत में माँ ललिताम्बा का सहस्त्रनामों से अभिषेक किया जाता है।

इस भक्ति का केंद्रबिंदु अष्टधातु से निर्मित सवा क्विंटल वजनी श्री यंत्र है। इसके सम्मुख ललिता सहस्त्रनाम का निरंतर पाठ किया जाता है। सूर्यास्त तक हवन कुंड में आहुतियों के साथ प्रतिदिन लगभग 51,000 मंत्रों का समर्पण आकाश को किया जाता है।

श्री ललिता महायज्ञ एकता का प्रतीक है जहां 36 कौम एक साथ मिलकर सेवा भाव से कार्यरत है। श्री ललिता महायज्ञ की भव्यता केवल इसके धार्मिक पक्ष में ही नहीं, बल्कि इसके सामाजिक स्वरूप में भी है। इसे “आध्यात्मिक अर्थशास्त्र” का एक अनूठा उदाहरण माना जा रहा है। इस महायज्ञ में सामाजिक समरसता है जहाँ जैन समाज, पटेल समाज और राजपुरोहित समाज एक साथ खड़े हैं। कुल 36 विभिन्न जातियों के लोग कंधे से कंधा मिलाकर भीड़ प्रबंधन और व्यवस्थाओं में जुटे हैं। सुप्रसिद्ध ज्योतिष आचार्य महिमा अग्रवाल दिल्ली से स्वयं यहां आकर मां त्रिपुरा सुंदरी के चरणों में डेरा डाल यज्ञ में आशीर्वाद तथा श्री यंत्र से ऊर्जा प्राप्त करने हेतु सेवा भाव से वहां रहकर विभिन्न सेवा कार्यों में अपना योगदान दे रही हैं। स्थानीय जैन धर्मशाला और पटेल समाज के बड़े भवनों को श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए खोल दिया गया है, जिससे यह ग्रामीण क्षेत्र पर्यटन और स्थानीय व्यापार का एक बड़ा केंद्र बन गया है। बाला त्रिपुरा सुंदरी के सम्मान में, श्री यंत्र की स्थापना का नेतृत्व गाँव की लगभग 1600 कन्याओं ने किया, जो समाज में महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण के महंत जी के विजन को दर्शाता है।

जैसे-जैसे 365 दिनों की यह यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच रही है, इसकी भव्यता और बढ़ने वाली है। 22 मार्च से 24 मार्च 2026 तक “पूर्णाहुति” का आयोजन होगा। वर्तमान में सेवारत 11 ब्राह्मणों के साथ अब भारत के कोने-कोने से आए 1100 विद्वान ब्राह्मण जुड़ेंगे। साथ मिलकर वे 1008-कुण्डीय महायज्ञ संपन्न करेंगे, जिसमें माँ सरस्वती की स्थापना और शिव-शक्ति स्वरूप माँ ललिताम्बा का पूजन होगा।

देश के सभी प्रबुद्ध जनों, संत महात्माओं, धार्मिक संस्थाओं सामाजिक संगठनो एवं देश के सभी नागरिकों का इस ललित महायज्ञ में आह्वान किया गया है। अनुष्ठानों से परे, महंत परशुराम गिरी जी का एक बड़ा सपना है। वे इस महायज्ञ को एक नशामुक्त, संस्कारयुक्त और देशभक्त समाज के निर्माण की सीढ़ी मानते हैं। लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, जो यह सिद्ध करता है कि प्राचीन परंपराएं आधुनिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

2026 के अंतिम मंत्रोच्चार के साथ, कनाना इस बात का गवाह बनेगा कि जब आस्था और समुदाय मिलते हैं, तो परिणाम किसी चमत्कार से कम नहीं होता।

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